ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 186/ मन्त्र 11
ऋषिः - अगस्त्यो मैत्रावरुणिः
देवता - विश्वेदेवा:
छन्दः - भुरिक्त्रिष्टुप्
स्वरः - धैवतः
इ॒यं सा वो॑ अ॒स्मे दीधि॑तिर्यजत्रा अपि॒प्राणी॑ च॒ सद॑नी च भूयाः। नि या दे॒वेषु॒ यत॑ते वसू॒युर्वि॒द्यामे॒षं वृ॒जनं॑ जी॒रदा॑नुम् ॥
स्वर सहित पद पाठइ॒यम् । सा । वः॒ । अ॒स्मे इति॑ । दीधि॑तिः । य॒ज॒त्राः॒ । अ॒पि॒ऽप्राणी॑ । च॒ । सद॑नी । च॒ । भू॒याः॒ । नि । या । दे॒वेषु॑ । यत॑ते । व॒सु॒ऽयुः । वि॒द्याम॑ । इ॒षम् । वृ॒जन॑म् । जी॒रऽदा॑नुम् ॥
स्वर रहित मन्त्र
इयं सा वो अस्मे दीधितिर्यजत्रा अपिप्राणी च सदनी च भूयाः। नि या देवेषु यतते वसूयुर्विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम् ॥
स्वर रहित पद पाठइयम्। सा। वः। अस्मे इति। दीधितिः। यजत्राः। अपिऽप्राणी। च। सदनी। च। भूयाः। नि। या। देवेषु। यतते। वसुऽयुः। विद्याम। इषम्। वृजनम्। जीरऽदानुम् ॥ १.१८६.११
ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 186; मन्त्र » 11
अष्टक » 2; अध्याय » 5; वर्ग » 5; मन्त्र » 6
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अष्टक » 2; अध्याय » 5; वर्ग » 5; मन्त्र » 6
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनस्तमेव विषयमाह ।
अन्वयः
हे यजत्रा या वसूयुर्दीधितिर्देवेषु नि यतते सेयं वो दीधितिरस्मे अपिप्राणी च सदनी च भूयाः। यतो वयमिषं वृजनं जीरदानुञ्ज विद्याम ॥ ११ ॥
पदार्थः
(इयम्) वेदविद्या (सा) (वः) युष्माकम् (अस्मे) अस्मभ्यम् (दीधितिः) विद्याप्रदीप्तिः (यजत्राः) विदुषां पूजकाः (अपिप्राणी) निश्चितप्राणबलप्रदा (च) (सदनी) दुःखविनाशनेन सुखप्रदा (च) (भूयाः) (नि) (या) (देवेषु) विद्वत्सु (यतते) यत्नं करोति (वसूयुः) वसूनि धनानीच्छुः (विद्याम्) (इषम्) (वृजनम्) (जीरदानुम्) ॥ ११ ॥
भावार्थः
विद्यैव मनुष्याणां सुखप्रदा येन विद्याधनं न प्राप्तं सोऽन्तः सदा दरिद्र इव वर्त्तते ॥ ११ ॥अस्मिन् सूक्ते विद्वद्गुणवर्णनादेतदर्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह सङ्गतिर्वेद्या ॥इति षडशीत्युत्तरं शततमं सूक्तं पञ्चमो वर्गश्च समाप्तः ॥
हिन्दी (3)
विषय
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।
पदार्थ
हे (यजत्राः) विद्वानों के पूजनेवालो ! (या) जो (वसुयुः) धनों को चाहनेवाली अर्थात् जिससे धनादि उत्तम पदार्थ सिद्ध होते हैं उस विद्या की उत्तम दीप्ति कान्ति (देवेषु) विद्वानों में (नि, यतते) निरन्तर यत्न करती है, कार्यकारिणी होती है, (सा, इयम्) सो यह (वः) तुम्हारी (दीधितिः) उक्ति कान्ति (अस्मे) हमारे लिये (अपिप्राणी) निश्चित प्राण बल की देनेवाली (च) और (सदनी) दुःख विनाशने से सुख देनेवाली (च) भी (भूयाः) हो जिससे हम लोग (इषम्) इच्छासिद्धि वा अन्नादि पदार्थ (वृजनम्) बल और (जीरदानुम्) जीवन को (विद्याम) प्राप्त होवें ॥ ११ ॥
भावार्थ
विद्या ही मनुष्यों को सुख देनेवाली है, जिसने विद्या धन न पाया वह भीतर से सदा दरिद्रसा वर्त्तमान रहता है ॥ ११ ॥इस सूक्त में विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इसके अर्थ की पिछले सूक्तार्थ के साथ सङ्गति जानना चाहिये ॥यह एकसौ छयासीवाँ सूक्त और पाँचवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
विषय
देवों की दीप्ति
पदार्थ
१. गत मन्त्र की समाप्ति पर कहा था कि हम देवों को स्वाभिमुख करें। उन्हीं देवों से प्रार्थना करते हैं कि (इयम्) = यह (सा) = वह (वः) = आपकी (दीधितिः) = दीप्ति (अस्मे) = हमारे लिए (यजत्रा) = संगतिकरण के द्वारा त्राण करनेवाली (अपिप्राणी) = अङ्ग प्रत्यङ्ग को प्राणित करनेवाली (च) = और (सदनी) = उत्तम निवासवाली (भूया:) = हो । २. यह दीप्ति वह है (या) = जो (वसूयुः) = [वसुमती] उत्तम वसुओंवाली होकर (देवेषु) = दिव्यगुणों के निमित्त (नियतते) = निश्चय से यत्नवाली होती है। इस दीप्ति से हमारे जीवनों में दिव्यगुणों का वर्धन होता है। इन दिव्यगुणों का वर्धन करते हुए हम (इषम्) = प्रेरणा को (वृजनम्) = शक्ति व पापवर्जन को तथा (जीरदानुम्) = दीर्घ जीवन को (विद्याम) = प्राप्त करें।
भावार्थ
भावार्थ- हमें देवों की वह दीप्ति प्राप्त हो जो हमारा त्राण करती है, हमें प्राणित करती है तथा हमारे निवास को उत्तम बनाती है।
विषय
उत्तम विद्वान् अधिकारियों के कर्त्तव्य ।
भावार्थ
हे ( यजत्राः) दानशील, यज्ञ, सत्संगति और ईश्वरोपासना करने वाले पुरुषो ! (इयं) यह (सा) वह परमेश्वरी वाणी और शक्ति (वः अस्मे) तुम्हारी और हमारी सब की (दीधितिः) सूर्य की किरण के समान अज्ञान को दूर करने और ज्ञान का प्रकाश करने वाली, (अपिप्राणी) सब से उत्कृष्ट प्राण और बल देने वाली और (सदनी च) सबको शरण देने वाली, सर्वाश्रय, सर्वव्यापक (भूयाः) हो । (या) वह जो (देवेषु) विद्वानों, विजयेच्छु जनों और अग्नि आदि समस्त लोकों में (वसूयुः) वसूयु होकर (नि यतते) गूढ़ रूप से चेष्टा करती, गति देती है । विद्वान् लोग ‘वसूयु’ अर्थात् परमेश्वर और आचार्य के अधीन रहते हैं । उनमें उसकी और उसके गुणों को प्राप्त करने की इच्छा ‘वसूयु’ है। विजयार्थियों में धन की ऐषणा ‘वसूयु’ है। गृहस्थों में बसने वाले पुत्र कलत्रादि वसु हैं, उनकी इच्छा, कामना ‘वसूयु’ है । लोकों में ‘वसु’ समस्त लोक हैं, उनकी स्वामिनी शक्ति ‘वसूयु’ है। हम उसी शक्ति की उपासना कर (इषं वृजनं जीरदानुं विद्याम) अन्न, बल और जीवन प्राप्त करें। इति पञ्चमो वर्गः ॥
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अगस्त्य ऋषिः॥ विश्वेदेवा देवताः॥ छन्दः– १, ८, ९ त्रिष्टुप्। २, ४ निचृत त्रिष्टुप्। ११ भुरिक त्रिष्टुप्। ३, ५, ७ भुरिक् पङ्क्तिः। ६ पङ्क्तिः। १० स्वराट् पङ्क्तिः। एकादशर्चं सूक्तम्॥
मराठी (1)
भावार्थ
विद्याच माणसाला सुख देणारी आहे. ज्याने विद्याधन प्राप्त केले नाही तो आतून सदैव दरिद्री असतो. ॥ ११ ॥
इंग्लिश (2)
Meaning
O divinities and devotees of yajna and yajnic action, that brilliance and generosity of yours which is the treasure source of wealth for the world, which shines in and among the powers of divinity and which inspires the breath and power of life and living and creates the peace and prosperity of the home and family may, we pray, be ours too so that we may be happy, blest with food and energy for life, the path of rectitude and the gift of a long, healthy and dedicated life.
Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]
The learning is the greatest wealth.
Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]
O adorers of the enlightened persons ! may this great light of the Vedic wisdom which great scholars always seek in order to get true prosperity, be given to us. It is the indomitable and certain strength of the Pranas and of true delight and dispels all miseries. Because of this, we can accomplish the fulfilment of all noble desires, strength and long life.
Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]
NA
Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]
Vidya or wisdom is the true source of real happiness. He who has not acquired the wealth of wisdom or true knowledge, remained always a poor.
Foot Notes
(इयम् ) इयं वेदविद्या = This Vedic wisdom. ( दीघिति: ). विद्या प्रदिप्ति: | दिधितय इति रश्मिनाम् (N.G. 1.5) = Light of wisdom. Rays of wisdom or true knowledge. (अपिप्राणी) निश्चितप्राणबलप्रदा । = Giver of indomitable and certain power of the Pranas. ( सदनी) दुःखविनाशनेन सुखप्रदा = Giver of happiness by dispelling all misery.
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