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ऋग्वेद मण्डल - 1 के सूक्त 188 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 188/ मन्त्र 5
    ऋषिः - अगस्त्यो मैत्रावरुणिः देवता - आप्रियः छन्दः - निचृद्गायत्री स्वरः - षड्जः

    वि॒राट् स॒म्राड्वि॒भ्वीः प्र॒भ्वीर्ब॒ह्वीश्च॒ भूय॑सीश्च॒ याः। दुरो॑ घृ॒तान्य॑क्षरन् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    वि॒राट् । स॒म्राट् । वि॒भ्वीः । प्र॒ऽभ्वीः । ब॒ह्वीः । च॒ । भूय॑सीः । च॒ । याः । दुरः॑ । घृ॒तानि॑ । अ॒क्ष॒र॒न् ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    विराट् सम्राड्विभ्वीः प्रभ्वीर्बह्वीश्च भूयसीश्च याः। दुरो घृतान्यक्षरन् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    विराट्। सम्राट्। विभ्वीः। प्रऽभ्वीः। बह्वीः। च। भूयसीः। च। याः। दुरः। घृतानि। अक्षरन् ॥ १.१८८.५

    ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 188; मन्त्र » 5
    अष्टक » 2; अध्याय » 5; वर्ग » 8; मन्त्र » 5
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनस्तमेव विषयमाह ।

    अन्वयः

    हे विद्वन् विराट् सम्राट् त्वं या विभ्वीः प्रभ्वीर्बह्वीर्भूयसीश्चाऽण्व्यो मात्रा दुरो घृतानि चाक्षरन् ता विजानीहि ॥ ५ ॥

    पदार्थः

    (विराट्) यो विविधेषु गुणेषु कर्मसु वा राजते (सम्राट्) यश्चक्रवर्त्तीव विद्यासु सम्यग् राजते सः (विभ्वीः) व्यापिकाः (प्रभ्वीः) समर्थाः (बह्वीः) अनेकाः (च) (भूयसीः) पुनः पुनरधिकाः (च) (याः) (दुरः) द्वाराणि (घृतानि) उदकानि (अक्षरन्) प्राप्नुवन्ति ॥ ५ ॥

    भावार्थः

    हे मनुष्याः याः सर्वस्य जगतो बहुतत्त्वाढ्यास्त्रिगुणात्मिका मात्रा नित्यस्वरूपेण सदा वर्त्तन्ते ता आरभ्य पृथिवीपर्यन्तान् पदार्थान् विज्ञाय सर्वकार्य्याणि साधनीयानि ॥ ५ ॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

    पदार्थ

    हे विद्वान् ! (विराट्) जो विविध प्रकार के गुणों और कर्मों में प्रकाशमान वा (सम्राट्) जो चक्रवर्त्ती के समान विद्याओं में सुन्दरता से प्रकाशमान सो आप (याः) जो (विभ्वीः) व्याप्त होनेवाली (प्रभ्वीः) समर्थ (बह्वीः) बहुत अनेक (भूयसीः, च) और अधिक से अधिक सूक्ष्म मात्रा (दुरः) द्वारे अर्थात् सर्व कार्यसुखों को और (घृतानि, च) जलों को (अक्षरन्) प्राप्त होती हैं, उनको जानो ॥ ५ ॥

    भावार्थ

    हे मनुष्यो ! जो सब जगत् की बहुत तत्त्वयुक्त सत्व रजस्तमो गुणवाली सूक्ष्ममात्रा नित्यस्वरूप से सदा वर्त्तमान हैं, उनको लेकर पृथिवीपर्यन्त पदार्थों को जान सब कार्य सिद्ध करने चाहियें ॥ ५ ॥

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    विषय

    दीप्त इन्द्रियाँ

    पदार्थ

    १. यह शरीर यज्ञवेदि है । इन्द्रियाँ इस यज्ञभवन के द्वार-स्थानापन्न हैं। ये (दुरः) = इन्द्रिय-द्वार (विराट्) = [विशेषेण राजन्ते] विशिष्टरूप से दीप्तिवाले हैं, (सम्राट्) = मिलकर दीप्तिवाले हैं, अर्थात् सबके सब इन्द्रिय द्वार दीप्त हैं, (विभ्वी:) = [विविधं भविष्यः] विविध कार्यों में ये व्यापृत होनेवाले हैं, (प्रभ्वीः) = अपने-अपने कार्य को शक्ति से करनेवाले हैं । २. (बह्वी:) = [बृह वृद्धौ] ये इन्द्रिय द्वार वृद्धिवाले हैं च+च-और (याः) = जो (भूयसी:) = अत्यन्त वृद्धिवाले हैं, वे इन्द्रिय द्वार (घृतानि) = दीप्तियों को (अक्षरन्) = टपकाते हैं। वस्तुतः जब गत मन्त्र में वर्णित आदित्य अपने जीवन को निर्मल बनाते हैं तो उनकी इन्द्रियाँ तेजस्विता से चमक उठती हैं।

    भावार्थ

    भावार्थ - हमारे सब इन्द्रिय द्वार तेजस्विता से दीप्त हों।

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    विषय

    उत्तम प्रजा।

    भावार्थ

    (विराट्) विविध गुणों, कर्मों से प्रकाशमान, ( सम्राट् ) जो चक्रवर्ती के समान सर्वत्र अच्छी प्रकार प्रकाशित है वह सूर्य के समान तेजस्वी राजा और ( विभ्वीः ) राष्ट्र भर में फैली हुई, ( बह्वीः ) बहुत सी, (याः च भूयसीः) और जो बहुत बहुत होकर ( दुरः ) द्वारों के समान शत्रुओं को वारण करने हारी प्रजाएं और सेनाएं हैं वे ( प्रभ्वीः) उत्तम सामर्थ्य वाली होकर (घृतानि) बलप्रद, दुग्धादि खाद्य पदार्थो और तेजों को भी (अक्षरन्) प्रवाहित करें, अधिक मात्रा में उत्पन्न करें। इत्यष्टमो वर्गः ॥

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अगस्त्य ऋषिः । आप्रियो देवता ॥ छन्दः–१, ३, ५, ६, ७, १० निचृद्गायत्री। २, ४, ८, ९, ११ गायत्री ॥ एकादशर्चं सूक्तम् ॥

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    हे माणसांनो! जी सर्व जगाची तत्त्वयुक्त सत्त्व, रज, तमो गुणरूपी सूक्ष्म मात्रा नित्यस्वरूपाने विद्यमान आहे, त्यांच्याद्वारे पृथ्वी इत्यादी पदार्थांना जाणून सर्व कार्य सिद्ध केले पाहिजे. ॥ ५ ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    Infinite and various is the light and power of Divinity, yet unique, one whole together and indivisible is the rule and glory of the universal power and presence.$Mightily wide and various, excellent and deep are the doors and paths to Divinity which reveal and release the flood gates of vision and the bliss of Eternity.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    A men should acquire knowledge about all substances.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    O scholar! you shine and excel in various virtues activities, and in all like sciences and are like an emperor. You should know thoroughly about the subtle powers of the Primer dial matter; they are pervading, powerful manifold, excellent and numerous. They are also the cause of the happiness, waters etc.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    NA

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    O men! you should accomplish all the works after knowing the nature of subtle elements, and of the eternal matter. They in fact consist of SATVA, RAJAS and TAMAS, and the substances like the earth were made out of them.

    Foot Notes

    (घृतानि ) उदकानि = Waters.

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