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ऋग्वेद मण्डल - 1 के सूक्त 188 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 188/ मन्त्र 8
    ऋषिः - अगस्त्यो मैत्रावरुणिः देवता - आप्रियः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः

    भार॒तीळे॒ सर॑स्वति॒ या व॒: सर्वा॑ उपब्रु॒वे। ता न॑श्चोदयत श्रि॒ये ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    भार॑ति । इळे॑ । सर॑स्वति । याः । वः॒ । सर्वाः॑ । उ॒प॒ऽब्रु॒वे । ताः । नः॒ । चो॒द॒य॒त॒ । श्रि॒ये ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    भारतीळे सरस्वति या व: सर्वा उपब्रुवे। ता नश्चोदयत श्रिये ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    भारति। इळे। सरस्वति। याः। वः। सर्वाः। उपऽब्रुवे। ताः। नः। चोदयत। श्रिये ॥ १.१८८.८

    ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 188; मन्त्र » 8
    अष्टक » 2; अध्याय » 5; वर्ग » 9; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ स्त्रीपुरुषविषयमाह ।

    अन्वयः

    हे भारतीळे सरस्वति या वः सर्वा अहमुपब्रुवे ता यूयं नोऽस्मान् श्रिये चोदयत प्रेरयत ॥ ८ ॥

    पदार्थः

    (भारति) सकलविद्याधारिके (इळे) प्रशस्ते (सरस्वति) प्रशस्तं सरो विज्ञानं गमनं वा विद्यते यस्यां तत्सम्बुद्धौ (याः) (वः) युष्मान् प्रति (सर्वाः) अखिला वाचः (उपब्रुवे) उपयोगि वच उपदिशेयम् (ताः) सर्वा विदुष्यः (नः) अस्मान् (चोदयत) (श्रिये) लक्ष्मीप्राप्तये ॥ ८ ॥

    भावार्थः

    याः प्रशंसितसौन्दर्यशुभलक्षणलक्षिता अनवद्यशास्त्रविज्ञानरममाणाः कस्या भवेयुस्ता पाणिग्राहान् पतीन् प्राप्य धर्मेण धनादिपदार्थानुन्नयेयुः ॥ ८ ॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    अब स्त्रीपुरुष के विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

    पदार्थ

    हे (भारति) समस्त विद्या के धारण करनेवाली वा (इळे) हे प्रशंसावती वा (सरस्वति) हे विज्ञान और उत्तम गतिवाली ! (याः) जो (वः) तुम (सर्वाः) सभों को समीप में (उपब्रुवे) उपयोग करनेवाले वचन का उपदेश करूँ (ताः) वे तुम (नः) हम लोगों का (श्रिये) लक्ष्मी प्राप्त होने के लिये (चोदयत) प्रेरणा देओ ॥ ८ ॥

    भावार्थ

    जो प्रशंसित सौन्दर्य उत्तम लक्षणों से युक्त देखी गई, श्रेष्ठतर शास्त्रविज्ञान में रमनेवाली कन्या हों, वे अपने पाणिग्रहण करनेवाले पतियों को पाकर धर्म से धनादि पदार्थों की उन्नति करें ॥ ८ ॥

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    विषय

    भारती, इडा, सरस्वती

    पदार्थ

    १. 'भारत' सूर्य का नाम है, उसकी सम्बन्धिनी भारती द्युलोक की देवता है । 'इळा' भूदेवी है और 'सरस्वती' अन्तरिक्ष की देवता है (सरः वागू, उदकं वा अस्यास्तीति) । हे (भारति) = द्युलोक देवते! (इळे) = भूदेवि! (सरस्वति) = अन्तरिक्ष देवते! (याः सर्वाः) = जो आप सब हैं, (वः) = [युष्मान्] उनको (उपब्रुवे) = मैं प्रार्थना करता हूँ। २. (ताः) = वे आप सब (न:) = हमें श्रिये शोभा के लिए (चोदयत्) = [प्रेरयत] प्रेरित कीजिए। अध्यात्म में 'मस्तिष्क' द्युलोक है, 'शरीर' पृथिवीलोक है और 'हृदय' अन्तरिक्षलोक है। मस्तिष्क की देवता आदित्य की भाँति चमकता हुआ ज्ञान है। शरीर की देवता पृथिवी के समान 'दृढ़ता' व 'शक्ति' है । हृदय की तेता वायु की भाँति 'कर्म का संकल्प' है । 'ज्ञान, शक्ति व कर्मसंकल्प' – ये सब मिलकर हमें श्रीसम्पन्न करें ।

    भावार्थ

    भावार्थ – 'भारती, इडा व सरस्वती' हमारे जीवन की त्रिलोकी की देवता हों। ये हमारे जीवन को श्रीयुक्त करें। हम इन तीनों देवताओं का आराधन करें ।

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    विषय

    भारती आदि तीन सभाएं।

    भावार्थ

    हे (भारती) भरत अर्थात् पालन पोषण करने वाले मनुष्यों की सभे ! हे (इळे) भूमि सम्बन्धी प्रबन्ध करने वाली धर्मसभे ! हे (सरस्वति) उत्तम ज्ञानवान् पुरुषों की विद्वत्सभे ! और भी जो नाना प्रकार की सभा समितिएं हैं (सर्वाः वः उपब्रुवे) मैं तुम सबको प्रार्थना करता हूं कि (ताः) वे आप सब (नः) हमारी (श्रिये) राज्य लक्ष्मी की वृद्धि के लिये (चोदयत) हमें सदा सन्मार्ग में प्रेरणा करती रहो। (२) इसी प्रकार बालकों को पोषण करने में कुशल स्त्री ‘भारती’, उत्तम ज्ञान निष्ठ वा कर्मनिष्ठ स्त्री ‘इळा’ और उत्तम ज्ञान विज्ञान का व्याख्यान करने वाली ‘सरस्वती’ इत्यादि नाना गुणवती स्त्रियां भी हमारे राष्ट्र और गृह की शोभा की वृद्धि के लिये पुरुषों को प्रेरित किया करें। ऐसा उनको मैं उपदेश करूं।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अगस्त्य ऋषिः । आप्रियो देवता ॥ छन्दः–१, ३, ५, ६, ७, १० निचृद्गायत्री। २, ४, ८, ९, ११ गायत्री ॥ एकादशर्चं सूक्तम् ॥

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    ज्या प्रशंसनीय, सुंदर, उत्तम लक्षणांनी युक्त, श्रेष्ठ ज्ञान-विज्ञानात रमणाऱ्या कन्या असतील त्यांनी आपले पाणिग्रहण करणाऱ्या पतींना प्राप्त करून धर्मानुसार धन इत्यादी पदार्थांची वाढ करावी. ॥ ८ ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    Bharati, mother of scientific speech and knowledge, Ila, mother of eternal speech and knowledge, and Sarasvati, mother of the existential flow of universal speech and knowledge, may you all whom I invoke to grace our yajna of learning and education, inspire us, I pray , to rise to the heights of glory and the beauty and grace of life and culture.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    Learned girls prosper after marriage.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    You uphold all sciences, O noble lady! You possess good knowledge. I utter you all useful words of wisdom, so that you may direct us to prosperity.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    NA

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    The beautiful, virtuous and highly learned virgins should marry matching husbands and should lead them to prosperity through righteous means.

    Foot Notes

    (भारति) सकलविद्याधारिके = O Upholder of or expert in all sciences ! (इलेटे ) प्रशस्ते = Admirable ( सरस्वति ) प्रशस्तं सरो विज्ञानं गमनं वा विद्यते यस्या सा = Possessor of good knowledge or movements.

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