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ऋग्वेद मण्डल - 3 के सूक्त 29 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 3/ सूक्त 29/ मन्त्र 12
    ऋषिः - गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा देवता - अग्निः छन्दः - भुरिगनुष्टुप् स्वरः - गान्धारः

    सु॒नि॒र्मथा॒ निर्म॑थितः सुनि॒धा निहि॑तः क॒विः। अग्ने॑ स्वध्व॒रा कृ॑णु दे॒वान्दे॑वय॒ते य॑ज॥

    स्वर सहित पद पाठ

    सु॒निः॒ऽमथा॑ । निःऽम॑थितः । सु॒ऽनि॒धा । निऽहि॑तः । क॒विः । अग्ने॑ । सु॒ऽअ॒ध्व॒रा । कृ॒णु॒ । दे॒वान् । दे॒व॒ऽय॒ते । य॒ज॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    सुनिर्मथा निर्मथितः सुनिधा निहितः कविः। अग्ने स्वध्वरा कृणु देवान्देवयते यज॥

    स्वर रहित पद पाठ

    सुनिःऽमथा। निःऽमथितः। सुऽनिधा। निऽहितः। कविः। अग्ने। सुऽअध्वरा। कृणु। देवान्। देवऽयते। यज॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 3; सूक्त » 29; मन्त्र » 12
    अष्टक » 3; अध्याय » 1; वर्ग » 34; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनस्तमेव विषयमाह।

    अन्वयः

    हे अग्ने यथा सुनिर्मथा निर्मथितः सुनिधा निहितः कविरग्निर्बहूनि कार्य्याणि सङ्गमयति तथैव स्वध्वरा देवान् कृणु एतान् देवयते यज ॥१२॥

    पदार्थः

    (सुनिर्मथा) शोभनेन मन्थनेन (निर्मथितः) नितरां विलोडितः (सुनिधा) शोभने निधाने। अत्र ङेराकारादेशः। (निहितः) धृतः (कविः) क्रान्तदर्शनः (अग्ने) पावकइव विद्वन् (स्वध्वरा) शोभनान्यहिंसादीनि कर्माणि येषु व्यवहारेषु (कृणु) (देवान्) दिव्यगुणान् (देवयते) देवान् कामयमानाय (यज) देहि ॥१२॥

    भावार्थः

    यथा विद्यया निर्मितेषु कलायन्त्रेषु स्थापितोऽग्निर्निमन्थनेन घर्षणेन च वेगादिगुणान् जनयित्वा बहूनि कार्य्याणि साध्नोति तथैवोत्तमानि कर्माणि कृत्वा दिव्यान् भोगान् प्राप्नुवन्तु ॥१२॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

    पदार्थ

    हे (अग्ने) अग्नि के सदृश तेजस्वी विद्वान् पुरुष ! जैसे (सुनिर्मथा) सुन्दर मथने के वस्तु से (निर्मथितः) अत्यन्त मथा (सुनिधा) उत्तम आधार वस्तु में (निहितः) धरा गया (कविः) और सर्वत्र दीख पड़नेवाला अग्नि बहुत से कार्य्यों को सिद्ध करता है, वैसे ही (स्वध्वरा) उत्तम अहिंसा आदि कर्मों से युक्त (देवान्) उत्तम गुणों को (कृणु) धारण करो और इन (देवयते) उत्तम गुणों की कामना करते हुए पुरुष के लिये उन गुणों को (यज) दीजिये ॥१२॥

    भावार्थ

    जैसे विद्या से रचे हुए कलायन्त्रों में रक्खा गया अग्नि अत्यन्त मथने और घिसने से वेग आदि गुणों को उत्पन्न कर बहुत से कार्य्यों को सिद्ध करता है, वैसे ही उत्तम कर्म्मों को करके श्रेष्ठ गुणों को प्राप्त होओ ॥१२॥

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    विषय

    सुनिर्मन्थन

    पदार्थ

    [१] हे (अग्ने) = अग्रणी प्रभो! आप (सुनिर्मथा) = उत्तम निर्मन्थन से, स्वाध्याय व चिन्तन से (निर्मथितः) = चिन्तन किये जाते हो । (सुनिधा) = उत्तम निधान, दिव्यगुणों के स्थापन से आप (निहित:) = हृदयों में स्थापित किये जाते हो। चिन्तन से आपके स्वरूप का कुछ आभास मिलता है, तो दिव्यगुणों के धारण से हम आपका धारण करनेवाले बनते हैं। (कवि:) = आप सर्वज्ञ हैं । [२] हे प्रभो ! धारण किये गये आप (स्वध्वरा) = हमें उत्तम यज्ञादि कर्मोंवाला करिए और (देवयते) = दिव्यगुणों की कामनावाले पुरुष के साथ (देवान्) = दिव्यगुणों को (यज) = संगत करिए। इस 'देवयन्' पुरुष को देवों का सम्पर्क प्राप्त हो । देवों का सम्पर्क प्राप्त करके यह दिव्यगुणों को धारण करनेवाला बने ।

    भावार्थ

    भावार्थ- उत्तम चिन्तन [= स्वाध्याय] व दिव्यगुणों को धारण करते हुए हम अपने हृदयों में प्रभु को स्थापित करनेवाले बनें ।

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    विषय

    मथिताग्नि और विद्वान्।

    भावार्थ

    (सुनिर्मथा) उत्तम मन्थन दण्ड से (निर्मथितः) मथा हुआ अग्नि उत्तम स्थान पर स्थापित होकर जिस प्रकार (सु-अध्वरा) उत्तम व्यवहारों में (देवान् करोति यजते च) उत्तम २ व्यवहारों को उत्पन्न करता और उत्तम फल भी देता है उसी प्रकार (कविः) क्रान्तदर्शी विद्वान् (सुनिर्मथा) उत्तम शास्त्रालोड़न रूप तप से (निर्मथितः) विशेष रूप से मथित हो, सुतप्त होकर वा पूर्ण ज्ञान रूप सार प्राप्त करके (सुनिधाः) उत्तम स्थान पर नियुक्त किया जावे। इसी प्रकार नायक भी उत्तम २ परीक्षाओं से परीक्षित होकर उत्तम पद पर नियुक्त हो। हे (अग्ने) अग्रणी नायक और हे विद्वन् ! तू (देवान्) विद्वान् अपने ज्ञानादि के इच्छुक पुरुषों को (सु-अध्वरा) शोमन, विनष्ट न होने वाले, स्थिर कार्यों में (कृणु) लगा और उन कार्यों में अपने उत्तम गुणों को प्रकट कर। (देवयते) शुभ गुणों की कामना करने वाले को यज्ञ में ! उत्तम गुण प्रदान कर।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    विश्वामित्र ऋषिः॥ १–४, ६–१६ अग्नि। ५ ऋत्विजोग्निर्वा देवता॥ छन्दः—१ निचृदनुष्टुप्। ४ विराडनुष्टुप्। १०, १२ भुरिगनुष्टुप्। २ भुरिक् पङ्क्तिः। १३ स्वराट् पङ्क्तिः। ३, ५, ६ त्रिष्टुप्। ७, ९, १६ निचृत् त्रिष्टुप्। ११, १४, १५ जगती ॥ षडदशर्चं सूक्तम्॥

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    जसे विद्येने निर्मित कलायंत्रात ठेवलेला अग्नी अत्यंत मंथनाने व घर्षणाने वेग इत्यादी गुणांना उत्पन्न करून पुष्कळ कार्य सिद्ध करतो, तसेच उत्तम कर्म करून श्रेष्ठ गुण प्राप्त करा. ॥ १२ ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    Agni, brilliant light, fire and power, well produced with powerful tools and apparatuses, safely stored, well preserved in concentrations as in batteries, is a revolutionary illuminative power. O master of light and power of energy, Agni, develop and expand our yajnas of production and call up, advance, concentrate and conserve the wonderful powers of nature for the devotees of peace and progress.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    The attributes and functions of the fire are told.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    O learned person ! you are purifier like the fire. As the fire generated by rubbing well is placed in good machines etc., it accomplishes many works. In the same manner, a prudent sage-poet manifests divine virtues in his all non-violent dealings. He gives them to those who desire to have the company of the enlightened persons or desire to become divine.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    N/A

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    When the fire placed in the machines is made with the help of the scientific knowledge and generated by rubbing and friction, speed and other qualities, it accomplishes many works. In the same manner, men should have divine enjoyments by performing the good deeds.

    Foot Notes

    (अग्ने ) पावक इव विद्वन् । = O learned person purifier like the fire. (स्वध्वरा ) शोभनान्यहिंसादीनि कर्माणि येषु व्यवहारेषु। = In non-violent dealings. (यज ) देहि। = Give.

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