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ऋग्वेद मण्डल - 3 के सूक्त 29 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 3/ सूक्त 29/ मन्त्र 13
    ऋषिः - गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा देवता - अग्निः छन्दः - स्वराट्पङ्क्ति स्वरः - पञ्चमः

    अजी॑जनन्न॒मृतं॒ मर्त्या॑सोऽस्रे॒माणं॑ त॒रणिं॑ वी॒ळुज॑म्भम्। दश॒ स्वसा॑रो अ॒ग्रुवः॑ समी॒चीः पुमां॑सं जा॒तम॒भि सं र॑भन्ते॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अजी॑जनन् । अ॒मृत॑म् । मर्त्या॑सः । अ॒स्रे॒माण॑म् । त॒रणि॑म् । वी॒ळुऽज॑म्भम् । दश॑ । स्वसा॑रः । अ॒ग्रुवः॑ । स॒मी॒चीः । पुमां॑सम् । जा॒तम् । अ॒भि । सम् । र॒भ॒न्ते॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अजीजनन्नमृतं मर्त्यासोऽस्रेमाणं तरणिं वीळुजम्भम्। दश स्वसारो अग्रुवः समीचीः पुमांसं जातमभि सं रभन्ते॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अजीजनन्। अमृतम्। मर्त्यासः। अस्रेमाणम्। तरणिम्। वीळुऽजम्भम्। दश। स्वसारः। अग्रुवः। समीचीः। पुमांसम्। जातम्। अभि। सम्। रभन्ते॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 3; सूक्त » 29; मन्त्र » 13
    अष्टक » 3; अध्याय » 1; वर्ग » 34; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनस्तमेव विषयमाह।

    अन्वयः

    यथा अग्रुवः समीचीर्दश स्वसारो जातं पुमांसमभि संरभन्ते तथा मर्त्यासो वीडुजम्भं तरणिमस्रेमाणममृतमग्निमजीजनन् ॥१३॥

    पदार्थः

    (अजीजनन्) जनयन्ति (अमृतम्) नाशरहितम् (मर्त्यासः) मनुष्याः (अस्रेमाणम्) अक्षयम् (तरणिम्) अध्वनां तारकम् (वीळुजम्भम्) वीळु बलवज्जम्भो मुखमिव ज्वाला यस्य तम् (दश) (स्वसारः) भगिन्य इव वर्त्तमाना अङ्गुलयः। स्वसार इत्यङ्गुलिना०। निघं०। २। ५। (अग्रुवः) या अग्रे गच्छन्ति ताः (समीचीः) याः सम्यगञ्चन्ति ताः (पुमांसम्) पुरुषार्थयुक्तं नरम् (जातम्) प्रसिद्धम् (अभि) आभिमुख्ये (सम्) सम्यक् (रभन्ते) प्रवर्त्तयन्ति ॥१३॥

    भावार्थः

    अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथा कराऽङ्गुलयः परस्परं संहिता देहधारिणं मनुष्यं कर्मसु प्रवर्त्तयन्ति तथैव विद्वांसो वह्निं क्रियासु नियोजयन्ति ॥१३॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

    पदार्थ

    जैसे (अग्रुवः) आगे चलनेवाली (समीचीः) उत्तम प्रकार मिली हुईं (दश) दश संख्या परिमित (स्वसारः) बहिनों के समान वर्त्तमान अङ्गुलियाँ (जातम्) प्रसिद्ध (पुमांसम्) पुरुषार्थ से युक्त मनुष्य को (अभि) सम्मुख (सम्) उत्तम प्रकार (रभन्ते) प्रवृत्त करती हैं वैसे (मर्त्यासः) मनुष्य (वीळुजम्भम्) मुख के सदृश ज्वाला से शोभित (तरणिम्) मार्गों से यत्न द्वारा इष्ट स्थान में पहुँचानेवाला (अस्रेमाणम्) नाशरहित (अमृतम्) नित्य अग्नि को (अजीजनन्) उत्पन्न करते हैं ॥१३॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे हाथों की अङ्गुलियाँ परस्पर मिली हुई शरीरधारी मनुष्य को कार्य्यों में प्रवृत्त करती हैं, वैसे ही विद्वान् पुरुष अग्नि को क्रिया में लगाते अर्थात् उसके द्वारा कार्य्य सिद्ध करते हैं ॥१३॥

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    विषय

    एक मात्र लक्ष्य–'प्रभुप्राप्ति'

    पदार्थ

    [१] (मर्त्यासः) = मरणधर्मा होते हुए भी उपासक लोग (अमृतं अजीजनन्) = उस अमृत प्रभु को अपने हृदयों में प्रादुर्भूत करते हैं, जो प्रभु (अस्त्रेमाणम्) = क्षय व हिंसा से रहित हैं। (तरणिम्) = उपासक को सब वासनाओं से तरानेवाले हैं। (वीडुजम्भम्) = दृढ़ दंष्ट्राओं वाले हैं, अर्थात् इन दंष्ट्राओं से असुरों का संहार करनेवाले हैं। [२] इस प्रभु का इस रूप में स्मरण करने पर (दश) = ये दस इन्द्रियाँ (स्वसारः) = उस आत्मतत्त्व की ओर चलनेवाली होती हैं। इसीलिए (अग्रुवः) = आगे और आगे ले चलनेवाली होती हैं। (समीची:) = सदा संगत व सम्यक् [उत्तम] गतिवाली होती हैं। उस (जातम्) = सदा से प्रादुर्भूत (पुमांसम्) = [पुनाति] पवित्र करनेवाले प्रभु की (अभि) = ओर (संरभन्ते) = उद्योग करनेवाली होती हैं। उपासक के सब कार्य प्रभुप्राप्ति के उद्देश्य से होते हैं। उसका खान-पान भी प्रभुप्राप्ति को लक्ष्य करके होता है। शरीररक्षण भी वह प्रभुप्राप्ति के मन्दिर के रूप में देखता हुआ करता है।

    भावार्थ

    भावार्थ- हमारी सब क्रियाएँ प्रभुप्राप्ति के उद्देश्य से हों।

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    विषय

    अमृत अग्नि वीर।

    भावार्थ

    (मर्त्यासः) मनुष्य नायक को (अस्त्रेमाणम्) शत्रुओं द्वारा शोषण किये जाने योग्य (तरणिं) संकटों से पार उतारने में समर्थ (वीडुजभ्मम्) बलवान् हिंसाकारी सैन्य बलों से युक्त,(अजीजनन्) बनावें। और (दस) दसों दिशाओं की प्रजाएं सेनाओं वा (स्वसारः) स्व-अर्थात् धन का लक्ष्य करके आने वाली, स्वयं उसके शरण आने वाली (अग्रुवः) आगे आकर (समीचीः) एक साथ उसका आदर करती हुई (जातम् पुमांसं) उत्पन्न हुए पुत्र को बहिनों के समान प्रेम से उस (जातं पुमांसम्) प्रसिद्ध वा प्रकट हुए वीर पुरुष को (अभि सं रभन्ते) सब ओर से प्राप्त करें और प्रसन्न हों।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    विश्वामित्र ऋषिः॥ १–४, ६–१६ अग्नि। ५ ऋत्विजोग्निर्वा देवता॥ छन्दः—१ निचृदनुष्टुप्। ४ विराडनुष्टुप्। १०, १२ भुरिगनुष्टुप्। २ भुरिक् पङ्क्तिः। १३ स्वराट् पङ्क्तिः। ३, ५, ६ त्रिष्टुप्। ७, ९, १६ निचृत् त्रिष्टुप्। ११, १४, १५ जगती ॥ षडदशर्चं सूक्तम्॥

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जशी हाताची बोटे परस्पर मिळून शरीरधारी माणसांना कार्यात प्रवृत्त करतात तसेच विद्वान पुरुष अग्नीला क्रियेत संयुक्त करतात, अर्थात् त्याद्वारे कार्य करतात. ॥ १३ ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    Men of science and technology produce the immortal, imperishable and forceful motive power of Agni, and ten moving streams of water, ten fingers of the hands, moving forward in nimble work, all working together like ten sisters, welcome and advance this dynamic power for the good of humanity as it is produced.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    The same subject of fire is still running.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    The ten fingers are like sisters to one another, and they move forward together harmoniously. They prompt a prominent person to perform good deeds. In the same manner, the mortals generate the fire of spiritual knowledge, which is immortal. And it never totally dies, though changes its from owing to the indestructibility of matter. The fire has strong jaws in the form of its flames, and is unfailing. It eradicates the darkness and thus shows the path.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    N/A

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    As fingers in unity prompt a person to do works, in the same manner, the enlightened persons harness Agni (fire or electricity) in various ways and in the works.

    Foot Notes

    (अस्रोमाणम्) अक्षयम् । = Unfailing or undecaying. (स्वसार:) भगिन्य इव वर्तमाना अङ्गुलय । स्वसार इत्यङ्गुलिदा । ( N. G. 2, 5 ) = The fingers working harmoniously like the sisters. (वीडुजम्भम् ) वीड बलवज्जम्भो मुखमिव ज्वाला यस्य तम् । वीलु इति बलनाम (N.G. 2. 2) = Possessing strong jaws in the form of its flames.

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