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ऋग्वेद मण्डल - 4 के सूक्त 18 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 4/ सूक्त 18/ मन्त्र 12
    ऋषिः - वामदेवो गौतमः देवता - इन्द्रादिती छन्दः - त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    कस्ते॑ मा॒तरं॑ वि॒धवा॑मचक्रच्छ॒युं कस्त्वाम॑जिघांस॒च्चर॑न्तम्। कस्ते॑ दे॒वो अधि॑ मार्डी॒क आ॑सी॒द्यत्प्राक्षि॑णाः पि॒तरं॑ पाद॒गृह्य॑ ॥१२॥

    स्वर सहित पद पाठ

    कः । ते॒ । मा॒तर॑म् । वि॒धवा॑म् । अ॒च॒क्र॒त् । श॒युम् । कः । त्वाम् । अ॒जि॒घां॒स॒त् । चर॑न्तम् । कः । ते॒ । दे॒वः । अधि॑ । मा॒र्डी॒के । आ॒सी॒त् । यत् । प्र । अक्षि॑णाः । पि॒तर॑म् । पा॒द॒ऽगृह्य॑ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    कस्ते मातरं विधवामचक्रच्छयुं कस्त्वामजिघांसच्चरन्तम्। कस्ते देवो अधि मार्डीक आसीद्यत्प्राक्षिणाः पितरं पादगृह्य ॥१२॥

    स्वर रहित पद पाठ

    कः। ते। मातरम्। विधवाम्। अचक्रत्। शयुम्। कः। त्वाम्। अजिघांसत्। चरन्तम्। कः। ते। देवः। अधि। मार्डीके। आसीत्। यत्। प्र। अक्षिणाः। पितरम्। पादऽगृह्य ॥१२॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 4; सूक्त » 18; मन्त्र » 12
    अष्टक » 3; अध्याय » 5; वर्ग » 26; मन्त्र » 7
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनस्तमेव विषयमाह ॥

    अन्वयः

    हे पुत्र ! ते मातरं विधवां कोऽचक्रत् कश्चरन्तं शयुं त्वामजिघांसत् कस्ते देवो मार्डीकेऽध्यासीत् पादगृह्य यद्यस्ते पितरं प्राऽक्षिणाः ॥१२॥

    पदार्थः

    (कः) (ते) तव (मातरम्) (विधवाम्) विगतो धवः पतिर्यस्यास्ताम् (अचक्रत्) करोति (शयुम्) यः शेते तम् (कः) (त्वाम्) (अजिघांसत्) हन्तुमिच्छति (चरन्तम्) विहरन्तम् (कः) (ते) (देवः) दिव्यगुणः (अधि) उपरि (मार्डीके) सुखकरे (आसीत्) (यत्) यः (प्र) (अक्षिणाः) क्षयति हन्ति (पितरम्) जनकम् (पादगृह्य) पादान् ग्रहीतुं योग्यः ॥१२॥

    भावार्थः

    हे सन्ताना ! ये या वा युष्माकं पितॄन् हत्वा मातॄर्विधवाः कुर्य्युर्युष्मानपि घ्नन्तु तेषां विश्वासं यूयं मा कुरुत ॥१२॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

    पदार्थ

    हे पुत्र ! (ते) आपकी (मातरम्) माता को (विधवाम्) पतिहीन (कः) कौन (अचक्रत्) करता है (कः) कौन (चरन्तम्) विहार वा (शयुम्) शयन करते हुए (त्वाम्) आपको (अजिघांसत्) मारने की इच्छा करता है (कः) कौन (ते) आपके (देवः) श्रेष्ठ गुणवाला (मार्डीके) सुख करने में (अधि) सर्वोपरि (आसीत्) विराजमान हुआ है (पादगृह्य) हे पैरों को ग्रहण करने योग्य ! (यत्) जो आपके (पितरम्) उत्पन्न करनेवाले को (प्र, अक्षिणाः) नाश करता है ॥१२॥

    भावार्थ

    हे सन्तानो ! जो पुरुष वा स्त्रियाँ आप लोगों के पितरों का नाश करके माताओं को विधवा करें और आप लोगों का भी नाश करें, उनका विश्वास आप लोग न करिये ॥१२॥

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    विषय

    प्रभुविस्मरण का परिणाम

    पदार्थ

    [१] हे जीव ! (यत्) = जब तू (पितरम्) = अपने पिता को (पादगृह्य) = पाँव से पकड़कर (प्राक्षिणाः) = नष्ट कर देता है, अर्थात् जब तू अपने पिता प्रभु को बिलकुल भुला देता है, तो (कः ते) = वे प्रजापति प्रभु तेरी (मातरम्) = माता को (विधवाम्) = विधवा (अचक्रत्) = कर देते हैं, अर्थात् अवैदिक जीवनवाले सन्तान के पिता पुत्र के कार्यों से शोकातुर होकर शीघ्र ही चले जाते हैं। [२] वे (कः) = प्रजापति (शयुं चरन्तम्) = अजगर की भान्ति कुटिल मार्ग से गति करते हुए (त्वाम्) = तुझे (अजिघांसत्) = समाप्त करना चाहते हैं। प्रतिक्षण की कुटिलता कभी दीर्घ जीवन को नहीं होने देती। [३] हे जीव ! तुझे यह बिलकुल भूल ही गया कि वे (कः देवः) = प्रकाशमय प्रजापति (ते) = तेरे लिए (अधि मार्डीक) = अतिशयित सुख के निमित्त (आसीत्) = थे। प्रभु के सम्पर्क में तो तुझे आनन्द ही आनन्द था । प्रभु विमुख होकर तूने कितना अपना अकल्याण कर लिया। अपने पिताजी की भी मृत्यु का तू कारण बना। अपने जीवन को भी कुटिल बनाकर तूने असमय में ही समाप्त कर लिया। यही मंगल का मार्ग है कि तू प्रभुस्मरणपूर्वक अपने कर्त्तव्य-कर्मों के करने में प्रवृत्त रहे ।

    भावार्थ

    भावार्थ- प्रभु का विस्मरण पतन व अमंगल का मूल है।

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    विषय

    पक्षान्तर में राजा प्रजा के कर्त्तव्यों का वर्णन ।

    भावार्थ

    हे (इन्द्र) ऐश्वर्यवन् राजन् ! ऐसा तेरा कौनसा शत्रु है (यत्) जो (पादगृह्य) चरणों से पकड़ कर (ते पितरं) तेरे पालक पिता को (प्र अक्षिणाः) अच्छी प्रकार नाश कर सके। और (कः) कौन है जो (ते मातरम्) तेरी माता को (विधवाम् अचक्रत्) विधवा, पतिहीन कर सके । (चरन्तं) विहार करते हुए और (शत्रुं त्वाम्) शयन करते हुए भी (त्वाम्) तुझको (कः अजिघांसत्) कौन नाश कर सकता है । और (ते) तेरे (मार्डीके) सुख देने वाले राज्य में (कः देवः) तुझसे दूसरा कौन (देवः) राज्याभिलाषी है जो (अधि आसीत्) अध्यक्ष पद पर स्थित हो सके । तू ही राज्यासन के योग्य है । तू पिताओं के चरण धोकर आशीर्वाद लेकर अपने शत्रुजनों को (प्र अक्षिणाः) विनाश कर । इसी प्रकार पिता और तुझ पर प्रहार करने वाले, तेरा आसन हरने वाले को भी तू नाश कर । (२) अध्यात्म में—जीव परमेश्वर का ज्ञान ग्रहण करके सब दुःखों को दूर करे । कम्पन या चेतन रहित जगन्निर्मातृ प्रकृति को (कः) प्रजापति ही जगस्वरूप में बनाता है । भोक्ता अज्ञानी आत्मा को वह प्रभु ज्ञान देता है । वही उसे परम सुखमय मोक्ष में स्थापित करता है ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    वामदेव ऋषिः । इन्द्रादिती देवत ॥ छन्द:– १, ८, १२ त्रिष्टुप । ५, ६, ७, ९, १०, ११ निचात्त्रष्टुप् । २ पक्तः । ३, ४ भुरिक् पंक्ति: । १३ स्वराट् पक्तिः। त्रयोदशर्चं सूक्तम् ॥

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    हे संतानांनो ! जे पुरुष किंवा स्त्रिया तुमच्या पितराचा नाश करतात, त्यांच्यावर विश्वास ठेवू नका. ॥ १२ ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    Indra, obedient soul, holding on to the feet of the father, who can render your mother a widow? Who can hurt you while asleep or moving about? What is that supernormal power over and above your state of grace which can corrupt you? (Answer: None.)

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    The subject of teaching of children is mentioned.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    O son! who makes your mother widow? Who guides their daily routine inclusive of sleeping and waking? Who is it that slays and who should be prostrated (respected) ? Such persons should never be trusted. Who is the person endowed with divine virtues, that is, kind to you, and bestows happiness? He should be trusted and served by you.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    N/A

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    O children ! never trust the persons who make your mothers widows by killing your fathers or try to slay you.

    Translator's Notes

    Looking to the interpretations of others, Rishi Dayananda Saraswati's interpretation is simple and straightforward meaning that such wicked persons who commit such heinous crimes should never be trusted. Sayanacharya thinks that it is addressed to Indra-the King of the Gods.” हे इन्द्र । यस्मात् कारणात् पितुः सकाशात् जनिष्यमाणात् भीतः त्वं त्वदीयं पितसं पादेषु गृहीत्वा प्रकर्षेण अवधीः । (त्वत्तोऽधिकः कः प्रजानां सुखकरोऽधिकः आसीत् । Prof. Wilson's notes are “Who has made thy mother a widow ? Who has sought to slay the sleeping and the waking? What deity has been more gracious than thou, since they hast slain the father, having seized him by the foot." Prof. Wilson further states "The particulars of this incident are not related by Sayana, who contents himself with. saying the allusions are variously explained by Taittiriyakas." Griffith also repeats the same thing in slightly different words, taking them to be the words of Vishnu. "Didst thou not slay thine own father, thy father who sought to kill thee when yet unborn and when coming to the birth? Vyasa appears to be the father whom Indra slew. Sayana merely says that the allusions are variously explained by the followers of the Taittiriya school of the Yajurveda

    Foot Notes

    (अक्षिणाः) क्षयति हन्ति । = Destroys, kills ( पादगृह्य) पादान् ग्रहीतुं योग्य:। = Who deserves to be prostrated.

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