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ऋग्वेद मण्डल - 4 के सूक्त 18 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 4/ सूक्त 18/ मन्त्र 3
    ऋषिः - वामदेवो गौतमः देवता - इन्द्रादिती छन्दः - भुरिक्पङ्क्ति स्वरः - पञ्चमः

    प॒रा॒य॒तीं मा॒तर॒मन्व॑चष्ट॒ न नानु॑ गा॒न्यनु॒ नू ग॑मानि। त्वष्टु॑र्गृ॒हे अ॑पिब॒त्सोम॒मिन्द्रः॑ शतध॒न्यं॑ च॒म्वोः॑ सु॒तस्य॑ ॥३॥

    स्वर सहित पद पाठ

    प॒रा॒ऽय॒तीम् । मा॒तर॑म् । अनु॑ । अ॒च॒ष्ट॒ । न । न । अनु॑ । गा॒नि॒ । अनु॑ । नु । ग॒मा॒नि॒ । त्वष्टुः॑ । गृ॒हे । अ॒पि॒ब॒त् । सोम॑म् । इन्द्रः॑ । श॒त॒ऽध॒न्य॑म् । च॒म्वोः॑ । सु॒तस्य॑ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    परायतीं मातरमन्वचष्ट न नानु गान्यनु नू गमानि। त्वष्टुर्गृहे अपिबत्सोममिन्द्रः शतधन्यं चम्वोः सुतस्य ॥३॥

    स्वर रहित पद पाठ

    पराऽयतीम्।। मातरम्। अनु। अचष्ट। न। न। अनु। गानि। अनु। नु। गमानि। त्वष्टुः। गृहे। अपिबत्। सोमम्। इन्द्रः। शतऽधन्यम्। चम्वोः। सुतस्य ॥३॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 4; सूक्त » 18; मन्त्र » 3
    अष्टक » 3; अध्याय » 5; वर्ग » 25; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथेन्द्राय सेनासंरक्षणविषयमाह ॥

    अन्वयः

    यथेन्द्रस्त्वष्टुर्गृहे सुतस्य शतधन्यं सोमं चम्वोरपिबत् परायतीं मातरं नाऽन्वचष्ट तथाऽहं न्वनुगानि तथाऽहं नानुगमानि ॥३॥

    पदार्थः

    (परायतीम्) म्रियमाणाम् (मातरम्) जननीम् (अनु) (अचष्ट) ख्यापयेत् (न) (न) (अनु) (गानि) गच्छेयम् (अनु) (नु) सद्यः (गमानि) गच्छेयम् (त्वष्टुः) प्रकाशस्य (गृहे) (अपिबत्) पिबति (सोमम्) ओषधिरसम् (इन्द्रः) शत्रुविदारकः सेनेशः (शतधन्यम्) असङ्ख्ये धने साधुम् (चम्वोः) सेनयोर्मध्ये (सुतस्य) निष्पन्नस्यैश्वर्यस्य ॥३॥

    भावार्थः

    अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। ये सेनाधीशा राजगृहे सत्कारं प्राप्य युक्ताऽऽहारविहाराभ्यां पूर्णं बलं निष्पाद्य द्वयोः स्वस्य शत्रूणां च सेनयोर्मध्ये विवादं विनाशेयुर्वा योधयेयुस्तेषां सदैव विजयो यथा रुग्णां मातरमपत्यानि सेवन्ते तथैव सेनायाः सेवनं कुर्वन्ति ते न्यायाऽनुगामिनो भवन्ति ॥३॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    अब उत्तम ऐश्वर्यवान् राजा के लिये सेना के संरक्षण विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

    पदार्थ

    जैसे (इन्द्रः) शत्रुओं का नाश करनेवाला सेना का ईश (त्वष्टुः) प्रकाश के (गृहे) स्थान में (सुतस्य) ऐश्वर्य्य से युक्त के (शतधन्यम्) असंख्य धन में साधु (सोमम्) ओषधियों के रस को (चम्वोः) सेनाओं के मध्य में (अपिबत्) पीता है (परायतीम्) और मरनेवाली (मातरम्) माता को (न) नहीं (अनु, अचष्ट) प्रसिद्ध करे, वैसे मैं (नु) शीघ्र (अनु, गानि) पीछे जाऊँ और वैसे मैं (न)(अनु, गमानि) पीछे जाऊँ ॥३॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो सेना के अधीश राजगृह में सत्कार को प्राप्त होकर, नियमित आहार और विहार से पूर्ण बल को करके, दोनों अपनी और शत्रुओं की सेना के मध्य में विवाद का नाश करें वा युद्ध करावें, उनका सदा ही विजय और जैसे रोगग्रस्त माता की सन्तान सेवा करते हैं, वैसे ही सेना का सेवन करते हैं, वे न्याय के अनुगामी होते हैं ॥३॥

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    विषय

    वेदमाता का अनुसरण [follower बनना]

    पदार्थ

    [१] आत्मालोचन करनेवाला पुरुष (परायतीम्) = दूर जाती हुई (मातरम्) = इस वेदमाता को (अन्वचष्ट) = देखता है। देखता है कि यह वेदमाता मेरे से दूर और दूर होती जाती है- मैं इसका स्वाध्याय ठीक रूप में नहीं कर रहा। ऐसा देखकर वह निश्चय करता है कि (न न अनुगानि) = 'मैं इसके पीछे नहीं जाता' ऐसी बात नहीं। (नू) = निश्चय से (अनुगमानि) = इसके पीछे जाता ही हूँ। मैं इसका अनुसरण अवश्य करता हूँ। [२] इसी उद्देश्य से (त्वष्टुः) = उस निर्माता प्रभु के गृहे बनाए हुए इस शरीररूप गृह में (इन्द्रः) = एक जितेन्द्रिय पुरुष (सोमं अपिबत्) = सोम का पान करता है। सोम को शरीर में ही सुरक्षित करता है। इस सुरक्षित सोम से ही सूक्ष्म बुद्धिवाला बनकर वह वेदमाता को समझनेवाला बनता है। उस सोम का इन्द्र पान करता है, जो कि (सुतस्य) = सोम का उत्पादन करनेवाले उस निर्माता प्रभु के (चम्वोः) = इन द्यावापृथिवी में-मस्तिष्क व शरीर में (शतधन्यम्) = शतवर्ष पर्यन्त उत्तम धन को स्थापित करनेवाला है। यह सोम मस्तिष्क में ज्ञानधन की स्थापना करता है, तो शरीर में शक्तिधन की ।

    भावार्थ

    भावार्थ – वेदमाता का हमें अनुगमन करना चाहिए। इसके अनुगमन कर सकने के लिए शरीर में सोमरक्षण द्वारा बुद्धि को सूक्ष्म बनाना चाहिए।

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    विषय

    मुग्ध पुरुष के समान, आत्मा की गति । और विवेक की प्राप्ति ।

    भावार्थ

    जिस प्रकार (इन्द्रः) ऐश्वर्यवान् पुरुष (परायतीं) परलोक जाती हुई (मातरम् अनु अचष्ट) माता को देख कर मोहवश कहता है कि (न न अनुगानि) न मैं इसके पीछे ही चला जाऊं, न ? अर्थात् चला ही जाऊं (अनु नु गमानि) क्यों चला जाऊं ? न जाऊं । इस प्रकार तर्क से निर्धारण करके वह बाद में (त्वष्टुः गृहे) ज्ञान प्रकाशक गुरु और उत्पादक पिता के घर में (चम्वोः सुतस्य) माता पिता व पुत्र पद पर रहकर (शतधन्यं सोमम्) सैकड़ों धनों से युक्त ऐश्वर्य का (अपिबत्) भोग करता है । उसी प्रकार (इन्द्रः) यह आत्मा जीव (परायतीम्) दूर जाती हुई (मातरम्) जगत् निर्माण करने वाली माता, प्रकृति को (अनु अचष्ट) विवेक पूर्वक देखे, (न न अनुगानि) क्यों न इसके पीछे अनुगमन करूं (नु अनुगानि) और क्यों इसके पीछे जाय, क्यों प्रकृति बन्धन में पडूं और क्यों न पडूं, ऐसा विवेक प्राप्त करके यह आत्मा (त्वष्टा) संसार के निर्माता प्रभु परमेश्वर के (गृहे) शरण में जाकर (चम्वोः सुतस्य) प्राण और अपान दोनों के बीच में उत्पन्न (सोमम्) अध्यात्म रस का पान करे । राज्यपक्ष में—(परायतीम् मातरम् अनु अचष्ट) राजा अपने से परे जाती, विमुख मातृ तुल्य राष्ट्रशक्ति को भी अनुकूल करके कहे (न न अनुगानि) तुम्हारे पीछे नहीं चलता ऐसा नहीं (नु अनुगानि) तुम्हारे कहे का अनुसरण ही करता हूं। इस प्रकार राष्ट्र के प्रजावर्ग का अनुनय करके (चम्वोः) स्व पक्ष और पर पक्ष दोनों सेनाओं के बीच (सुतस्य) संघर्ष से उत्पन्न राज्य के (शतधन्यं) सैकड़ों धनों से युक्त (सोमम्) ऐश्वर्यं को (त्वष्टुः) तेजस्वी सूर्य के पद पर विराज कर (अपिबत्) उपभोग करे ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    वामदेव ऋषिः । इन्द्रादिती देवत ॥ छन्द:– १, ८, १२ त्रिष्टुप । ५, ६, ७, ९, १०, ११ निचात्त्रष्टुप् । २ पक्तः । ३, ४ भुरिक् पंक्ति: । १३ स्वराट् पक्तिः। त्रयोदशर्चं सूक्तम् ॥

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जे सेनाधीश राजगृहात सत्कार प्राप्त करून नियमित आहार-विहाराने पूर्ण बल प्राप्त करतात त्यांनी आपल्या व शत्रूच्या सेनेतील विवादाचा नाश करावा किंवा युद्ध करावे, तेव्हाच त्यांचा विजय होतो. जशी रोगी मातेची सेवा संतान करते, तसा सेनेचा स्वीकार जे करतात ते न्यायी असतात. ॥ ३ ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    I see the mother passing away, neither anyone going with nor anyone following after. Indra, the spirit of life, by itself in the house of Tvashta, divine artificer, receives a hundredfold joy of earthly form and drinks the soma of the ecstasy of living in the cup of existence fashioned by the maker.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    Maintaining of the army for the Indra (King or Commander-in-chief of the Army) is underlined.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    The Indra (Commander of the Army) is the destroyer of enemies, drinks the Soma juice. It is very valuable, invigorating, placed in-between the armies and extracted in the house of an enlightened person (Vaidya). It never neglects, rather serves whole-heartedly the dying mother (decaling the state in their motherland). I should also emulate and should not adopt the "ways of the wicked persons.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    N/A

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    The commanders of the Army having received honor at the state function, and having acquired perfect strength by regular diet and exercise, settle disputes among the army men and others. Thus they achieve victory. The kings who serve the army men like their own sons, serve their ill mother (declining state in their motherland) and follow the path of justice.

    Foot Notes

    (परायतीम् ) म्रियमाणाम् । = Dying. (इन्द्रः) शत्रुविदारक : सेनेश: । इन्द्रः इन्दन् शत्रूणां दारयिता वा वारयिता वा (NKT 7, 2 ) । = The Commander of the Army who is destroyer of the enemies. ( त्वष्टुः) प्रकाशस्य । = Of the Enlighted person.

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