ऋग्वेद - मण्डल 4/ सूक्त 18/ मन्त्र 13
ऋषिः - वामदेवो गौतमः
देवता - इन्द्रादिती
छन्दः - स्वराट्पङ्क्ति
स्वरः - पञ्चमः
अव॑र्त्या॒ शुन॑ आ॒न्त्राणि॑ पेचे॒ न दे॒वेषु॑ विविदे मर्डि॒तार॑म्। अप॑श्यं जा॒यामम॑हीयमाना॒मधा॑ मे श्ये॒नो मध्वा ज॑भार ॥१३॥
स्वर सहित पद पाठअव॑र्त्या । शुनः॑ । आ॒न्त्राणि॑ । पे॒चे॒ । न । दे॒वेषु॑ । वि॒वि॒दे॒ । म॒र्डि॒तार॑म् । अप॑श्यम् । जा॒याम् । अम॑हीयमानाम् । अध॑ । मे॒ । श्ये॒नः । मधु॑ । आ । ज॒भा॒र॒ ॥
स्वर रहित मन्त्र
अवर्त्या शुन आन्त्राणि पेचे न देवेषु विविदे मर्डितारम्। अपश्यं जायाममहीयमानामधा मे श्येनो मध्वा जभार ॥१३॥
स्वर रहित पद पाठअवर्त्या। शुनः। आन्त्राणि। पेचे। न। देवेषु। विविदे। मर्डितारम्। अपश्यम्। जायाम्। अमहीयमानाम्। अध। मे। श्येनः। मधु। आ। जभार ॥१३॥
ऋग्वेद - मण्डल » 4; सूक्त » 18; मन्त्र » 13
अष्टक » 3; अध्याय » 5; वर्ग » 26; मन्त्र » 8
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अष्टक » 3; अध्याय » 5; वर्ग » 26; मन्त्र » 8
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुना राजविषयमाह ॥
अन्वयः
हे इन्द्र ! यो मेऽमहीयमानां जायां श्येन इवाऽऽजभाराऽधा शुनोऽवर्त्याऽऽन्त्राणीव शरीरं पेचे तस्मान्मर्डितारं त्वामहमपश्यं स यथा देवेषु मधु न विविदे तथा तं भृशं दण्डय ॥१३॥
पदार्थः
(अवर्त्या) अवर्त्तनीयानि (शुनः) कुक्कुरस्येव (आन्त्राणि) उदरस्थाः स्थूला नाडी (पेचे) पचति (न) (देवेषु) विद्वत्सु (विविदे) लभते (मर्डितारम्) सुखकरम् (अपश्यम्) पश्येयम् (जायाम्) स्त्रियम् (अमहीयमानाम्) असत्कृताम् (अधा) निपातस्य चेति दीर्घः। (मे) मम (श्येनः) श्येन इव शीघ्रगन्ता (मधु) मधुरं विज्ञानम् (आ) सर्वतः (जभार) हरति ॥१३॥
भावार्थः
अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। हे राजन् ! ये पुरुषा याः स्त्रियश्च व्यभिचारं कुर्युस्तांस्तीव्रं दण्डं नीत्वा विनाशय ॥१३॥ अत्रेन्द्रमेघराजविद्वत्कृत्यवर्णनादेतदर्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह सङ्गतिर्वेद्या ॥१३॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्येण दयानन्दसरस्वतीस्वामिना विरचिते संस्कृतार्यभाषाभ्यां विभूषिते सुप्रमाणयुक्त ऋग्वेदभाष्ये तृतीयाष्टके पञ्चमोऽध्यायोऽष्टादशं सूक्तं षड्विंशो वर्गश्च समाप्तः ॥
हिन्दी (3)
विषय
फिर राजविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥
पदार्थ
हे राजन् ! जो (मे) मेरी (अमहीयमानाम्) नहीं सत्कार की गई (जायाम्) स्त्री को (श्येनः) वाज पक्षी के सदृश शीघ्र चलनेवाला सब ओर से (आ, जभार) हरता है (अधा) इसके अनन्तर (शुनः) कुत्ते की (अवर्त्या) नहीं वर्त्तने योग्य (आन्त्राणि) और उठे हैं हाड़ जिनसे उन स्थूल नाड़ियों के सदृश शरीर को (पेचे) पचाता है, इससे (मर्डितारम्) सुख करनेवाले आपका मैं (अपश्यम्) दर्शन करूँ। वह जैसे (देवेषु) विद्वानों में (मधु) मधुर विज्ञान को (न) नहीं (विविदे) प्राप्त होता है, वैसे उसको निरन्तर दण्ड दीजिये ॥१३॥
भावार्थ
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजन् ! जो पुरुष और स्त्रियाँ व्यभिचार करें, उनको तीव्र दण्ड देकर नाश करो ॥१३॥ इस सूक्त में इन्द्र, मेघ, राजा और विद्वान् के कृत्य वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥१३॥ यह तृतीय अष्टक में पाँचवाँ अध्याय अठारहवाँ सूक्त और छब्बीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
विषय
दुर्गति
पदार्थ
[१] गतमन्त्र के प्रकरण में ही कहते हैं कि प्रभु को भूल जाने पर मैं (अवर्त्या) = जीवनोपाय के अभाव में गरीबी में (शुनः आन्त्राणि) = कुत्ते की आंतों को (पेचे) = पकानेवाला बना । कुत्ते की आंतों को ही पकाकर मुझे अपनी भूख मिटानी पड़ी। कितनी भयंकर दरित्रता में मैं पड़ा ! [२] (देवेषु) = सूर्य आदि देवों में किसी भी देव को (मर्डितारम्) = सुख देनेवाला (न विविदे) = मैंने नहीं पाया। पाप के परिणामस्वरूप देवों की भी प्रतिकूलता हो जाती है। पापी पर आधिदैविक आपत्तियाँ भी आ पड़ती हैं। [३] मैंने इस पापवृत्ति के परिणामस्वरूप (जायाम्) = अपनी पत्नी को भी (अमहीयमानाम्) = निरादृत होती हुई को तथा मेरा ही निरादर करती हुई को (अपश्यम्) = देखा। इससे अधिक दुर्गति क्या हो सकती है? [४] इस स्थिति से घबराकर व भयभीत होकर जब मैंने प्रभु का स्मरण किया, तो (अधा) = तब उस (श्येनः) = गतिशील प्रभु ने (मे) = मेरे लिए (मधु आजभार) = मधु को प्राप्त कराया । प्रभुकृपा से मेरा जीवन अतिशयेन मधुर बना गया। अवर्ति समाप्त हो गई। सब देव अनुकूल हो गए। पत्नी भी उचित सम्मान को प्राप्त करती हुई मुझे उचित आदर देनेवाली हुई। इस प्रकार जीवन की सब कटुता कट गयी और माधुर्य का अनुभव हुआ।
भावार्थ
भावार्थ- प्रभुविस्मरण से उत्पन्न दुर्गति प्रभुस्मरण से ही दूर होती है और जीवन मधुर बन जाता है। सारे सूक्त में जीवन को वैदिक बनाने पर बल दिया गया है। प्रभुस्मरण जीवन को वैदिकजीवन बनाने में बड़ा सहायक है। प्रभु ने ही तो वासनाओं का विनाश करना है
विषय
पक्षान्तर में राजा प्रजा के कर्त्तव्यों का वर्णन ।
भावार्थ
अध्यात्मदर्शी कहता है (अवर्त्या) जन्म मरण के व्यापार से रहित होकर मैं (शुनः) सुखस्वरूप होकर अथवा (अवर्त्या) पुनः इस संसार में न होने के निमित्त से ही (शुनः) शुख कर परमेश्वर के (आन्त्राणि) ज्ञान कराने वाले गुह्य साधनों को (पेचे) परिपक्व करूं। (देवेषु) पृथिवी सूर्यादि एवं विषय के अभिलाषी इन्द्रियों के बीच में मैं (मर्डितारम्) किसी को भी परम सुख देने वाला (न विविदे) नहीं पाता हूं । अथवा मैं अज्ञानी पुरुष (अवर्त्या) लाचार, अगतिक होकर (शुनः) कुत्ते के समान लोभी आत्मा के (आन्त्राणि) भीतरी आतों के तुल्य इन (आन्त्राणि) ज्ञान साधन इन्द्रियों को ही (पेचे) परिपक्व किया उन को तपः-साधना से वश किया और उन (देवेषु) विषयाभिलाषुक प्राणों में से एक को भी सुखप्रद नहीं पाया अनन्तर (जायाम्) इस संसार उत्पन्न करने वाली प्रकृति को भी मैंने (अमहीयमाना) महती परमेश्वरी शक्ति के तुल्य नहीं (अपश्यम्) देखा । इतना ज्ञान कर लेने के अनन्तर (श्येनः) ज्ञानस्वरूप प्रभु परमेश्वर (मे) मुझे (मधु) परम मधुर ब्रह्मज्ञान (आजभार) प्रदान करता है । (२) राज्यपक्ष में—मैं प्रजाजन जब (अवर्त्या) दारिद्रय प्रेरित होकर कुत्ते के भी आतों का पकाता हूं और प्रमादी लोगों में किसी को भी सुखप्रद नहीं पाता, अपनी स्त्रियों तक की दुर्दशा होती देखूं उस समय (श्येनः) वाज़ के समान वीर पुरुष मेरी रक्षार्थ (मधु) उत्तम अन्न और शत्रुपीड़क बल प्राप्त करावे । इति षड्विंशो वर्गः ॥ इति पञ्चमोऽध्यायः ॥ अथ षष्ठोऽध्यायः ।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
वामदेव ऋषिः । इन्द्रादिती देवत ॥ छन्द:– १, ८, १२ त्रिष्टुप । ५, ६, ७, ९, १०, ११ निचात्त्रष्टुप् । २ पक्तः । ३, ४ भुरिक् पंक्ति: । १३ स्वराट् पक्तिः। त्रयोदशर्चं सूक्तम् ॥
मराठी (1)
भावार्थ
या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. हे राजा ! जे पुरुष व स्त्रिया व्यभिचार करतात त्यांना कठोर दंड देऊन त्यांचा नाश करा. ॥ १३ ॥
इंग्लिश (2)
Meaning
At peace beyond fluctuations of the mind, I ripen and refine the inner visions. I see no saviour either in the experience of the senses or among the external powers of nature. Indeed, I have seen even Mother Nature insulted and desecrated. Ultimately it is the bird of heaven that brings me the divine message, nectar sweets of the honey of real life.
Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]
The duties of a ruler are stated.
Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]
O king! I see you as one who provides protection from the mean person, who elopes with my disrespected wife like a falcon. Such a wicked person can not achieve genuine knowledge from the enlightened persons. You must severe your connections from such a man.
Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]
N/A
Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]
O king! you should destroy men and women of debaucherous nature after giving them severe punishment.
Foot Notes
(श्येनः ) श्येन इव शीघ्रगन्ता । = Swift like a hawk. (अमहीयमानाम्) असत्कृताम् । = Disrespected. (मधु ) मधुरं विज्ञानम् । = Sweet knowledge.
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