ऋग्वेद - मण्डल 7/ सूक्त 31/ मन्त्र 8
तं त्वा॑ म॒रुत्व॑ती॒ परि॒ भुव॒द्वाणी॑ स॒याव॑री। नक्ष॑माणा स॒ह द्युभिः॑ ॥८॥
स्वर सहित पद पाठतम् । त्वा॒ । म॒रुत्व॑ती । परि॑ । भुव॑त् । वाणी॑ । स॒ऽयाव॑री । नक्ष॑माणा । स॒ह । द्युऽभिः॑ ॥
स्वर रहित मन्त्र
तं त्वा मरुत्वती परि भुवद्वाणी सयावरी। नक्षमाणा सह द्युभिः ॥८॥
स्वर रहित पद पाठतम्। त्वा। मरुत्वती। परि। भुवत्। वाणी। सऽयावरी। नक्षमाणा। सह। द्युऽभिः ॥८॥
ऋग्वेद - मण्डल » 7; सूक्त » 31; मन्त्र » 8
अष्टक » 5; अध्याय » 3; वर्ग » 16; मन्त्र » 2
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अष्टक » 5; अध्याय » 3; वर्ग » 16; मन्त्र » 2
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
कः प्रशंसनीयः स्यादित्याह ॥
अन्वयः
हे विद्वन् ! यं त्वा मरुत्वती सयावरी नक्षमाणा वाणी द्युभिः सह परिभुवत्तं त्वा वयं सर्वतो भूषयेम ॥८॥
पदार्थः
(तम्) (त्वा) त्वाम् (मरुत्वती) प्रशस्ता मरुतो मनुष्या विद्यन्ते यस्यां सा (परि) (भुवत्) भवेत् (वाणी) वाक् (सयावरी) या सहैव याति (नक्षमाणा) सर्वासु विद्यासु व्याप्नुवती (सह) (द्युभिः) विज्ञानादिप्रकाशैः ॥८॥
भावार्थः
यस्य विदुषो राज्ञ उपदेशकस्य वा सकलविद्यायुक्ता वाणी उत्तमा कार्यकरा उपदेश्या वा स्यात् स एव सर्वा प्रशंसामर्हति ॥८॥
हिन्दी (3)
विषय
कौन प्रशंसा करने योग्य हो, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥
पदार्थ
हे विद्वान् ! जिन (त्वा) आपको (मरुत्वती) जिसमें प्रशंसायुक्त मनुष्य विद्यमान (सयावरी) जो साथ जाती (नक्षमाणा) और सब विद्याओं में व्याप्त होती हुई (वाणी) वाणी (द्युभिः) विज्ञानादि प्रकाशों के (सह) साथ (परि, भुवत्) सब ओर से प्रसिद्ध हो (तम्) उन आपको हम लोग सब ओर से भूषित करें ॥८॥
भावार्थ
जिस विद्वान् राजा वा उपदेशक विद्वान् की सकलविद्यायुक्त वाणी उत्तम और कार्य करनेवाले उपदेश के योग्य हो, वही सब प्रशंसा को योग्य होता है ॥८॥
विषय
राजा सदा स्तुत्य हो ।
भावार्थ
हे राजन् ! विद्वन् ! ( मरुत्वती ) बलवान् मनुष्यों वाली, ( स-यावरी ) तेरे साथ प्रयाण करने वाली ( द्युभिः सह ) तेजों, धनों के साथ बढ़ती हुई, ( वाणी ) शत्रुहिंसक वाक् आदि शस्त्रों से सम्पन्न सेना ( तं त्वा परि भुवत् ) उस तुझको सदा घेरे रहे, वह सदा तेरी आज्ञाकारिणी हो । और तुझको ( मरुस्वती वाणी ) मनुष्यों की स्तुति उत्तम गुणों सहित वाणी प्राप्त हो । और विद्वान् को ( द्युभिः सह नक्षमाणा ) तेजों, उत्तम गुणों और काम्य फलों से युक्त (स-यावरी) सदा साथ विद्यमान ( मरुत्वती ) उत्तम विद्वानों से प्राप्त ( वाणी ) वाणी, वेदविद्या, ( परि भुवत् ) सुशोभित करे ।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
वसिष्ठ ऋषिः ॥ इन्द्रो देवता । छन्दः – १ विराड् गायत्री । २,८ गायत्री । ६, ७, ९ निचृद्गायत्री । ३, ४, ५ आर्च्युष्णिक् । १०, ११ भुरिगनुष्टुप् । १२ अनुष्टुप् ।। द्वादशर्चं सूक्तम् ।।
विषय
विद्वान् वेदविद्या को सुशोभित करे
पदार्थ
पदार्थ- हे राजन्, (मरुत्वती) = बलवान् मनुष्योंवाली, (सयावरी) = साथ जानेवाली (द्युभिः सह) = तेजों, धनों से बढ़ती हुई (वाणी) = शत्रुहिंशक बाण आदि शस्त्र - सम्पन्न सेना (तं त्वा परि भुवत्) = उस तुझको घेरे रहे, तुझको (मरुत्वती वाणी) = मनुष्यों की स्तुति, गुणों सहित वाणी प्राप्त हो और विद्वान् को (द्युभिः सह नक्षमाणा) = तेजों, गुणों से युक्त (सयावरी) = सदा साथ विद्यमान (मरुत्वती) = उत्तम विद्वानों से प्राप्त (वाणी) = वेदविद्या, (परि भुवत्) = सुशोभित करे।
भावार्थ
भावार्थ- जैसे राजा समस्त ऐश्वर्य को प्रजा में वितरण कर स्वयं सुशोभित होता है। उसी प्रकार विद्वान् को चाहिए कि वह वेदविद्या का राष्ट्र की जनता में प्रचार कर सन्मार्ग में प्रेरित करता हुआ सम्मानित होकर सुशोभित होवे।
मराठी (1)
भावार्थ
ज्या विद्वान राजा किंवा उपदेशक विद्वानाची संपूर्ण विद्यायुक्त वाणी उत्तम व उपदेशकाच्या योग्य असेल तर तो प्रशंसायोग्य असतो. ॥ ८ ॥
इंग्लिश (1)
Meaning
The voice of admiration, expression of your essential nature and power, raised by vibrant humanity, reaching you incessantly with the light and truth of your power and performance, may ever abide around you.
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