ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 6/ मन्त्र 31
ऋषिः - वत्सः काण्वः
देवता - इन्द्र:
छन्दः - विराडार्षीगायत्री
स्वरः - षड्जः
कण्वा॑स इन्द्र ते म॒तिं विश्वे॑ वर्धन्ति॒ पौंस्य॑म् । उ॒तो श॑विष्ठ॒ वृष्ण्य॑म् ॥
स्वर सहित पद पाठकण्वा॑सः । इ॒न्द्र॒ । ते॒ । म॒तिम् । विश्वे॑ । व॒र्ध॒न्ति॒ । पौंस्य॑म् । उ॒तो इति॑ । श॒वि॒ष्ठ॒ । वृष्ण्य॑म् ॥
स्वर रहित मन्त्र
कण्वास इन्द्र ते मतिं विश्वे वर्धन्ति पौंस्यम् । उतो शविष्ठ वृष्ण्यम् ॥
स्वर रहित पद पाठकण्वासः । इन्द्र । ते । मतिम् । विश्वे । वर्धन्ति । पौंस्यम् । उतो इति । शविष्ठ । वृष्ण्यम् ॥ ८.६.३१
ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 6; मन्त्र » 31
अष्टक » 5; अध्याय » 8; वर्ग » 15; मन्त्र » 1
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अष्टक » 5; अध्याय » 8; वर्ग » 15; मन्त्र » 1
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भाष्य भाग
संस्कृत (2)
पदार्थः
(शविष्ठ) हे बलवत्तम (इन्द्र) परमात्मन् ! (विश्वे, कण्वासः) सर्वे विद्वांसः (ते) तव (मतिम्) ज्ञानं (पौंस्यम्) पुरुषार्थम् (उत) अथ (वृष्ण्यम्) बलयुक्तकर्म च (वर्धन्ति) वर्धयन्ति ॥३१॥
विषयः
विदुषां कर्त्तव्यमाचष्टे ।
पदार्थः
पितृधनं सुपुत्रा इव विद्वांस ईश्वरप्रदत्तं सर्वं वस्तु वर्धयन्ति । अस्माभिरपि तथा कर्त्तव्यमित्यनया शिक्षते । यथा−हे इन्द्र ! ते=तव प्रदत्ताम् । मतिम्=बुद्धिम् । पौंस्यम्=पुंस्त्वं पौरुषञ्च । विश्वे=सर्वे । कण्वासः=तव भक्ताः स्तुतिपाठकाः । वर्धन्ति=वर्धयन्ति । श्रवणमनननिदिध्यासनैर्विस्तारयन्ति । हे शविष्ठ=शवस्वितम ! बलवत्तम । विन्मतोर्लुक्टेरिति टिलोपः । हे इन्द्र ! उतो=अपि च । वृष्ण्यम्=वृषत्वं ज्ञानादिवर्षयितृत्वञ्च वर्धयन्ति । क्षणमपि ते व्यर्थं न यापयन्तीयर्त्थः ॥३१ ॥
हिन्दी (4)
पदार्थ
(शविष्ठ) हे अत्यन्त बलवाले (इन्द्र) परमात्मन् ! (विश्वे, कण्वासः) सब विद्वान् (ते) आपके (मतिम्) ज्ञान (पौंस्यम्) प्रयत्न (उत) तथा (वृष्ण्यम्) बलयुक्त कर्म को (वर्धन्ति) बढ़ाते हैं ॥३१॥
भावार्थ
उस अनन्त पराक्रमयुक्त परमात्मा के ज्ञान, प्रयत्न तथा कर्मों की सब विद्वान् लोग प्रशंसा करते हुए उनको बढ़ाते अर्थात् प्रशंसायुक्त वाणियों से उनका विस्तार करते हैं ॥३१॥
विषय
विद्वानों का कर्त्तव्य कहते हैं ।
पदार्थ
जैसे सुपुत्र पैतृक धन को वैसे ही विद्वान् ईश्वरप्रदत्त सर्ववस्तु को बढ़ाते हैं । हम साधारण जनों को भी वैसा करना चाहिये, यह शिक्षा इससे दी जाती है । यथा−(इन्द्र) हे इन्द्र ! (ते) आपकी दी हुई (मतिम्) बुद्धि को तथा (पौंस्यम्) पुरुषार्थ को (विश्वे) सब (कण्वासः) भक्तजन (वर्धन्ति) बढ़ाते रहते हैं (शविष्ठ) हे बलवत्तम सर्वशक्तिमन् इन्द्र ! (उतो) और वे विद्वान् (वृष्ण्यम्) प्रजाओं में ज्ञानादिधनों की वर्षा करने की शक्ति को भी बढ़ाते ही रहते हैं । वे क्षणमात्र भी व्यर्थ नहीं बिताते । हे मनुष्यों ! तुम भी विद्वानों का अनुकरण करो ॥३१ ॥
भावार्थ
ईश्वर ने हम लोगों को बहुत से अद्भुत पदार्थ दिए हैं, जैसे इस शरीर में बुद्धि, विवेक और स्मरणशक्ति आदि और बाह्यजगत् में नाना खाद्य पेय आदि पदार्थ मेधावी उनको पाकर और अच्छे प्रकार बढ़ाकर महा महा धनी होते हैं, परन्तु मूढजन उनको पाकर दुःख भोगते हैं, यह आश्चर्य की बात है ॥३१ ॥
विषय
पिता प्रभु । प्रभु और राजा से अनेक स्तुति-प्रार्थनाएं ।
भावार्थ
हे ( इन्द्र ) ऐश्वर्यवन् ! हे ( शविष्ठ ) महान् शक्तिमन् ! ( विश्वे ) समस्त ( कण्वासः ) बुद्धिमान् पुरुष ( ते मतिं ) तेरे दिये ज्ञान को ( ते पौंस्यं ) तेरे दिये पौरुष युक्त बल, पराक्रम ( उतो ) और ( ते वृष्णयम् ) तेरे दिये सुखवर्षी, बलवीर्य, धन धान्यादि को भी (वर्धन्ति) बढ़ाते हैं ।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
वत्सः काण्व ऋषिः ॥ १—४५ इन्द्रः। ४६—४८ तिरिन्दिरस्य पारशव्यस्य दानस्तुतिर्देवताः॥ छन्दः—१—१३, १५—१७, १९, २५—२७, २९, ३०, ३२, ३५, ३८, ४२ गायत्री। १४, १८, २३, ३३, ३४, ३६, ३७, ३९—४१, ४३, ४५, ४८ निचृद् गायत्री। २० आर्ची स्वराड् गायत्री। २४, ४७ पादनिचृद् गायत्री। २१, २२, २८, ३१, ४४, ४६ आर्षी विराड् गायत्री ॥
विषय
मति-पौंस्य-वृष्ण्य
पदार्थ
[१] हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो ! (विश्वे कण्वासः) = सब मेधावी पुरुष (ते) = आप से दी जानेवाली (मतिम्) = बुद्धि को तथा (पौंस्यम्) = पुरुषार्थ को (वर्धन्ति) = बढ़ाते हैं। प्रभु की उपासना के मार्ग में चलनेवाले लोग बुद्धि और पौरुष के बढ़ाने के लिये सदा यत्नशील होते हैं। [२] हे (शविष्ठ) = सर्वोत्तम शक्ति सम्पन्न प्रभो ! (उत) = और (उ) = निश्चय से ये मेधावी पुरुष (वृष्ण्यम्) = अपने वीर्य को बढ़ाते हैं। वीर्य को बढ़ाने का भाव शरीर में इसे सुरक्षित रखने से ही है। प्रकृति प्रवण पुरुष भोगों की ओर झुककर वीर्य का विनाश कर बैठता है, प्रभु-भक्त वीर्य का रक्षण करता है। यह वीर्यरक्षण उसकी मनोवृत्ति व मस्तिष्क दोनों को सुन्दर बनाता है।
भावार्थ
भावार्थ- मेधावी पुरुष प्रभु का उपासन करते हुए 'बुद्धि पौरुष व वीर्य' का वर्धन करते हैं।
इंग्लिश (1)
Meaning
Indra, lord most potent, all the learned sages of the world celebrate and exalt your omniscience, creative power and universal generosity.
मराठी (1)
भावार्थ
त्या अनंत पराक्रमयुक्त परमेश्वराचे ज्ञान, प्रयत्न व कर्मांची सर्व विद्वान लोक प्रशंसा करत त्यात वृद्धी करतात. अर्थात् वाणीने त्यांचा विस्तार करतात. ॥३१॥
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