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ऋग्वेद मण्डल - 8 के सूक्त 6 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 6/ मन्त्र 42
    ऋषिः - वत्सः काण्वः देवता - इन्द्र: छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः

    अ॒स्माकं॑ त्वा सु॒ताँ उप॑ वी॒तपृ॑ष्ठा अ॒भि प्रय॑: । श॒तं व॑हन्तु॒ हर॑यः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒स्माक॑म् । त्वा॒ । सु॒तान् । उप॑ । वी॒तऽपृ॑ष्ठाः । अ॒भि । प्रयः॑ । श॒तम् । व॒ह॒न्तु॒ । हर॑यः ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अस्माकं त्वा सुताँ उप वीतपृष्ठा अभि प्रय: । शतं वहन्तु हरयः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अस्माकम् । त्वा । सुतान् । उप । वीतऽपृष्ठाः । अभि । प्रयः । शतम् । वहन्तु । हरयः ॥ ८.६.४२

    ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 6; मन्त्र » 42
    अष्टक » 5; अध्याय » 8; वर्ग » 17; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    संस्कृत (2)

    पदार्थः

    (अस्माकम्, सुतान्, उप) अस्माकं संस्कृतस्वभावान् उपलक्ष्य (प्रयः, अभि) अस्मदीयं हविरभिलक्ष्य (वीतपृष्ठाः) कमनीयस्वरूपाः (हरयः) हरणशीलशक्तयः (त्वा) त्वाम् (वहन्तु) आप्रापयन्तु ॥४२॥

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    विषयः

    अनयेशदर्शनाय प्रार्थ्यते ।

    पदार्थः

    हे इन्द्र ! अस्माकं शतमनेके । हरयः=इन्द्रियाणि । त्वा=त्वाम् । सुतान्=पदार्थान् । उप=उपलक्ष्य । प्रयोऽन्नं खाद्यं वस्तु । अभि=अभिलक्ष्य च । वहन्तु=आनयन्तु=प्रकाशयन्तु । कीदृशा हरयः । वीतपृष्ठाः=शुद्धपृष्ठाः=शान्ता इत्यर्थः ॥४२ ॥

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    हिन्दी (4)

    पदार्थ

    (अस्माकम्, सुतान्, उप) हमारे संस्कृतस्वभावों के अभिमुख तथा (प्रयः, अभि) हवि के अभिमुख (वीतपृष्ठाः) मनोहर स्वरूपवाली (हरयः) हरणशील शक्तियें (त्वा) आपको (वहन्तु) प्राप्त कराएँ ॥४२॥

    भावार्थ

    हे यज्ञस्वरूप परमात्मन् ! हमारा भाव तथा हव्य पदार्थ, जो आपके निमित्त यज्ञ में हुत किये जाते हैं, इत्यादि भाव आपको प्राप्त कराएँ अर्थात् ऐसी कृपा करें कि वैदिक कर्मों का अनुष्ठान हमारे लिये सुखप्रद हो ॥४२॥

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    विषय

    इस ऋचा से ईश के दर्शन के लिये प्रार्थना करते हैं ।

    पदार्थ

    (इन्द्र) हे इन्द्र ! (अस्माकम्) हमारे (शतम्) अनेकों (वीतपृष्ठाः) शान्त और पवित्र (हरयः) इन्द्रिय (त्वा) तुझको (सुतान्) निखिल पदार्थों की ओर और (प्रयः) खाद्य पदार्थ की ओर (वहन्तु) ले आवें=प्रकाशित करें ॥४२ ॥

    भावार्थ

    जब हमारे इन्द्रिय शुद्ध, पवित्र और वशीभूत होते हैं, तब वे ईश के गुणों को प्रकाशित करने में समर्थ होते हैं, अतः प्रथम इन्द्रियों को वश में करो, यह शिक्षा इससे देते हैं ॥४२ ॥

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    विषय

    पिता प्रभु । प्रभु और राजा से अनेक स्तुति-प्रार्थनाएं ।

    भावार्थ

    हे ऐश्वर्यवन् ! प्रभो ! ( अस्माकं ) हम में से ( शतं हरयः ) अनेक मनुष्य ( वीत-पृष्ठाः ) कान्तियुक्त स्वरूप वाले तेजस्वी होकर ( त्वा उप ) तेरी उपासना करते हुए ( सुतान् ) नाना ऐश्वर्यों और पुत्रों तथा ( प्रयः अभि ) अन्न, ज्ञान आदि ( अभि वहन्तु ) प्राप्त करें और अन्यों को करावें ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    वत्सः काण्व ऋषिः ॥ १—४५ इन्द्रः। ४६—४८ तिरिन्दिरस्य पारशव्यस्य दानस्तुतिर्देवताः॥ छन्दः—१—१३, १५—१७, १९, २५—२७, २९, ३०, ३२, ३५, ३८, ४२ गायत्री। १४, १८, २३, ३३, ३४, ३६, ३७, ३९—४१, ४३, ४५, ४८ निचृद् गायत्री। २० आर्ची स्वराड् गायत्री। २४, ४७ पादनिचृद् गायत्री। २१, २२, २८, ३१, ४४, ४६ आर्षी विराड् गायत्री ॥

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    विषय

    'प्रभु, यज्ञों व सात्विक अन्न' की ओर

    पदार्थ

    [१] हे प्रभो! अस्माकम् - हमारे ये वीतपृष्ठाः = चमकती पीठवाले, अर्थात् तेजस्वी हरयः- इन्द्रियाश्व शतम् - शतवर्षपर्यन्त त्वा उप- आपके समीप वहन्तु ले चलनेवाले हों। अर्थात् हम इन इन्द्रियाश्वों द्वारा आपकी उपासन करनेवाले बनें। सुतान् उप-नाना यज्ञों के समीप ये हमें प्राप्त करनेवाले हों। इनके द्वारा हम सदा यज्ञों को करते रहें। [२] ये इन्द्रियाश्व प्रयः अभि-उत्तम सात्त्विक अन्न की ओर हमें ले चलें। इस सात्त्विक अन्न का सेवन करते हुए ये इन्द्रियाश्व हमें सात्त्विक वृत्तिवाला बनायें।

    भावार्थ

    भावार्थ- हमारी इन्द्रियाँ प्रभु की ओर यज्ञों की ओर व सात्त्विक अन्न की ओर झुकाववाली हों।

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    Indra, may the hundreds of your festive forces travelling like light rays transport you hither to our distilled soma and delicious foods offered in homage.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    हे यज्ञस्वरूप परमेश्वरा! आमचा भाव व हव्य पदार्थ जो तुला यज्ञात आहुत केला जातो इत्यादी भाव जाण अर्थात् अशी कृपा कर की, वैदिक कर्मांचे अनुष्ठान आमच्यासाठी सुखप्रद व्हावे. ॥४२॥

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