ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 64/ मन्त्र 4
एहि॒ प्रेहि॒ क्षयो॑ दि॒व्या॒३॒॑घोष॑ञ्चर्षणी॒नाम् । ओभे पृ॑णासि॒ रोद॑सी ॥
स्वर सहित पद पाठआ । इ॒हि॒ । प्र । इ॒हि॒ । क्षयः॑ । दि॒वि । आ॒ऽघोष॑न् । च॒र्ष॒णी॒णाम् । आ । उ॒भे इति॑ । पृ॒णा॒सि॒ । रोद॑सी॒ इति॑ ॥
स्वर रहित मन्त्र
एहि प्रेहि क्षयो दिव्या३घोषञ्चर्षणीनाम् । ओभे पृणासि रोदसी ॥
स्वर रहित पद पाठआ । इहि । प्र । इहि । क्षयः । दिवि । आऽघोषन् । चर्षणीणाम् । आ । उभे इति । पृणासि । रोदसी इति ॥ ८.६४.४
ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 64; मन्त्र » 4
अष्टक » 6; अध्याय » 4; वर्ग » 44; मन्त्र » 4
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अष्टक » 6; अध्याय » 4; वर्ग » 44; मन्त्र » 4
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भाष्य भाग
इंग्लिश (1)
Meaning
Your presence abides in the regions of light and heaven, in the minds of the enlightened and the divines. Arise, O divine presence, to heaven and come again. Let the presence resound among humanity. Your presence fills and fulfils both earth and heaven with the light and joy of divinity.
मराठी (1)
भावार्थ
ईश्वर परम पवित्र आहे. त्याला अशुद्धी आवडत नाही. जर त्याच्या सेवेत राहू इच्छिता तर तसेच व्हा. ॥४॥
संस्कृत (1)
विषयः
N/A
पदार्थः
हे ईश ! यद्यपि । तव क्षयः=निवासस्थानम् । दिवि=परमोत्कृष्टे प्रदेशे वर्तते । तथापि । अस्माकं चर्षणीनां=प्रजानाम् । मध्ये । आघोषन्=स्वकीयमाज्ञां श्रावयन् । एहि=आगच्छ । प्रेहि च । हे भगवन् ! यतस्त्वम् । उभे रोदसी द्यावापृथिव्यौ । आपृणासि=प्रीणयसि ॥४ ॥
हिन्दी (3)
विषय
N/A
पदार्थ
हे ईश ! यद्यपि तेरा (क्षयः) निवासस्थान (दिवि) पवित्र शुद्ध कपटादिरहित और परमोत्कृष्ट प्रदेश में है, तू अशुद्धि अपवित्रता के निकट नहीं जाता, तथापि हम सब (चर्षणीनाम्) तेरे ही अधीन प्रजाएँ हैं, तेरे ही पुत्र हैं, अतः हम लोगों के मध्य (आघोषन्) स्वकीय आज्ञाओं को सुनाता हुआ (एहि) आ और (प्रेहि) जा । हे भगवन् ! तू (उभे) दोनों (रोदसी) द्युलोक और पृथिवीलोक को (आपृणासि) प्रसन्न पूर्ण और सुखी रखता है, अतः तेरे अनुग्रहपात्र हम जन भी हैं ॥४ ॥
भावार्थ
ईश्वर परमपवित्र है, वह अशुद्धि को नहीं चाहता, अतः यदि उसकी सेवा में रहना चाहते हो, तो वैसे ही बनो ॥४ ॥
विषय
सर्वोपरि ईश्वर।
भावार्थ
हे राजन् ! ( आ इहि ) आ। (क्षयः प्र इहि ) अच्छी प्रकार अपने निवासस्थान या ऐश्वर्यपद को प्राप्त हो। ( चर्षणीनाम् ) सब प्रजाओं के बीच ( दिवि ) भूमि में, वा आकाश में ( आघोषन् ) अपनी घोषणा करता हुआ, तू ( उभे रोदसी ) दोनों लोकों को ( आ पृणासि ) पूर्ण कर।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
प्रगाथः काण्व ऋषिः॥ इन्द्रो देवता॥ छन्दः—१, ५, ७, ९ निचृद् गायत्री। ३ स्वराड् गायत्री। ४ विराड् गायत्री। २, ६, ८, १०—१२ गायत्री। द्वादशर्चं सूक्तम्॥
विषय
दिविक्षयः
पदार्थ
[१] हे प्रभो ! (एहि) = आप हमें प्राप्त होइए, (प्रेहि) = प्रकर्षेण प्राप्त होइए। आप (चर्षणीनाम्) = श्रमशील मनुष्यों के लिए (आघोषम्) = यह घोषणा करते हुए कि (दिवि क्षय:) = तुम्हारा ज्ञान में निवास है, ज्ञानपूर्वक ही तुमने गति करनी है [क्षि निवासगत्योः] प्राप्त होइए। [२] हे प्रभो! आप इस घोषणा के द्वारा ही (उभे रोदसी) = दोनों द्यावापृथिवी को मस्तिष्क व शरीर को (आपृणासि) = आपूरित कर देते हैं। ज्ञानपूर्वक क्रिया करनेवाला व्यक्ति स्वस्थ शरीर व स्वस्थ मस्तिष्कवाला बनता है।
भावार्थ
भावार्थ- प्रभु मनुष्य को यही उपदेश करते हैं कि ज्ञान में ही तुम्हारा निवास हो, ज्ञानपूर्वक ही तुम्हारी क्रियाएँ हों।
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