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ऋग्वेद मण्डल - 9 के सूक्त 113 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 9/ सूक्त 113/ मन्त्र 3
    ऋषिः - कश्यपः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - भुरिक्पङ्क्ति स्वरः - पञ्चमः

    प॒र्जन्य॑वृद्धं महि॒षं तं सूर्य॑स्य दुहि॒ताभ॑रत् । तं ग॑न्ध॒र्वाः प्रत्य॑गृभ्ण॒न्तं सोमे॒ रस॒माद॑धु॒रिन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    प॒र्जन्य॑ऽवृद्धम् । म॒हि॒षम् । तम् । सूर्य॑स्य । दु॒हि॒ता । आ । अ॒भ॒र॒त् । तम् । ग॒न्ध॒र्वाः । प्रति॑ । अ॒गृ॒भ्ण॒न् । तम् । सोमे॑ । रस॑म् । आ । अ॒द॒धुः॒ । इन्द्रा॑य । इ॒न्दो॒ इति॑ । परि॑ । स्र॒व॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    पर्जन्यवृद्धं महिषं तं सूर्यस्य दुहिताभरत् । तं गन्धर्वाः प्रत्यगृभ्णन्तं सोमे रसमादधुरिन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    पर्जन्यऽवृद्धम् । महिषम् । तम् । सूर्यस्य । दुहिता । आ । अभरत् । तम् । गन्धर्वाः । प्रति । अगृभ्णन् । तम् । सोमे । रसम् । आ । अदधुः । इन्द्राय । इन्दो इति । परि । स्रव ॥ ९.११३.३

    ऋग्वेद - मण्डल » 9; सूक्त » 113; मन्त्र » 3
    अष्टक » 7; अध्याय » 5; वर्ग » 26; मन्त्र » 3
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    संस्कृत (1)

    पदार्थः

    (पर्जन्यवृद्धं)  यो  गम्भीरघटेव  वृद्धिं  प्राप्तः  (सूर्य्यस्य, दुहिता) द्युलोकपुत्री  श्रद्धा  (तं)  उक्तगुणसम्पन्नं  (महिषं)  पूजार्हं  राजानं (आभरत्) ऐश्वर्यगुणैः पूरयति (तं) तं राजानं  (गन्धर्वाः) गानवेत्तारः ये च (प्रति, अगृभ्णन्) प्रत्येकभावग्राहकाः (तं)  तमीश्वरभावात्मकं रसं (सोमे) जगदुत्पादके परमात्मनि  (रसं)  यो  रसस्तं (आदधुः) धारयन्तः (इन्द्राय) पूर्वोक्तराजाय गायन्तु  (इन्दो)  हे परमात्मन् ! (परि, स्रव) राजाभिषेकहेतुर्भवतु भवान् ॥३॥

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    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    (पर्जन्यवृद्धं) सघन घटा के समान वृद्धि को प्राप्त (सूर्यस्य, दुहिता) द्युलोक की पुत्री श्रद्धा (तम्) उक्त गुणसम्पन्न (महिषं) पूजायोग्य राजा को (आभरत्) ऐश्वर्य्यरूप गुणों से भरपूर करती है, (तं) उस राजा की (गन्धर्वाः) गानविद्या के वेत्ता जो (प्रति, अगृभ्णन्) प्रत्येक भाव ग्रहण करनेवाले हैं, (सोमे) “सूते चराचरञ्जगदिति सोमः”=जो सम्पूर्ण संसार की उत्पत्ति करे, उसका नाम यहाँ “सोम” है (तं, रसं) उक्त परमात्मविषयक रस को (आदधुः) धारण करते हुए गन्धर्व लोग (इन्द्राय) उपर्युक्त गुणसम्पन्न राजा के लिये गान करें। (इन्दो) हे प्रकाशस्वरूप परमात्मन् ! आप (परि, स्रव) ऐसे राजा के लिये राज्याभिषेक का निमित्त बनें ॥३॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र का भाव यह है कि श्रद्धायुक्त राजा ही ऐश्वर्य्यशाली होता और परमात्मा उसी को राज्याभिषेक के योग्य बनाता है अर्थात् आस्तिक राजा ही अटल ऐश्वर्य्य भोगता है, अन्य नहीं ॥३॥

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    विषय

    तं गन्धर्वाः प्रत्यगृभ्णन्

    पदार्थ

    [पर्जन्यो वा उद्गाता श० १२ । १ । १ । ३] (पर्जन्यवृद्धम्) = उद्गाता के द्वारा जिसका वर्धन किया जाता है, प्रभु गुणगान करनेवाले से जिसका उत्कर्ष प्रतिपादित किया जाता है (तम्) = उस (महिषम्) = पूज्य प्रभु को (सूर्यस्य दुहिता) = उस प्रकाशमय प्रभु की पुत्री यह वेदवाणी (अभरत्) = हमारे अन्दर प्राण करती है । जब हम स्वाध्याय द्वारा ज्ञान का वर्धन करते हैं तो उस प्रभु को प्राप्त करनेवाले बनते हैं । (तम्) = उस प्रभु को (गन्धर्वः) = [गां धारयति] ज्ञान की वाणियों का धारण करनेवाले ज्ञानी पुरुष (प्रत्यगृभ्णन्) = ग्रहण करते हैं। सूर्य दुहिता, अर्थात् वेदवाणी के द्वारा, ये गन्धर्व प्रभु का ज्ञान प्राप्त करते हैं। (तं रसम्) = उस आनन्दमय प्रभु को [रसो वैस: ] (सोमे) = सोम के सुरक्षित होने पर (आदधुः) = अपने हृदयों में स्थापित करते हैं । सो हे (इन्दो) = सोम ! तू (इन्द्राय) = इस जितेन्द्रिय पुरुष के लिये (परिस्त्रव) = शरीर में चारों ओर परिस्रुत हो । तेरे द्वारा ही ज्ञानाग्नि का वर्धन होगा। जिस ज्ञानाग्नि से हम प्रभु के दर्शन के लिये अपने हृदयों को पवित्र कर पायेंगे ।

    भावार्थ

    भावार्थ- प्रभु प्राप्ति के लिये वेदवाणी, इसके धारण के द्वारा ज्ञानधारण, तथा सोमरक्षण साधन बनते हैं ।

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    विषय

    सेना और सामन्त आदि उसे पुष्ट करें।

    भावार्थ

    (सूर्यस्य दुहिता) सूर्य के समान तेजस्वी पुरुष की समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाली और दूर २ तक जाने वाली शक्ति वा सेना ही (पर्जन्य-वृद्धम्) मेघवत् बड़े २ शत्रुओं के विजेता, (महिषम्) महान्,भूमि के उपभोक्ता (तम्) उसको (आभरत्) सब ओर से पुष्ट करता है। (गन्धर्वाः) भूमि को धारण करने वाले सामन्त जन (तम् प्रति अगृभ्णन्) उसको अपनाते हैं और (सोमे) उस उत्तम शासक में या उसके बल पर ही (रसम आदधुः) अपना विशेष बल और सारयुक्त ऐश्वर्य रखते हैं। हे (इन्दो) तेजस्विन् ! तू (इन्द्राय) ऐसे शत्रुहन्ता और ऐश्वर्यप्रद राज्य के लिये (परि स्रव) उद्योग कर।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    कश्यप ऋषिः। पवमानः सोमो देवता॥ छन्द:- १, २, ७ विराट् पंक्तिः । ३ भुरिक् पंक्तिः। ४ पंक्तिः। ५, ६, ८-११ निचृत पंक्तिः॥ एकादशर्चं सूक्तम्।

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    That Soma, glory of life, growing great as the cloud by the cloud, daughter of the sun, the dawn and divine faith, brings to the earth. The forces that sustain the earth take and fill that glory of soma with beauty and joy of life. O Indu, spirit of power and grace of glory, flow for the power and majesty of Indra in the service of divinity.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    या मंत्राचा भाव हा आहे की, श्रद्धायुक्त राजाच ऐश्वर्यवान असतो व परमात्मा त्यालाच राज्याभिषेकाच्या योग्य बनवितो. अर्थात्, आस्तिक राजाच स्थिर ऐश्वर्य भोगतो, दुसरा नाही. ॥३॥

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