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ऋग्वेद मण्डल - 9 के सूक्त 87 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 9/ सूक्त 87/ मन्त्र 6
    ऋषिः - उशनाः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    परि॒ हि ष्मा॑ पुरुहू॒तो जना॑नां॒ विश्वास॑र॒द्भोज॑ना पू॒यमा॑नः । अथा भ॑र श्येनभृत॒ प्रयां॑सि र॒यिं तुञ्जा॑नो अ॒भि वाज॑मर्ष ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    परि॑ । हि । स्म॒ । पु॒रु॒ऽहू॒तः । जना॑नाम् । विश्वा॑ । अस॑रत् । भोज॑ना । पू॒यमा॑नः । अथ॑ । आ । भ॒र॒ । श्ये॒न॒ऽभृ॒त॒ । प्रयां॑सि । र॒यिम् । तुञ्जा॑नः । अ॒भि । वाज॑म् । अ॒र्ष॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    परि हि ष्मा पुरुहूतो जनानां विश्वासरद्भोजना पूयमानः । अथा भर श्येनभृत प्रयांसि रयिं तुञ्जानो अभि वाजमर्ष ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    परि । हि । स्म । पुरुऽहूतः । जनानाम् । विश्वा । असरत् । भोजना । पूयमानः । अथ । आ । भर । श्येनऽभृत । प्रयांसि । रयिम् । तुञ्जानः । अभि । वाजम् । अर्ष ॥ ९.८७.६

    ऋग्वेद - मण्डल » 9; सूक्त » 87; मन्त्र » 6
    अष्टक » 7; अध्याय » 3; वर्ग » 23; मन्त्र » 1
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    संस्कृत (1)

    पदार्थः

    (हि) यतः परमात्मा (पुरुहूतः) सर्वस्योपास्यदेवोऽस्ति। (जनानां) मानवानां (विश्वा) सर्वेषां (भोजना) भोग्यपदार्थानां (पूयमानः) पावकः (परि, असरत्) उपासकानां हृदये समागत्य विराजते। (श्येनभृत) हे विद्युच्छक्तिधारक परमात्मन् ! (प्रयांसि) सर्वाण्यैश्वर्य्याणि पूरयताम्। अपि च त्वं (रयिं) धनं (तुञ्जानः) ददासि अपरञ्च त्वं मह्यं (वाजं) बलं (अभि, अर्ष) सर्वथा देहि ॥६॥

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    हिन्दी (2)

    पदार्थ

    (हि) क्योंकि परमात्मा (पुरुहूतः) सबका उपास्य देव है। (जनानां) मनुष्यों के (विश्वा) सब (भोजना) भोग्य पदार्थों को (पूयमानः) पवित्र करनेवाला (पर्यसरत्) उपासकों के हृदय में आकर विराजमान होता है (अथ) और (श्येनभृत) हे विद्युत् की शक्तियों को धारण करनेवाले परमात्मा ! (प्रयांसि) सब ऐश्वर्यों को (आभर) पूर्ण करो और आप (रयिं) धन को (तुञ्जानः) देनेवाले हैं और आप हमको (वाजं) बल (अभ्यर्ष) सब प्रकार से दें ॥६॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में परमात्मा को सर्वैश्वर्य्यप्रदातारूप से वर्णन किया है ॥६॥

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    विषय

    अभिषिक्त शासक के कर्त्तव्य।

    भावार्थ

    (जनानां पुरुहूतः) मनुष्यों के बीच में बहुतों से प्रशंसित, (पूयमानः) अभिषिक्त होकर (विश्वा भोजनानि) समस्त प्रकार के अन्नों, भोग्य पदार्थों और प्रजा के रक्षाकारी साधनों को प्राप्त करने के लिये (परि असरत् स्म हि) प्रयाण करे, उद्योग करे। हे (श्येन भृत) उत्तम आचरणवान्, निष्ठ गुरुओं द्वारा पालित ! तू हमें (प्रयांसि आभर) उत्तम अन्न प्राप्त करा और (रयिं तुञ्जानः) ऐश्वर्य को प्रदान करता हुआ, (वाजम् अभि अर्ष) ऐश्वर्य और बल प्राप्त कर।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    उशना ऋषिः। पवमानः सोमो देवता ॥ छन्दः- १, २ निचृत्त्रिष्टुप्। ३ पादनिचृत्त्रिष्टुप्। ४,८ विराट् त्रिष्टुप्। ५–७,९ त्रिष्टुप्। नवर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    O Soma, pure and purifying divine spirit of joyous energy, invoked by all people, enshrined in the heart core of the soul, bring all forms of life’s joy. Flow for our battle of life for the victory of immortality over the state of mortality and bring us food, wealth and honour and excellence created by divine energy for the soul’s sustenance on way to the final victory.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    या मंत्रात परमात्म्याचे सर्वैश्वर्य्यप्रदाता या रूपाने वर्णन केलेले आहे. ॥६॥

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