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अथर्ववेद के काण्ड - 19 के सूक्त 32 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 32/ मन्त्र 2
    ऋषिः - भृगुः देवता - दर्भः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - दर्भ सूक्त
    53

    नास्य॒ केशा॒न्प्र व॑पन्ति॒ नोर॑सि ताड॒मा घ्न॑ते। यस्मा॑ अच्छिन्नप॒र्णेन॑ द॒र्भेन॒ शर्म॒ यच्छ॑ति ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    न। अ॒स्य॒। केशा॑न्। प्र। व॒प॒न्ति॒। न। उर॑सि। ताड॑म्। आ। घ्न॒ते॒। यस्मै॑। अ॒च्छि॒न्न॒ऽप॒र्णेन॑। द॒र्भेण॑। शर्म॑। य॒च्छ॒ति ॥३२.२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    नास्य केशान्प्र वपन्ति नोरसि ताडमा घ्नते। यस्मा अच्छिन्नपर्णेन दर्भेन शर्म यच्छति ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    न। अस्य। केशान्। प्र। वपन्ति। न। उरसि। ताडम्। आ। घ्नते। यस्मै। अच्छिन्नऽपर्णेन। दर्भेण। शर्म। यच्छति ॥३२.२॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 19; सूक्त » 32; मन्त्र » 2
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    हिन्दी (4)

    विषय

    शत्रुओं के हराने का उपदेश।

    पदार्थ

    (न) न तो (अस्य) उस [पुरुष] के (केशान्) केशों को (प्र वपन्ति) वे [शत्रु लोग] बखेरते हैं, (न)(उरसि) छाती पर (ताडम्) चोट (आ घ्नते) लगाते हैं (यस्मै) जिस [पुरुष] को (अच्छिन्नपर्णेन) अखण्ड पालनवाले (दर्भेण) दर्भ [शत्रुविदारक परमेश्वर] के साथ (शर्म) सुख (यच्छति) वह [कोई मित्र] देता है ॥२॥

    भावार्थ

    जो मनुष्य माता-पिता आचार्य आदि से सुशिक्षा पाकर परमात्मा में दृढ़ होकर उत्साह करता है, उसको संसार में कोई नहीं सता सकता ॥२॥

    टिप्पणी

    २−(न) नैव (अस्य) तस्य पुरुषस्य (केशान्) शिरोरुहान् (प्र) प्रकर्षेण (वपन्ति) डुवप बीजसन्ताने, विक्षिपन्ति। विकिरन्ति (न) निषेधे (उरसि) वक्षःस्थले (ताडम्) आघातम् (आ) समन्तात् (घ्नते) मारयन्ति (यस्मै) पुरुषाय (अच्छिन्नपर्णेन) अखण्डितपालनेन (दर्भेण) शत्रुविनाशकेन परमेश्वरेण (सह) (शर्म) सुखम् (यच्छति) ददाति कश्चित् सुहृत् ॥

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    विषय

    न शिरो रोग-न हद् रोग

    पदार्थ

    १. (यस्मा) = जिसके लिए (अच्छिन्नपर्णेन) = न विनष्ट पालन शक्तिवाली (दर्भेण) = वीर्यमणि से (शर्म) = सुख को (यच्छति) = वे प्रभु देते हैं। रोग (अस्य) = इस पुरुष के (केशान् न प्रवपन्ति) = केशों को छिन्न करनेवाले नहीं होते तथा (न) = न ही (उरसि ताडम्) = छाती पर प्रहार करके (आघ्नते) = इसे आहत करते हैं। २. वीर्य के रक्षित होने पर न ही कोई शिरो-रोग होता है, न ही छाती में किसी प्रकार का विकार होता है।

    भावार्थ

    शरीर में सुरक्षित वीर्य न किसी शिरो-रोग को होने देता है, न हद रोग को।

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    भाषार्थ

    (अस्य) इसके (केशान्) केशों को (प्र वपन्ति न) कोई उखाड़ते नहीं, (न) और न (उरसि) इसकी छाती पर (ताडम्) ताड़ना अर्थात् चोट (आ घ्नते) मारते हैं, (यस्मै) जिसके लिए कि (अच्छिन्नपर्णेन) अनश्वर-परिपालक, (दर्भेण) तथा अविद्याग्रन्थिविदारक परमेश्वर द्वारा पुरोहित (शर्म) सुख और आश्रय (यच्छति) प्रदान करता है।

    टिप्पणी

    [दर्भेण=दृणानि विदारयति (उणा० ३.१५१)। अच्छिन्नः= छिन्न-भिन्न न होनेवाला=अनश्वरःपर्णः= परिपालक। समग्र राष्ट्रों के अधिकारी तथा प्रजाजन यदि सच्चे आस्तिक बन जाएँ, तो परस्पर युद्ध न होने पर परस्पर केशनोचन अर्थात् केशाकेशि युद्ध, तथा परस्पर आघात सर्वदा के लिए बन्द हो जाएँ।]

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    विषय

    शत्रुदमनकारी ‘दर्भ’ नामक सेनापति।

    भावार्थ

    (अच्छिन्नपर्णेन) अविछिन्न, निरन्तर चलने वाले बाणों से युक्त, (दर्भेण) शत्रुहिंसक सेनापति द्वारा (यस्मा) जिसको (शर्म) सुख, शरण (यच्छति) प्रदान किया जाता है, (अस्य) उसके (केशान्) केशों को शत्रु लोग (न) कभी नहीं (प्र वपन्ति) काट सकते और शत्रु लोग उसके (उरसि) उसकी छाती पर भी (ताडम् न आघ्नते) प्रहार नहीं करते। अथवा, (अस्य) उसके सम्बन्धी लोग (केशान् न प्रवपन्ति) अपने बाल नहीं नोंचते और (न असिताडम् आघ्नते) न छाती पीट पीट कर दुहत्थड़ मार कर रोया करते हैं। अर्थात् वे सुखी रहते हैं।

    टिप्पणी

    (द्वि०) ‘घ्नन्ति’ (तृ०) ‘यस्माच्छन’ इति पैप्प० सं०।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    सर्वकाम आयुष्कामोभृगु र्ऋषिः। मन्त्रोक्तो दर्भो देवता। ८ परस्ताद् बृहती। ९ त्रिष्टुप्। १० जगती। शेषा अनुष्टुभः। दशर्चं सूक्तम्।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Darbha

    Meaning

    No way can diseases remove his hair nor strike at his chest to whom the physician provides health and security with Darbha of whole and unbroken leaves.

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    Translation

    They do not pull at his hair, nor strike blows on his chest, to whom one affords comfort with darbha of uncut blades.

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    Translation

    Diseases do not make his hair fall and do not give blow on him for whom the physician gives protection by Darbha with its leaves.

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    Translation

    The various kinds of germs don’t shear off the hair, nor do they dare attack his breast (i.e., the lungs and the heart) of him whom protection is granted by the kusha-grass, with its leaves, unshorn.

    Footnote

    The specific use of it in falling off hair and diseases of the respirating system are worth noting.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    २−(न) नैव (अस्य) तस्य पुरुषस्य (केशान्) शिरोरुहान् (प्र) प्रकर्षेण (वपन्ति) डुवप बीजसन्ताने, विक्षिपन्ति। विकिरन्ति (न) निषेधे (उरसि) वक्षःस्थले (ताडम्) आघातम् (आ) समन्तात् (घ्नते) मारयन्ति (यस्मै) पुरुषाय (अच्छिन्नपर्णेन) अखण्डितपालनेन (दर्भेण) शत्रुविनाशकेन परमेश्वरेण (सह) (शर्म) सुखम् (यच्छति) ददाति कश्चित् सुहृत् ॥

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