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अथर्ववेद के काण्ड - 19 के सूक्त 32 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 32/ मन्त्र 9
    ऋषिः - भृगुः देवता - दर्भः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - दर्भ सूक्त
    78

    यो जाय॑मानः पृथि॒वीमदृं॑ह॒द्यो अस्त॑भ्नाद॒न्तरि॑क्षं॒ दिवं॑ च। यं बि॑भ्रतं न॒नु पा॒प्मा वि॑वेद॒ स नो॒ऽयं द॒र्भो वरु॑णो दि॒वा कः॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    यः। जाय॑मानः। पृ॒थि॒वीम्। अदृं॑हत्। यः। अस्त॑भ्नात्। अ॒न्तरि॑क्षम्। दिव॑म्। च॒। यम्। बिभ्र॑तम्। ननु। पा॒प्मा। वि॒वे॒द॒। सः। नः॒। अ॒यम्। द॒र्भः। वरु॑णः। दि॒वा। कः॒ ॥३२.९॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यो जायमानः पृथिवीमदृंहद्यो अस्तभ्नादन्तरिक्षं दिवं च। यं बिभ्रतं ननु पाप्मा विवेद स नोऽयं दर्भो वरुणो दिवा कः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    यः। जायमानः। पृथिवीम्। अदृंहत्। यः। अस्तभ्नात्। अन्तरिक्षम्। दिवम्। च। यम्। बिभ्रतम्। ननु। पाप्मा। विवेद। सः। नः। अयम्। दर्भः। वरुणः। दिवा। कः ॥३२.९॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 19; सूक्त » 32; मन्त्र » 9
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    शत्रुओं के हराने का उपदेश।

    पदार्थ

    (यः) जिस (जायमानः) प्रकट होते हुए [परमेश्वर] ने (पृथिवीम्) पृथिवी को (अदृंहत्) दृढ़ किया है, (यः) जिसने (अन्तरिक्षम्) अन्तरिक्ष (च) और (दिवम्) सूर्य को (अस्तभ्नात्) सहारा है। (यम्) जिस (बिभ्रतम्) पालन करते हुए [परमेश्वर] को (पाप्मा) पापी पुरुष ने (ननु) कभी नहीं (विवेद) जाना है, (सः अयम्) उस ही (वरुणः) श्रेष्ठ (दर्भः) दर्भ [शत्रुविदारक परमेश्वर] ने (नः) हमारे लिये (दिवा) प्रकाश को (कः) बनाया है ॥९॥

    भावार्थ

    जिस परमात्मा ने नीचे-ऊँचे और मध्य लोकों को बनाकर आकर्षण में रक्खा है, और जो पापियों को भी अन्न आदि पहुँचाता है, उसी जगदीश्वर ने विद्वान् लोगों को ज्ञान का प्रकाश दिया है ॥९॥

    टिप्पणी

    ९−(यः) दर्भः परमेश्वरः (जायमानः) प्रादुर्भवन् सन् (पृथिवीम्) (अदृंहत्) दृहि वृद्धौ। दृढीकृतवान् (यः) (अस्तभ्नात्) स्तम्भितवान्। दृढं धारितवान् (अन्तरिक्षम्) (दिवम्) सूर्यम् (च) (यम्) (बिभ्रतम्) पालयन्तं परमेश्वरम् (ननु) नैव (पाप्मा) पापी पुरुषः (विवेद) ज्ञातवान् (सः) तादृशः (नः) अस्मभ्यम् (अयम्) (दर्भः) शत्रुविदारकः परमेश्वरः (वरुणः) श्रेष्ठः (दिवा) आकारो विभक्तेः। प्रकाशम् (कः) करोतेर्लुङ्। अकः। अकार्षीः ॥

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    विषय

    दर्भ: 'वरुणः' त्रिलोकी धारकः

    पदार्थ

    १. (य:) = जो (जायमान:) = शरीर में प्रादुर्भूत होता हुआ (पृथिवीम्) = इस शरीररूप पृथिवी को (अदुंहत्) = दृढ़ बनाता है। (य:) = जो (अन्तरिक्षम्) = हृदयान्तरिक्ष को (दिवं च) = और मस्तिष्करूप धुलोक को (अस्तभ्नात्) = थामता है, ऐसा यह दर्भ है। शरीर में सुरक्षित बीर्य शरीर को दृढ़ बनाता है, हृदय को निर्मल तथा मस्तिष्क को दीप्त करता है। २. (यम्) = जिस दर्भ [वीर्यमणि] को (बिभतम्) = धारण करते हुए को (पाप्मा) = पाप व रोग (ननु विवेद) = प्राप्त नहीं करता है, (स:) = वह (अयं दर्भ:) = यह दर्भ (वरुण:) = सब पापों व रोगों का वारण करनेवाला है। यह (न:) = हमारे जीवन को दिवा (क:) = प्रकाशमय करता है। यह हमारे जीवन को प्रकाशमय बनाता है।

    भावार्थ

    शरीर में सुरक्षित वीर्य शरीर को दृढ़, मन को निर्मल व मस्तिष्क को दीप्त बनाता है। यह अपने धारण करनेवाले को निष्पाप बनाता है। पापों व रोगों का निवारण करता हुआ यह जीवन को प्रकाशमय बनाता है।

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    भाषार्थ

    (जायमानः) प्रकट होते हुए (यः) जिसने (पृथिवीम्) पृथिवी को (अदृंहत्) दृढ़ किया; (यः) जिसने (अन्तरिक्षम्) अन्तरिक्ष को, (च) और (दिवम्) द्युलोक को (अस्तभ्नात्) थामा; (यम्) जिस (बिभ्रतम्) जगद्धारक परमेश्वर को (पाप्मा) पाप या पापी ने (नु) निश्चय से (न) नहीं (विवेद) जाना, (सः) वह (अयम्) यह (वरुणः) वरुण नामवाला अर्थात् वरण करने योग्य, या वरण करनेवाला, पापनिवारक श्रेष्ठ (दर्भः) अविद्याग्रन्थिविदारक परमेश्वर (नः दिवा) हम में ज्ञानप्रकाश (कः) करता है।

    टिप्पणी

    [इस वर्णन से निश्चय होता है कि “दर्भ” कुशा घास नहीं। सायणाचार्य ने इस समग्र सूक्त में दर्भ द्वारा कुशा घास का वर्णन किया है। अदृंहत्=यथा— “येन द्यौरुग्रा पृथिवी च दृढा” (यजुः० ३२.६)। वरुणः=यह परमेश्वर का नाम है, कुशाघास नहीं। देखो—वरुण सूक्त (अथर्व० ४.१६.१-६)। दिवा= यह वरुण ही ज्ञानप्रकाश करता है, कुशा घास नहीं। ये बिभ्रतम्= अथवा जिसे धारण करनेवाले को पाप स्पर्श नहीं करता। दिवा=प्रकाशम् (सायण)।]

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    विषय

    शत्रुदमनकारी ‘दर्भ’ नामक सेनापति।

    भावार्थ

    (यः) जो (जायमानः) उत्पन्न होता हुआ स्वयं (पृथिवीम्) पृथिवी को (अदृंहत्) दृढ़ करता है और जो (अन्तरिक्षम्) अन्तरिक्ष को वायु के समान अपने वश करता और (दिवम् च) द्यौलोक या विद्वानों की सभा को सूर्य के समान प्रकाशित करता है (बिभ्रतम्) भरण पोषण करने वाले (यम) जिसको अथवा (यं बिभ्रतम्) जिस भरण पोषण करने वाले पुरुष को (पाप्मा) पाप (न विवेद) नहीं न छूता (स दर्भः) वह दर्भ शत्रु नाशक सेनापति साक्षात् (वरुणः) सब पापों का निवारक होकर (दिवा) दिन के समान प्रकाश करता है अर्थात् अन्धेर मिटाकर व्यवस्थित राज्य की स्थापना करता है।

    टिप्पणी

    (च०) ‘धरुणोधिवाकः’ इति ह्विटनिकामितः। ‘वरणोऽधिवाकः’ इति राथकामितः। (तृ०) ‘नानुपा’—इति ह्विटनिकामितः। ‘तनु’ इति क्वचित्।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    सर्वकाम आयुष्कामोभृगु र्ऋषिः। मन्त्रोक्तो दर्भो देवता। ८ परस्ताद् बृहती। ९ त्रिष्टुप्। १० जगती। शेषा अनुष्टुभः। दशर्चं सूक्तम्।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Darbha

    Meaning

    He that, self-manifesting, created and stabilised the earth, who sustained and stabilised the firmament and the heaven, whom the evil at heart never know and realise, that Darbha, destroyer and preserver, Varuna, divine umbrella, lord of judgement and eternal goodness, may, we pray, bless us with heavenly light.

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    Translation

    Who, as soon as born, made the earth firmly set and who supported the midspace and the sky (in their places); him, who wears it, evil never reaches; may that darbha here be our shelter (dharunah) and supporter (adivakah).

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    Translation

    Let this Darbha which Springing up makes the soil of earth firm, which makes firm its steminal force in heaven and mid- region and which nourishing plant the cloud retaining water does not know or obtain, becoming the Protective force cause splendor and vigor in-us.

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    Translation

    The self-same kusha-grass, which, when born, conserves the soil, makes the atmosphere and the heavens firm by its radiations, and the bearer whereof knows no evil, may be the warder-off of all troubles, the shedder of light like the day and a source of happiness and peace, due to its wonderful qualities.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ९−(यः) दर्भः परमेश्वरः (जायमानः) प्रादुर्भवन् सन् (पृथिवीम्) (अदृंहत्) दृहि वृद्धौ। दृढीकृतवान् (यः) (अस्तभ्नात्) स्तम्भितवान्। दृढं धारितवान् (अन्तरिक्षम्) (दिवम्) सूर्यम् (च) (यम्) (बिभ्रतम्) पालयन्तं परमेश्वरम् (ननु) नैव (पाप्मा) पापी पुरुषः (विवेद) ज्ञातवान् (सः) तादृशः (नः) अस्मभ्यम् (अयम्) (दर्भः) शत्रुविदारकः परमेश्वरः (वरुणः) श्रेष्ठः (दिवा) आकारो विभक्तेः। प्रकाशम् (कः) करोतेर्लुङ्। अकः। अकार्षीः ॥

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