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अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 130 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 130/ मन्त्र 4
    ऋषिः - देवता - प्रजापतिः छन्दः - याजुषी गायत्री सूक्तम् - कुन्ताप सूक्त
    45

    कः का॒र्ष्ण्याः पयः॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    क: । का॒र्ष्ण्या: । पय॑: ॥१३०.४॥


    स्वर रहित मन्त्र

    कः कार्ष्ण्याः पयः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    क: । कार्ष्ण्या: । पय: ॥१३०.४॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 130; मन्त्र » 4
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    मनुष्य के लिये पुरुषार्थ का उपदेश।

    पदार्थ

    (कः) कौन (कार्ष्ण्याः) आकर्षणवाली, क्रिया के (पयः) अन्न को [पावे] ॥४॥

    भावार्थ

    मनुष्य विवेकी, क्रियाकुशल विद्वानों से शिक्षा लेता हुआ विद्याबल से चमत्कारी, नवीन-नवीन आविष्कार करके उद्योगी होवे ॥१-६॥

    टिप्पणी

    ४−(कः) (कार्ष्ण्याः) घृणिपृश्नपार्ष्णि०। उ० ४।२। कृष विलेखने-निप्रत्ययः, वृद्धिश्च। आकर्षकक्रियायाः (पयः) म० २ ॥

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    विषय

    सोम-यज्ञ

    पदार्थ

    १.(क:) = कौन (बहुलिमा) = शक्तियों के बाहुल्यवाले (इषूनि) = सोमयज्ञों को-शरीर में ही प्रतिदिन सोम [वीर्य] की आहुति देनेरूप यज्ञों को (अर्य) = [ऋगतौ] प्राप्त होता है। शक्तियों के बाहुल्य को प्राप्त करानेवाले इन सोमयज्ञों का करनेवाला यह ब्रह्मचारी ही तो होता है। सोम-रक्षण द्वारा यह अपने में शक्ति का संचय करता है। २. (असिद्याः) = [अविद्यमाना सिति: बन्धनं यस्याः]-गृहस्थ में रहते हुए भी विषयों में अनासक्तवृत्ति का (पय:) = [semen virile] (वीर्यक:) = कौन-सा होता है। गृहस्थ में होते हुए भी जो विषय-विलास के जीवनवाला नहीं बन जाता, वह सु-वीर्य बनता ही है। ३. (अर्जुन्या:) = [अर्जुन श्वेत] राग-द्वेष से अनाक्रान्त शुद्ध [श्वेत] चित्तवृत्तिवाले का (पय:) = वीर्य (क:) = कौन-सा होता है? गृहस्थ के कार्यों को समाप्त करके मनुष्य वानप्रस्थ बनता है। इस वानप्रस्थ में राग-द्वेष से ऊपर उठने पर शरीर में वीर्य शुद्ध [उबाल से रहित] बना रहता है। [४] वानप्रस्थ से ऊपर उठकर मनुष्य संन्यस्त होता है। इस संन्यास में 'काणी' वृत्ति को अपनाता है। इधर-उधर भटकनेवाली इन्द्रियों व मन को यह अन्तर्मुखी करने का प्रयत्न करता है उन्हें अपनी ओर आकृष्ट करता है। इस कार्या:-काणी वृत्ति का पयः-वीर्य का कौन-सा है? संन्यस्त होकर-सब इन्द्रियों को अपने अन्दर आकृष्ट करके यह वीर्य को सुरक्षित करनेवाला होता है।

    भावार्थ

    ब्रह्मचर्य तो है ही सोमयज्ञ। इस आश्रम में सोम [वीर्य] को शरीर में सरक्षित रखना होता है। गृहस्थ में भी हम विषयों से बद्ध न हो जाएँ। वानप्रस्थ में अत्यन्त शुद्धवृत्ति [अर्जुनी]-वाले बनें। संन्यास में इन्द्रियों व मन को अपने अन्दर आकृष्ट करनेवाले बनें। इसप्रकार हम आजीवन सोमयज्ञ करनेवाले हों।

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    भाषार्थ

    (कः) कौन (कार्ष्ण्याः) कृष्ण चित्तवृत्तियों का (पयः) फल देता है?

    टिप्पणी

    [कृष्ण=तामसिक।]

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    विषय

    भूमि और स्त्री।

    भावार्थ

    (काष्णर्याः) कृष्णा गौ का (पयः) दूध (कः) कौन ग्रहण करता है ? (कः) प्रजापति, राजा ही (काष्णर्याः) कृषि की जाने योग्य भूमि को (पयः) पुष्टिकारक अन्न आदि प्राप्त करता है।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    missing

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Prajapati

    Meaning

    Who brings you the fruit of attractive but blurred activities of mind?

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    Translation

    Who does find the corn of ploughing effort?

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    Translation

    Who does find the corn of ploughing effort?

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    Translation

    The means of ending the cycle of births and deaths cannot be attained by a man of evil nature.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ४−(कः) (कार्ष्ण्याः) घृणिपृश्नपार्ष्णि०। उ० ४।२। कृष विलेखने-निप्रत्ययः, वृद्धिश्च। आकर्षकक्रियायाः (पयः) म० २ ॥

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    बंगाली (2)

    मन्त्र विषय

    মনুষ্যপুরুষার্থোপদেশঃ

    भाषार्थ

    (কঃ) কে (কার্ষ্ণ্যাঃ) আকর্ষক, ক্রিয়ার (পয়ঃ) অন্নকে [প্রাপ্ত করে] ॥৪॥

    भावार्थ

    মনুষ্য বিবেকী, ক্রিয়াকুশল বিদ্বানদের থেকে শিক্ষা গ্রহণ করে বিদ্যাবল দ্বারা অবিশ্বাস্য, নতুন-নতুন আবিষ্কার করে উদ্যোগী হোক ॥১-৬॥

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    भाषार्थ

    (কঃ) কে (কার্ষ্ণ্যাঃ) কৃষ্ণ চিত্তবৃত্তির (পয়ঃ) ফল প্রদান করে?

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