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अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 135 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 135/ मन्त्र 12
    ऋषिः - देवता - प्रजापतिरिन्द्रश्च छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - कुन्ताप सूक्त
    37

    त्वमि॑न्द्र क॒पोता॑य च्छिन्नप॒क्षाय॒ वञ्च॑ते। श्यामा॑कं प॒क्वं पीलु॑ च॒ वार॑स्मा॒ अकृ॑णोर्ब॒हुः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    त्वम् । इ॑न्द्र । क॒पोता॑य । छिन्नप॒क्षाय॒ । वञ्च॑ते ॥ श्यामा॑कम् । प॒क्वम् । पीलु॑ । च॒ । वा: । अ॑स्मै॒ । अकृ॑णो: । ब॒हु: ॥१३५.१२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    त्वमिन्द्र कपोताय च्छिन्नपक्षाय वञ्चते। श्यामाकं पक्वं पीलु च वारस्मा अकृणोर्बहुः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    त्वम् । इन्द्र । कपोताय । छिन्नपक्षाय । वञ्चते ॥ श्यामाकम् । पक्वम् । पीलु । च । वा: । अस्मै । अकृणो: । बहु: ॥१३५.१२॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 135; मन्त्र » 12
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    मनुष्य के कर्तव्य का उपदेश।

    पदार्थ

    (इन्द्र) हे इन्द्र ! [बड़े ऐश्वर्यवाले राजन्] (त्वम्) तूने (अस्मै) इस (छिन्नपक्षाय) कटे पंखवाले, (वञ्चते) चलते हुए (कपोताय) कबूतर को (पक्वम्) पका हुआ (श्यामाकम्) श्यामा [समा अन्न], (पीलु) पीलु [फल विशेष] (च) और (वाः) जल (बहुः) बहुत बार (अकृणोः) किया है ॥१२॥

    भावार्थ

    जैसे पंख कटे कबूतर को अन्न और जल देकर पुष्ट करते हैं, वैसे ही राजा दीन-दुखियों को अन्न आदि देकर सुखी करे ॥१२॥

    टिप्पणी

    १२−(त्वम्) (इन्द्र) परमैश्वर्यवन् राजन् (कपोताय) पक्षिविशेषाय (छिन्नपक्षाय) (वञ्चते) वञ्चु गतौ−शतृ। गच्छते (श्यामाकम्) क्षुद्रधान्यभेदम् (पक्वम्) (पीलु) फलविशेषम् (च) (वाः) जलम् (अस्मै) प्रसिद्धाय (अकृणोः) कृतवानसि (बहुः) द्वित्रिचतुर्भ्यः सुच्। पा० ।४।१८। इति सुच् बाहुलकात्। बहुवारम् ॥

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    विषय

    परिव्राजक के लिए भिक्षा

    पदार्थ

    १. हे (इन्द्र) = जितेन्द्रिय पुरुष! (त्वम्) = तू (च्छिन्नपक्षाय) = [पक्ष परिग्रहे] परिग्रह को जिसने काट डाला है-जो अब परिवार के बन्धनों से ऊपर उठ गया है (अस्मै) = इस (वञ्चते) = चारों दिशाओं में भ्रमण करनेवाले (कपोताय) = आनन्द के पोत [बेड़े] के समान प्रसन्न संन्यस्त पुरुष के लिए (श्यामाकम्) = धान्यविशेष को (पक्वम्) = जिसको ठीक प्रकार से पकाया गया है (च) = तथा (पील) = [पीलु गुडफल: संसी] सुपच, उत्तम फल को तथा (वा:) = जल को (बहु:) = बहुत बार (अकृणो:) = करता है। २. गृहस्थ के लिए उचित है कि द्वार पर आये संन्यस्त को आदर से भिक्षा प्राप्त कराए। भिक्षा में दिया गया खान-पान स्वास्थ्य के लिए ठीक हो। संन्यासी भी सर्वबन्धनमुक्त-सर्वत्र आनन्द का सन्देश प्राप्त कराता हुआ परिव्राजक ही है।

    भावार्थ

    सद्गृहस्थ द्वार पर उपस्थित परिव्राजक के लिए स्वास्थ्य वर्धक भिक्षान्न को प्राप्त कराएँ।

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    भाषार्थ

    (छिन्नपक्षाय) मातृपक्ष तथा पितृपक्ष के सम्बन्धियों से रहित हुए, या पक्ष और विपक्ष अर्थात् मित्र और शत्रु दोनों भावों से पृथक् हो चुके, दोनों में समभाव से वर्तनेवाले, (कपोताय) कपोत-वृत्ति का आश्रय लिए हुए, (वञ्चते) और सर्वत्र विचरते हुए=यायावर, (अस्मै) इस संन्यासी के लिए—(इन्द्र) हे परमेश्वर! (त्वम्) आपने, (श्यामाकम्) स्वांक के आरण्य चावल, (च) और (पक्वं पीलु) पके पीलु फल, और (वाः) जल (बहुः) बहुत मात्रा में (अकृणोः) कर दिया है।

    टिप्पणी

    [जैसे वैतसीवृति और बकवृत्ति आदि वृत्तियाँ हैं, वैसे ही कपोतवृत्ति भी है, जिसका आश्रय संन्यासियों को लेना चाहिए। वर्तमान समय में “कपोत” शान्तिसूचक माना जाता है।]

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Prajapati

    Meaning

    O ruler, Indra, you have provided ample food of ripe shyamaka grain, pilu fruit and water for the quaking bird with broken wing and for the abandoned wanderer.

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    Translation

    O mighty ruler, you give the trembling dove whose wings have been rent and torn the ripe corn of Shyamaka and Pilu fruit and water etc.

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    Translation

    O mighty ruler, you give the trembling dove whose wings have been rent and torn the ripe corn of Shyamaka and Pilu fruit and water etc.

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    Translation

    O man of fortune and wealth, thou shouldst provide the cooked food like black rice and fruit, shelter and plenty of water to the shelterless person, well-versed in various sciences and roaming about like a featherless pigeon!

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १२−(त्वम्) (इन्द्र) परमैश्वर्यवन् राजन् (कपोताय) पक्षिविशेषाय (छिन्नपक्षाय) (वञ्चते) वञ्चु गतौ−शतृ। गच्छते (श्यामाकम्) क्षुद्रधान्यभेदम् (पक्वम्) (पीलु) फलविशेषम् (च) (वाः) जलम् (अस्मै) प्रसिद्धाय (अकृणोः) कृतवानसि (बहुः) द्वित्रिचतुर्भ्यः सुच्। पा० ।४।१८। इति सुच् बाहुलकात्। बहुवारम् ॥

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