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अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 135 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 135/ मन्त्र 7
    ऋषिः - देवता - प्रजापतिरिन्द्रश्च छन्दः - भुरिगार्षी त्रिष्टुप् सूक्तम् - कुन्ताप सूक्त
    50

    तां ह॑ जरितर्नः॒ प्रत्य॑गृभ्णं॒स्तामु ह॑ जरितर्नः॒ प्रत्य॑गृभ्णः। अहा॑नेतरसं न॒ वि चे॒तना॑नि य॒ज्ञानेत॑रसं न॒ पुरो॒गवा॑मः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    ताम् । ह॑ । जरित: । न॒: । प्रति॑ । अ॑गृभ्ण॒न् । ताम् । ऊं॒ इति॑ । ह॑ । जरित: । न॒: । प्रति॑ । अ॑गृभ्ण: ॥ अहा॑नेतरसम् । न॒ । वि । चे॒तना॑नि । य॒ज्ञानेत॑रसम् । न॒ । पुरो॒गवा॑म: ॥१३५.७॥


    स्वर रहित मन्त्र

    तां ह जरितर्नः प्रत्यगृभ्णंस्तामु ह जरितर्नः प्रत्यगृभ्णः। अहानेतरसं न वि चेतनानि यज्ञानेतरसं न पुरोगवामः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    ताम् । ह । जरित: । न: । प्रति । अगृभ्णन् । ताम् । ऊं इति । ह । जरित: । न: । प्रति । अगृभ्ण: ॥ अहानेतरसम् । न । वि । चेतनानि । यज्ञानेतरसम् । न । पुरोगवाम: ॥१३५.७॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 135; मन्त्र » 7
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    मनुष्य के कर्तव्य का उपदेश।

    पदार्थ

    (ताम्) उस [दक्षिणा] को (ह) ही, (जरितः) हे स्तुति करनेवाले ! (नः) हमारे लिये (प्रति अगृभ्णन्) उन्होंने [विज्ञानियों ने म० ६] प्रत्यक्ष पाया है, (ताम्) उसको (उ) निश्चय करके (ह) ही, (जरितः) हे स्तुति करनेवाले ! (नः) हमारे लिये (प्रति अगृभ्णः) तूने प्रत्यक्ष पाया है। (न) अभी (अहानेतरसम्) व्याप्ति में बल रखनेवाले व्यवहार को, (वि) विविध (चेतनानि) चेतनाओं को, और (न) अभी (यज्ञानेतरसम्) यज्ञ [देवपूजा, संगतिकरण और दान] में बल रखनेवाले व्यवहार को (पुरोगवामः) हम आगे होकर पावें ॥७॥

    भावार्थ

    जैसे पूर्वज महात्माओं ने श्रेष्ठ कर्मों से प्रतिष्ठा पाई है, वैसे ही आप और हम मिलकर विज्ञान द्वारा बड़ाई पावें ॥७॥

    टिप्पणी

    ७−(ताम्) दक्षिणाम्−म० ६। (ह) एव (जरितः) हे स्तोतः (नः) अस्मभ्यम् (प्रति) प्रत्यक्षम् (अगृभ्णन्) अगृह्णन्। गृहीतवन्तः (ताम्) (उ) निश्चयेन (ह) (जरितः) (नः) (प्रति) प्रत्यक्षम् (अगृभ्णः) अगृह्णः। गृहीतवानसि (अहानेतरसम्) सम्यानच् स्तुवः। उ० २।८९। अह व्याप्तौ−आनच्। तरो बलनाम−निघ० २।९। ततः अर्शआद्यच्। अहाने व्याप्तौ तरसं बलयुक्तं व्यवहारम् (न) सम्प्रति−निरु० ७।३१। (वि) विविधानि (चेतनानि) चेतनाः। ज्ञानानि (यज्ञानेतरसम्) सम्यानच् स्तुवः। उ० २।८९। यज देवपूजासंगतिकरणदानेषु आनच्, नकारश्छान्दसः। यज्ञे बलयुक्तं व्यवहारम् (न) सम्प्रति (पुरोगवामः) गु गतौ−लट्, परस्मैपदम्। गवते गतिकर्मा−निघ० २।१४। अग्रे भूत्वा गच्छामः प्राप्नुमः ॥

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    विषय

    "दान-स्वाध्याय-यज्ञ'

    पदार्थ

    १. हे (जरितः) = वासनाओं को जीर्ण करनेवाले प्रभो! (न:) = हमारी (ताम्) = उस दक्षिणा को ये अंगिरा (ह) = निश्चय से (प्रत्यगृभ्णन्) = ग्रहण करते हैं। हे (जरितः) = वासनाओं को जीर्ण करनेवाले प्रभो! (न:) = हमारी (ताम्) = उस दक्षिणा को (उ ह) = निश्चय से (प्रत्यगृभ्ण:) = ग्रहण कीजिए। आपके नाम पर हम जो दान दें, वह दान हमें आपका प्रिय बनाए। २. आपकी हमारे लिए यही तो प्रेरणा है कि (वि चेतनानि) = ज्ञानशून्य (अहान इत) = [अहानेत]-दिनों को मत प्राप्त करो, अर्थात् तुम्हारा प्रत्येक दिन स्वाध्याय द्वारा ज्ञानवृद्धिवाला बने। (रसं न) = [इत]-विषयों को मत प्राप्त होओ। तुम्हें विषयों का चस्का न लग जाए। (यज्ञान् आ इत) = [यज्ञानेत]-यज्ञों को तुम प्राप्त होओ। तुम्हारा जीवन यज्ञमय हो। (रसं न) = विषयों के चस्कों में ही न पड़ जाओ। ३. हे प्रभो! आपकी इस प्रेरणा को सुनकर स्वाध्याय व यज्ञों में लगे हुए हम निरन्तर (पुरोगवाम:) = [गवतिर्गतिकर्मा]-आगे और आगे चलते हैं। उन्नति का मार्ग यही है कि हम 'स्वाध्याय व यज्ञ' को ही अपना कर्तव्य समझें-विषयों में न फंसे।

    भावार्थ

    हमारा जीवन 'दान, स्वाध्याय व यज्ञ' को अपनाने के द्वारा उन्नत और उन्नत होता चले।

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    भाषार्थ

    (जरितः) हे वेदोपदेष्टा परमेश्वर! जैसे (नः) हम शिष्यों की (ताम्) उस दक्षिणा को अध्यात्मगुरुजनों ने (प्रत्यगृभ्णन्) स्वीकार किया है, वैसे (जरितः) हे वेदोपदेष्टा! (ह उ) निश्चय से (नः ताम्) हम उपासकों की उस दक्षिणा को, श्रद्धा भक्ति तथा आत्म-समर्पण को (प्रत्यगृभ्णः) आप भी स्वीकार कीजिए। जैसे कि (अहानेतरसम्) दिनों के प्रकाश के विना (चि चेतनानि न) विविध चेतना अर्थात् ज्ञान-सम्बन्धी विविध कार्य नहीं हो सकते, वैसे ही (यज्ञानेतरसम्) उपासना आदि यज्ञों के विना (न पुरोगवामः) हम अध्यात्ममार्ग में आगे नहीं बढ़ सकते।

    टिप्पणी

    [१. अहानेतरसम्=अहानि+आ+इतरसम् (इतरत्र)। यज्ञानेतरसम्=यज्ञान्+आ+इतरसम् (इतरत्र)।] [१. अथवा "अहा (अहानि) + अन्+आ+इतरसम्"=अहा + अनेतरसम्- अहानेतरसम्। " अहानेतरसं न विचेतनानि"= दिनों के होते "विचेतनानि " चेतनारहित कार्य नहीं होते, अर्थात् दिनों के प्रकाशों के होते ज्ञान सम्बन्धी कार्य होते हैं।]

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Prajapati

    Meaning

    O celebrant, just as the distinguished scholars accepted our gifts of homage, similarly, O celebrant, you too accept our gifts. For just as there is no vision and awareness of anything anywhere without the light of the day, similarly we do not move forward without yajna, i.e., meeting, discussion, and exchange of gifts and views.

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    Translation

    O devotee, these learned men have accepted that bountee for us and You, O devotee, it is sure, you bring that. Let us, in foremost position, attain the brod-based activity, consciousness and the intents of Yajna.

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    Translation

    O devotee, these learned men have accepted that bountee for us and You, O devotee, it is sure, you bring that. Let us, in foremost position, attain the brod-based activity, consciousness and the intents of Yajna.

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    Translation

    O learned preacher of Vedic lore, if they don’t accept it, you should also not accept it. O persons, when this learned person is there, don’t lead a life of ignorance and illiteracy. O learned persons, when this highly learned person is there, don t move about as a leaderless group (i.e., choose him your leader and then proceed).

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ७−(ताम्) दक्षिणाम्−म० ६। (ह) एव (जरितः) हे स्तोतः (नः) अस्मभ्यम् (प्रति) प्रत्यक्षम् (अगृभ्णन्) अगृह्णन्। गृहीतवन्तः (ताम्) (उ) निश्चयेन (ह) (जरितः) (नः) (प्रति) प्रत्यक्षम् (अगृभ्णः) अगृह्णः। गृहीतवानसि (अहानेतरसम्) सम्यानच् स्तुवः। उ० २।८९। अह व्याप्तौ−आनच्। तरो बलनाम−निघ० २।९। ततः अर्शआद्यच्। अहाने व्याप्तौ तरसं बलयुक्तं व्यवहारम् (न) सम्प्रति−निरु० ७।३१। (वि) विविधानि (चेतनानि) चेतनाः। ज्ञानानि (यज्ञानेतरसम्) सम्यानच् स्तुवः। उ० २।८९। यज देवपूजासंगतिकरणदानेषु आनच्, नकारश्छान्दसः। यज्ञे बलयुक्तं व्यवहारम् (न) सम्प्रति (पुरोगवामः) गु गतौ−लट्, परस्मैपदम्। गवते गतिकर्मा−निघ० २।१४। अग्रे भूत्वा गच्छामः प्राप्नुमः ॥

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