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अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 137 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 137/ मन्त्र 12
    ऋषिः - सुकक्षः देवता - इन्द्रः छन्दः - गायत्री सूक्तम् - सूक्त १३७
    34

    तमिन्द्रं॑ वाजयामसि म॒हे वृ॒त्राय॒ हन्त॑वे। स वृषा॑ वृष॒भो भु॑वत् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    तम् । इन्द्र॑म् । वा॒ज॒या॒म॒सि॒ । म॒हे । वृ॒त्राय॑ । हन्त॑वे ॥ स: । वृषा॑ । वृ॒ष॒भ: । भु॒व॒त् ॥१३७.१२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    तमिन्द्रं वाजयामसि महे वृत्राय हन्तवे। स वृषा वृषभो भुवत् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    तम् । इन्द्रम् । वाजयामसि । महे । वृत्राय । हन्तवे ॥ स: । वृषा । वृषभ: । भुवत् ॥१३७.१२॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 137; मन्त्र » 12
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।

    पदार्थ

    (तम्) उस (इन्द्रम्) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्यवाले राजा] को (महे) बड़े (वृत्राय) रोकनेवाले वैरी के (हन्तवे) मारने को (वाजयामसि) हम बलवान् करते हैं [उत्साही बनाते हैं], (सः) वह (वृषा) पराक्रमी (वृषभः) श्रेष्ठ वीर (भुवत्) होवे ॥१२॥

    भावार्थ

    प्रजागण राजा को शत्रुओं के मारने के लिये सहाय करें और राजा भी प्रजा की भलाई के लिये प्रयत्न करे ॥१२॥

    टिप्पणी

    मन्त्र १२-१४ आचुके हैं-अथ० २०।४७।१-३ ॥ १२-१४−एते मन्त्रा व्याख्याताः-अथ० २०।४७।१-३ ॥

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    विषय

    "सुकक्ष' द्वारा प्रभु अर्चन

    पदार्थ

    व्याख्या अथर्व० २०.४७.१-३ पर द्रष्टव्य है। प्रभु-स्तवन करता हुआ यह प्रभु का प्रिय बनता है। यह 'वत्स' कहलाता है। यह 'वत्स' ही अगले सूक्त का ऋषि है -

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    भाषार्थ

    (महे) बड़े-बड़े (वृत्राय) पाप-वृत्रों के (हन्तवे) हनन के लिए हम (तम् इन्द्रम्) उस परमेश्वर की (वाजयामसि) अर्चनाएँ करते हैं। (वृषा) आनन्दरसवर्षी (सः) वह परमेश्वर (वृषभः भुवत्) अवश्य आनन्दरसवर्षी हुआ है।

    टिप्पणी

    [वाजयति=अर्चतिकर्मा (निघं০ ३.१४)। महावृत्र=अविद्या, अस्मिता, रागद्वेष, काम मोह आदि।]

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    विषय

    राजपद।

    भावार्थ

    हम (तम्) उस (इन्द्रं) शत्रु नाशकारी पुरुष को (महे वृत्राय) बड़े भारी विघ्नकारी शत्रु के (हन्तवे) नाश करने के लिये (वाजयामसि) बलवान् बनावें। (सः वृषा) वह मेघ के समान सुखैश्वर्यों का वर्षक (वृषभः) अति श्रेष्ठ (भुवद्) सामर्थ्यवान् हो।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    १. शिरिम्बिठिः, २ बुधः, ३, ४ ६, ययातिः। ७–११, तिरश्चीराङ्गिरसो द्युतानो वा मारुत ऋषयः। १, लक्ष्मीनाशनी, २ वैश्वीदेवी, ३, ४-६ सोमः पत्र मान इन्द्रश्च देवताः। १, ३, ४-६ अनुष्टुभौ, ५-१२-अनुष्टुभः १२-१४ गायत्र्यः।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Prajapati

    Meaning

    That Indra, dynamic and enlightened mind and intelligence, we cultivate and strengthen for the elimination of the great waste, deep ignorance and suffering prevailing in the world. May that light and mind be exuberant and generous for us with showers of enlightenment.

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    Translation

    Let us strengthen the king for killing the great enemy. May he be stong and pourer of prosperity.

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    Translation

    Let us strengthen the king for killing the great enemy. May he be strong and pourer of prosperity.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    मन्त्र १२-१४ आचुके हैं-अथ० २०।४७।१-३ ॥ १२-१४−एते मन्त्रा व्याख्याताः-अथ० २०।४७।१-३ ॥

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    बंगाली (2)

    मन्त्र विषय

    রাজপ্রজাকর্তব্যোপদেশঃ

    भाषार्थ

    (তম্) সেই (ইন্দ্রম্) ইন্দ্রকে [পরম ঐশ্বর্যবান রাজাকে] (মহে) বৃহৎ (বৃত্রায়) প্রতিহতকারী শত্রুদের (হন্তবে) হননের জন্য (বাজয়ামসি) আমরা বলবান করি [উৎসাহ প্রদান করি], (সঃ) সেই (বৃষা) পরাক্রমী (বৃষভঃ) শ্রেষ্ঠবীর (ভুবৎ) হোক ॥১২॥

    भावार्थ

    প্রজাগণ রাজার শত্রু হননে সহায়তা করুক, এবং রাজাও প্রজার কল্যাণের জন্য প্রচেষ্টা করে/করুক ॥১২॥

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    भाषार्थ

    (মহে) বৃহৎ-বৃহৎ (বৃত্রায়) পাপ-বৃত্রের (হন্তবে) হননের জন্য আমরা (তম্ ইন্দ্রম্) সেই পরমেশ্বরের (বাজয়ামসি) অর্চনা করি। (বৃষা) আনন্দরসবর্ষী (সঃ) সেই পরমেশ্বর (বৃষভঃ ভুবৎ) অবশ্যই আনন্দরসবর্ষী হয়েছেন।

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