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अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 36 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 36/ मन्त्र 3
    ऋषिः - भरद्वाजः देवता - इन्द्रः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - सूक्त-३६
    45

    तमी॑मह॒ इन्द्र॑मस्य रा॒यः पु॑रु॒वीर॑स्य नृ॒वतः॑ पुरु॒क्षोः। यो अस्कृ॑धोयुर॒जरः॒ स्वर्वा॒न्तमा भ॑र हरिवो माद॒यध्यै॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    तम् । ई॒म॒हे॒ । इन्द्र॑म् । अ॒स्य॒ । रा॒य: । पु॒रु॒ऽवीर॑स्य । नृ॒वत॑: । पु॒रु॒ऽक्षो: ॥ य: । अस्कृ॑धोयु: । अ॒जर॑: । स्व॑:ऽवान् । तम् । आ । भ॒र॒ । ह॒रि॒ऽव॒: । मा॒द॒यध्यै॑ ॥३६.३॥


    स्वर रहित मन्त्र

    तमीमह इन्द्रमस्य रायः पुरुवीरस्य नृवतः पुरुक्षोः। यो अस्कृधोयुरजरः स्वर्वान्तमा भर हरिवो मादयध्यै ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    तम् । ईमहे । इन्द्रम् । अस्य । राय: । पुरुऽवीरस्य । नृवत: । पुरुऽक्षो: ॥ य: । अस्कृधोयु: । अजर: । स्व:ऽवान् । तम् । आ । भर । हरिऽव: । मादयध्यै ॥३६.३॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 36; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    मनुष्य के कर्तव्य का उपदेश।

    पदार्थ

    (तम्) उस (इन्द्रम्) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्यवाले परमात्मा] से (अस्य) इस (पुरुवीरस्य) बहुत वीरों के प्राप्त करानेवाले, (नृवतः) श्रेष्ठ मनुष्योंवाले, (पुरुक्षोः) बहुत ऐश्वर्य वा अन्नवाले (रायः) धन की (ईमहे) हम माँग करते हैं। और (यः) जो [परमात्मा] (अस्कृधोयुः) अपनी छोटाई न चाहनेवाला, (अजरः) निर्बल न होनेवाला, (स्वर्वान्) बहुत सुखवाला है, (हरिवः) हे उत्तम मनुष्योंवाले ! [विद्वान् पुरुष] तू (मादयध्यै) आनन्दित करने के लिये (तम्) उस [परमात्मा] को (आ) सब प्रकार (भर) धारण कर ॥३॥

    भावार्थ

    सब मनुष्य विज्ञान और ऐश्वर्य आदि बढ़ाने के लिये परमात्मा से प्रार्थना करके सदा प्रयत्न करें ॥३॥

    टिप्पणी

    ३−(तम्) (ईमहे) याचनां कुर्मः (इन्द्रम्) परमैश्वर्यवन्तं परमात्मानम् (अस्य) (रायः) धनस्य (पुरुवीरस्य) बहुवीरप्रापकस्य (नृवतः) श्रेष्ठनृभिर्युक्तस्य (पुरुक्षोः) आङ्परयोः खनिशॄभ्यां डिच्च। उ०१।३३”। टुक्षु शब्दे, क्षि निवासगत्योः, ऐश्वर्ये च-कु प्रत्ययः, स च डित्। क्षु अन्ननाम-निघ०२।७। बह्वैश्वर्ययुक्तस्य। बह्वन्नोपेतस्य (यः) परमात्मा (अस्कृधोयुः) पॄभिदिव्यधिगृधिधृषिहृषिभ्यः। उ०१।२३। कृती छेदने-कु, तकारस्य धः। कृधु ह्रस्वनाम-निघ०३।२। सुप आत्मनः क्यच्। पा०३।१।८। अकृधु-क्यच्। क्याच्छन्दसि। पा०३।२।१७०। उप्रत्ययः, यद्वा, मृगय्वादयश्च। उ०१।३७। अकृधु+या प्रापणे-कु। सकार उपजनः, धुशब्दस्य धोभावः। अस्कृधोयुरकृध्वायुः कृध्विति ह्रस्वनाम निकृत्तं भवति-निरु०३।३। य आत्मनः कृधु ह्रस्वत्वं नेच्छतीति-दयानन्दभाष्ये-ऋक्०६।६७।११। (अजरः) जरारहितः। अनिर्बलः। दृढः (स्वर्वान्) सुखवान् (तम्) परमात्मानम् (आ) समन्तात् (भर) धर (हरिवः) हरयो मनुष्याः-निघ०२।३। हे प्रशस्तमनुष्ययुक्त (मादयध्यै) तुमर्थे सेसेनसे०। पा०३।४।९। मादयतेः-अध्यै प्रत्ययः। मादयितुमानन्दयितुम् ॥

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    विषय

    कैसा धन?

    पदार्थ

    १. (तम् इन्द्रम्) = उस प्रभु से (अस्य राय:) = इस धन की (ईमहे) = याचना करते हैं जोकि (पुरुवीरस्य) = खूब वीर सन्तानोंवाला है, अर्थात् जिसके विनियोग से हम सन्तानों को वीर बना पाते हैं। (नृवत:) = जो प्रशस्त मनुष्योंवाला है-जिसके विनियोग से सब गृहवासियों का जीवन उत्तम बनता है। (पुरुक्षो:) = जो धन पालक व पूरक अन्नवाला है। २. उस धन को माँगते हैं (यः) = जोकि (अस्कृधोयु:) = अनल्प व अविच्छिन्न है। (अजर:) = [अविद्यमाना जरा यस्मात्] हमें वृद्ध नहीं होने देता-जिसके सद्व्यय से हम सदा युवा-से बने रहते हैं। (स्वर्वान्) = जो धन प्रकाश व सुखवाला है। जिसके द्वारा हमारे ज्ञान व सुख की वृद्धि होती है। हे (हरिवः) = प्रशस्त इन्द्रियाश्यों को प्राप्त करानेवाले प्रभो! (तम्) = उस धन को हमें (मादयध्यै) = आनन्दित करने के लिए (आभर) = प्राप्त कराइए।

    भावार्थ

    प्रभु हमें वह धन प्रास कराएँ जो हमारे सन्तानों को बौर बनाए, हमें प्रशस्त जीवनवाला बनाए, पालक अन्न को प्राप्त कराए, अविच्छिन्न हो, हमें जीर्ण होने से बचाए तथा प्रकाशमय जीवनवाला करे।

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    भाषार्थ

    (तम्) उस (इन्द्रम्) परमेश्वर से (ईमहे) हम याचनाएँ करते हैं, क्योंकि (रायः) आध्यात्मिक और प्राकृतिक सब सम्पत्तियाँ (अस्य) इस परमेश्वर की हैं, जो कि परमेश्वर कि (पुरुवीरस्य) बहुतो को वीर बनाता, धर्मवीर दानवीर आदि बनाता, (नृवतः) जो कि नर-नारियों का स्वामी, तथा (पुरुक्षोः) सभी अन्नों का अन्नपति है। (यः) जो (अस्कृधोयुः) अक्षीण आयुवाला नित्य तथा सनातन है, (अजरः) जो जरारहित, (स्वर्वान्) सुख-सामग्रीवाला है—(हरिवः) हे क्लेशहारी परमेश्वर के भक्त! (मादयध्यै) अपनी तृप्ति के लिए (तम्) उस परमेश्वर का तू (आभर) आश्रय ले।

    टिप्पणी

    [अस्कृधोयुः=अकृध्वायुः, “कृधु” इति ह्रस्वनाम, निकृत्तं भवति (निरु০ ६.१.३ )। क्षु=अन्नम् (निघं০ २.७)।]

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    विषय

    ईश्वर स्तुति

    भावार्थ

    (यः) जो परमेश्वर (अस्कृधोयुः) सदा अविनाशी, अखण्ड, महान्, (अजर:) अजर, (स्वर्वान्) सुखमय लोकों का स्वामी है। हे (हरिवः) वेगवान् शक्तियों के स्वामिन् ! तू (मादयध्यै) समस्त जीवों को तृप्त करने के लिये (तम्) वह अपूर्व ऐश्वर्य (आ भर) हमें प्राप्त करा। हम लोग (अस्य) इस (पुरु वीरस्य) बहुतसे वीर पुरुषों से युक्त, (नृवतः) मनुष्य सेवकों से युक्त, (पुरुक्षोः) बहुतसी अन्न समृद्धि से युक्त (रायः) ऐश्वर्य, राज्यादि की (तम इन्दम्) उस ऐश्वर्यवान् परमेश्वर से (ईमहे) याचना करते हैं।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    भरद्वाज ऋषिः। इन्द्रो देवता। त्रिष्टुभः। एकादशर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Indr a Devata

    Meaning

    We pray to Indra for his gifts of wealth, happy progeny, man power and generous abundance which he, lord of unlimited potential, ageless and blissful, commanding men and transport, would, we hope, bring us for his joy and ours.

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    Translation

    We, for obtaining this wealth full of grain, enriched with many heroes and men ask Indra, the Almighty God who is exalted, ever mature and the master of luminous worlds. O man of swift understanding you, for attaining satisfaction attain him.

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    Translation

    We, for obtaining this wealth full of grain, enriched with many heroes and men ask Indra, the Almighty God who is exalted, ever mature and the master of luminous worlds. O man of swift understanding you, for attaining satisfaction attain him.

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    Translation

    We seek that Lord of Fortune to get His riches, equipped with numerous brave persons, servants and ample food-grains. O Lord of speedy forceful powers, invest us with that strange fortune for enjoyment and pleasure, who art Everlasting, Indestructible, undecaying and Lord of celestial wealth.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ३−(तम्) (ईमहे) याचनां कुर्मः (इन्द्रम्) परमैश्वर्यवन्तं परमात्मानम् (अस्य) (रायः) धनस्य (पुरुवीरस्य) बहुवीरप्रापकस्य (नृवतः) श्रेष्ठनृभिर्युक्तस्य (पुरुक्षोः) आङ्परयोः खनिशॄभ्यां डिच्च। उ०१।३३”। टुक्षु शब्दे, क्षि निवासगत्योः, ऐश्वर्ये च-कु प्रत्ययः, स च डित्। क्षु अन्ननाम-निघ०२।७। बह्वैश्वर्ययुक्तस्य। बह्वन्नोपेतस्य (यः) परमात्मा (अस्कृधोयुः) पॄभिदिव्यधिगृधिधृषिहृषिभ्यः। उ०१।२३। कृती छेदने-कु, तकारस्य धः। कृधु ह्रस्वनाम-निघ०३।२। सुप आत्मनः क्यच्। पा०३।१।८। अकृधु-क्यच्। क्याच्छन्दसि। पा०३।२।१७०। उप्रत्ययः, यद्वा, मृगय्वादयश्च। उ०१।३७। अकृधु+या प्रापणे-कु। सकार उपजनः, धुशब्दस्य धोभावः। अस्कृधोयुरकृध्वायुः कृध्विति ह्रस्वनाम निकृत्तं भवति-निरु०३।३। य आत्मनः कृधु ह्रस्वत्वं नेच्छतीति-दयानन्दभाष्ये-ऋक्०६।६७।११। (अजरः) जरारहितः। अनिर्बलः। दृढः (स्वर्वान्) सुखवान् (तम्) परमात्मानम् (आ) समन्तात् (भर) धर (हरिवः) हरयो मनुष्याः-निघ०२।३। हे प्रशस्तमनुष्ययुक्त (मादयध्यै) तुमर्थे सेसेनसे०। पा०३।४।९। मादयतेः-अध्यै प्रत्ययः। मादयितुमानन्दयितुम् ॥

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    बंगाली (2)

    मन्त्र विषय

    মনুষ্যকর্তব্যোপদেশঃ

    भाषार्थ

    (তম্) সেই (ইন্দ্রম্) ইন্দ্র [পরয় ঐশ্বর্যবান পরমাত্মা] এর প্রতি (অস্য) এই (পুরুবীরস্য) বহু বীর প্রাপ্ত করান যিনি, (নৃবতঃ) শ্রেষ্ঠ মনুষ্যযুক্ত, (পুরুক্ষোঃ) বহু ঐশ্বর্য বা অন্নযুক্ত (রায়ঃ) ধন (ঈমহে) আমরা কামনা করি। এবং (যঃ) যে [পরমাত্মা] (অস্কৃধোয়ুঃ) নিজের হ্রাসতা না কামনাকারী, (অজরঃ) অজর, (স্বর্বান্) বহু সুখযুক্ত, (হরিবঃ) হে উত্তম মনুষ্যযুক্ত ! [বিদ্বান পুরুষ] তুমি (মাদয়ধ্যৈ) আনন্দিত করার জন্য (তম্) সেই [পরমাত্মাকে] (আ) সকল প্রকারে (ভর) ধারণ করো॥৩॥

    भावार्थ

    সকল মনুষ্য বিজ্ঞান ও ঐশ্বর্য আদি বৃদ্ধির জন্য পরমাত্মার নিকট প্রার্থনা করে সদা প্রযত্ন করেন/করুক॥৩॥

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    भाषार्थ

    (তম্) সেই (ইন্দ্রম্) পরমেশ্বরের প্রতি (ঈমহে) আমরা যাচনা করি, কেননা (রায়ঃ) আধ্যাত্মিক এবং প্রাকৃতিক সকল সম্পত্তি (অস্য) এই পরমেশ্বরের, যে পরমেশ্বর (পুরুবীরস্য) অনেককে বীর করেন, ধর্মবীর, দানবীর করেন, (নৃবতঃ) যিনি নর-নারীদের স্বামী, তথা (পুরুক্ষোঃ) সকল অন্নের অন্নপতি। (যঃ) যে (অস্কৃধোয়ুঃ) অক্ষীণ আয়ুযুক্ত নিত্য তথা সনাতন, (অজরঃ) যিনি জরারহিত, (স্বর্বান্) সুখ-সামগ্রীযুক্ত– (হরিবঃ) হে ক্লেশহারী পরমেশ্বরের ভক্ত! (মাদয়ধ্যৈ) নিজের তৃপ্তির জন্য (তম্) সেই পরমেশ্বরের তুমি (আভর) আশ্রয় গ্রহণ করো।

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