Loading...
अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 36 के मन्त्र
मन्त्र चुनें
  • अथर्ववेद का मुख्य पृष्ठ
  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 36/ मन्त्र 8
    ऋषिः - भरद्वाजः देवता - इन्द्रः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - सूक्त-३६
    48

    आ जना॑य॒ द्रुह्व॑णे॒ पार्थि॑वानि दि॒व्यानि॑ दीपयो॒ऽन्तरि॑क्षा। तपा॑ वृषन्वि॒श्वतः॑ शो॒चिषा॒ तान्ब्र॑ह्म॒द्विषे॒ शोच॑य॒ क्षाम॒पश्च॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    आ । जना॑य । द्रुह्व॑णे । पार्थि॑वानि । दि॒व्यानि॑ । दी॒प॒य॒: । अ॒न्तरि॑क्षा ॥ तप॑ । वृ॒ष॒न् । वि॒श्वत॑: । शो॒चिषा॑ । तान् । ब्र॒ह्म॒ऽद्विषे॑ । शो॒च॒य॒ । क्षाम् । अ॒प: । च॒ ॥३६.८॥


    स्वर रहित मन्त्र

    आ जनाय द्रुह्वणे पार्थिवानि दिव्यानि दीपयोऽन्तरिक्षा। तपा वृषन्विश्वतः शोचिषा तान्ब्रह्मद्विषे शोचय क्षामपश्च ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    आ । जनाय । द्रुह्वणे । पार्थिवानि । दिव्यानि । दीपय: । अन्तरिक्षा ॥ तप । वृषन् । विश्वत: । शोचिषा । तान् । ब्रह्मऽद्विषे । शोचय । क्षाम् । अप: । च ॥३६.८॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 36; मन्त्र » 8
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    मनुष्य के कर्तव्य का उपदेश।

    पदार्थ

    (वृषन्) हे बलिष्ठ ! [पुरुष] (दिव्यानि) श्रेष्ठ गुणवाले (पार्थिवानि) पृथिवी पर उत्पन्न हुए और (अन्तरिक्षा) आकाशवाले पदार्थों को (आ) सब ओर से (दीपयः) प्रकाशित कर, और (तान्) हिंसक चोरों को (शोचिषा) तेज से (विश्वतः) सब प्रकार (तप) तपा दे, और (ब्रह्मद्विषे) ईश्वर और वेद के द्वेषी, (द्रुह्वणे) अनिष्ट चाहनेवाले (जनाय) जनके लिये (क्षाम्) पृथिवी (च) और (अयः) जलों को (शोचय) शोकयुक्त कर ॥८॥

    भावार्थ

    विद्वान् लोग पृथिवी आदि पदार्थों के तत्त्वज्ञान को फैलाकर दुष्टों को सन्ताप और सत्पुरुषों को आनन्द देवें ॥८॥

    टिप्पणी

    ८−(आ) समन्तात् (जनाय) पुरुषाय (द्रुह्वणे) अ०४।२९।१। द्रुह जिघांसायाम्-क्वनिप् द्रोगघ्ने (पार्थिवानि) पृथिव्यां भवानि (दिव्यानि) दिव्यगुणयुक्तानि (दीपयः) अदीपयः-लोडर्थे लङ्। प्रकाशय (अन्तरिक्षा) अर्शआद्यच्। अन्तरिक्षसम्बन्धीनि वस्तूनि (तप) दह (वृषन्) हे बलिष्ठ (विश्वतः) सर्वतः (शोचिषा) तेजसा (तान्) तर्द हिंसायाम्-डप्रत्ययः। चोरान् (ब्रह्मद्विषे) ईश्वरवेदयोर्द्वेष्ट्रे (शोचय) शोकं प्रापय (क्षाम्) पृथिवीम् (अपः) जलानि (च) ॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    द्रुह्वणे ब्रह्माद्विषे

    पदार्थ

    १. हे (वृषन्) = शक्तिशालिन् प्रभो! आप (हरणे) = द्रोह [जिघांसा] की भावनावाले (जनाय) = पुरुष के लिए (पार्थिवानि) = पृथिवी पर होनेवाले, (दिव्यानि) = द्युलोक में होनेवाले तथा (अन्तरिक्षा) = अन्तरिक्ष में होनेवाले पदार्थों को (आदीपयः) = समन्तात् तपाइए। ये सब पदार्थ द्रोही पुरुष को संताप देनेवाले हों। २. हे वृषन्! आप (विश्वत:) = सब ओर से (तान्) = उन द्रोही जनों को शोचिषा अपनी संतापक शक्ति से (तपा) = संतस कीजिए। (ब्रहाद्विषे) = इस ज्ञान से अप्रीति रखनेवाले पुरुष के लिए (क्षाम्) = पृथिवी को (च) = और (अप:) = जलों को (शोचय) = दीप्त व संतस कर डालिए। इन ब्रह्महिट् द्रोहियों को ये पदार्थ दुःखद हों।

    भावार्थ

    संसार के सब पदार्थ द्रोह करनेवाले, ज्ञान में अरुचिवाले पुरुषों के लिए संतापक हों।

    इस भाष्य को एडिट करें

    भाषार्थ

    हे परमेश्वर! आप, (द्रुह्वणे) पापों के साथ द्रोह करनेवाले, उनके हनन की अभिलाषा करनेवाले (जनाय) मनुष्य के लिए (पार्थिवानि दिव्यानि अन्तरिक्षा=अन्तरिक्षस्थानि) पृथिवी सम्बन्धी, द्युलोक सम्बन्धी और अन्तरिक्ष सम्बन्धी ज्ञान-विज्ञानों को (दीपयः) दीपित कर दीजिए। (वृषन्) हे आनन्दरस वर्षी! (तान्) उन जनों को आप (विश्वतः) सब प्रकार से (शोचिषा) ज्ञान-दीप्ति द्वारा (तपा) ऐश्वर्ययुक्त कर दीजिए। और (ब्रह्मद्विषे) आप ब्रह्म के साथ द्वेष करनेवाले नास्तिक के लिए, (क्षाम्) पृथिवी को (अपः च) और जलों को (शोचय) सुखा दीजिए।

    टिप्पणी

    [‘ब्रह्मद्विषे और सुब्रह्म’ (मन्त्र ७) दोनों पक्षों में ब्रह्म शब्द समान है। तपा=तप ऐश्वर्ये।]

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    ईश्वर स्तुति

    भावार्थ

    हे (वृषन्) समस्त सुखों के वर्षण करने हारे ! तू (द्रुह्लणे जनाय) दोहशील पुरुष के संताप के लिये (पार्थिवानि दिव्यानि अन्तरिक्षा) पृथिवी, आकाश और अन्तरिक्ष के पदार्थों को भी (आदीपय) खूब अच्छी प्रकार प्रज्वालित कर, (तान्) उन द्रोही पुरुषों को (शोचिषा) ज्वालामय तेज से (विश्वतः तप) सब और से संतप्त कर। (ब्रह्मद्विषे) विद्वान् ब्रह्मज्ञानी पुरुषों के शत्रु के लिये (क्षाम् अपः च) पृथिवी और जलों को भी (शोचय) प्राप्त कर। वे उसको सुखकारी न होकर कष्टदायी हों।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    भरद्वाज ऋषिः। इन्द्रो देवता। त्रिष्टुभः। एकादशर्चं सूक्तम्॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    इंग्लिश (4)

    Subject

    Indr a Devata

    Meaning

    O lord of generous showers of light and purity of peace, light up and reveal the blazing magnificence of the regions of earth, firmament and heaven for people stricken with hate, jealousy and enmity against life, humanity, divinity and revelation of the glory of existence. Let them feel the heat and light of the blaze from all sides, heat up even the green earth and cool waters for them, and thus let them be cleansed through suffering and penitence.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    Powerful Almighty God, you illuminate the things of earth, heaven and mid-region, you please burn all those calamitics (which fall on creatures) with your inflaming refulgence and burn out stability and activity of the man who is antagonist of knowledge and who always acts agains good things.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    O Powerful Almighty God, you illuminate the things of earth, heaven and mid-region, you please burn all those calamities (which fall on Creatures) with your inflaming refulgence and burn out stability and activity of the man who is antagonist of knowledge and who always acts agains good things.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    O powerful king (capable of raining death on the foes) set aflame all the earthly, atmospheric and heavenly things for the oppressing persons full of hatred and animosity. Consume them with blazing heat on every side. Heat earth and waters for him, who hates God and Vedic lore.

    इस भाष्य को एडिट करें

    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ८−(आ) समन्तात् (जनाय) पुरुषाय (द्रुह्वणे) अ०४।२९।१। द्रुह जिघांसायाम्-क्वनिप् द्रोगघ्ने (पार्थिवानि) पृथिव्यां भवानि (दिव्यानि) दिव्यगुणयुक्तानि (दीपयः) अदीपयः-लोडर्थे लङ्। प्रकाशय (अन्तरिक्षा) अर्शआद्यच्। अन्तरिक्षसम्बन्धीनि वस्तूनि (तप) दह (वृषन्) हे बलिष्ठ (विश्वतः) सर्वतः (शोचिषा) तेजसा (तान्) तर्द हिंसायाम्-डप्रत्ययः। चोरान् (ब्रह्मद्विषे) ईश्वरवेदयोर्द्वेष्ट्रे (शोचय) शोकं प्रापय (क्षाम्) पृथिवीम् (अपः) जलानि (च) ॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    बंगाली (2)

    मन्त्र विषय

    মনুষ্যকর্তব্যোপদেশঃ

    भाषार्थ

    (বৃষন্) হে বলিষ্ঠ! [পুরুষ] (দিব্যানি) দিব্য গুণযুক্ত (পার্থিবানি) পৃথিবীতে উৎপন্ন এবং (অন্তরিক্ষা) আকাশস্থ পদার্থসমূহকে (আ) সকল দিক হতে (দীপয়ঃ) প্রকাশিত করো, এবং (তান্) হিংসক চোরদের (শোচিষা) তেজের দ্বারা (বিশ্বতঃ) সকল প্রকারে (তপ) তপ্ত করো, এবং (ব্রহ্মদ্বিষে) ঈশ্বর ও বেদবিদ্বেষী, (দ্রুহ্বণে) অনিষ্টকামনাকারী (জনায়) মনুষ্যদের জন্য (ক্ষাম্) পৃথিবী (চ)(অয়ঃ) জলকে (শোচয়) শোকযুক্ত/শোকান্বিত করো॥৮॥

    भावार्थ

    বিদ্বান ব্যাক্তি পৃথিব্যাদি পদার্থের তত্ত্বজ্ঞান বিস্তৃত করে দুষ্টদের সন্তাপ ও সৎপুরুষদের আনন্দ দেন ॥৮॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    भाषार्थ

    হে পরমেশ্বর! আপনি, (দ্রুহ্বণে) পাপের সাথে দ্রোহকারী, পাপ হননের অভিলাষী (জনায়) মনুষ্যদের জন্য (পার্থিবানি দিব্যানি অন্তরিক্ষা=অন্তরিক্ষস্থানি) পৃথিবী সম্বন্ধী, দ্যুলোক সম্বন্ধী এবং অন্তরিক্ষ সম্বন্ধী জ্ঞান-বিজ্ঞান (দীপয়ঃ) দীপ্ত করুন। (বৃষন্) হে আনন্দরস বর্ষী! (তান্) সেই মনুষ্যদের আপনি (বিশ্বতঃ) সব প্রকারে (শোচিষা) জ্ঞান-দীপ্তি দ্বারা (তপা) ঐশ্বর্যযুক্ত করুন। এবং (ব্রহ্মদ্বিষে) [আপনার] ব্রহ্মের সাথে দ্বেষকারী নাস্তিকের জন্য, (ক্ষাম্) পৃথিবী (অপঃ চ) এবং জল (শোচয়) শুষ্ক করে দিন।

    इस भाष्य को एडिट करें
    Top