अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 27/ मन्त्र 12
ऋषिः - ब्रह्मा
देवता - इळा, सरस्वती, भारती
छन्दः - षट्पदानुष्टुब्गर्भा परातिजगती
सूक्तम् - अग्नि सूक्त
63
अ॑ग्ने॒ स्वाहा॑ कृणुहि जातवेदः। इन्द्रा॑य य॒ज्ञं विश्वे॑ दे॒वा ह॒विरि॒दं जु॑षन्ताम् ॥
स्वर सहित पद पाठअग्ने॑ । स्वाहा॑। कृ॒णु॒हि॒ । जा॒त॒ऽवे॒द॒: । इन्द्रा॑य । य॒ज्ञम् । विश्वे॑ । दे॒वा: । ह॒वि: । इ॒दम्। जु॒ष॒न्ता॒म् ॥२७.१२॥
स्वर रहित मन्त्र
अग्ने स्वाहा कृणुहि जातवेदः। इन्द्राय यज्ञं विश्वे देवा हविरिदं जुषन्ताम् ॥
स्वर रहित पद पाठअग्ने । स्वाहा। कृणुहि । जातऽवेद: । इन्द्राय । यज्ञम् । विश्वे । देवा: । हवि: । इदम्। जुषन्ताम् ॥२७.१२॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
पुरुषार्थ का उपदेश।
पदार्थ
(जातवेदः) हे विद्या में प्रसिद्ध (अग्ने) विद्वान् पुरुष ! (स्वाहा) सुन्दर वाणी से (इन्द्राय) ऐश्वर्य के लिये (यज्ञम्) पूजनीय व्यवहार को (कृणुहि) कर। (विश्वे) सब (देवाः) विद्वान् लोग (इदम्) इस (हविः) ग्राह्य उत्तम वस्तु को (जुषन्ताम्) सेवन करें ॥१२॥
भावार्थ
मनुष्य प्रयत्न करके ऐश्वर्य के लिये उत्तम कर्म सदा करें ॥१२॥
टिप्पणी
१२−(अग्ने) विद्वन् (स्वाहा) सत्यवाण्या (कृणुहि) कुरु (जातवेदः) हे प्रसिद्धविद्य (इन्द्राय) परमैश्वर्याय (यज्ञम्) पूजनीयं व्यवहारम् (विश्वे) सर्वे (देवाः) विद्वांसः (हविः) ग्राह्यं वस्तु (इदम्) (जुषन्ताम्) सेवन्ताम् ॥
विषय
रस यज्ञशेष का सेवन
पदार्थ
१. (अग्ने) = हे प्रगतिशील जीव ! (जातवेदः) = [वेदस्-wealth] उत्तम धनवाले जीव! तु (स्वाहा कणुहि) = इस धन को अग्नि में आहुत करनेवाला बन। इस धन द्वारा अग्निहोत्र करनेवाला बन। यह तेरी नीरोगता का साधक होगा। (इन्द्राय) = शत्रु-विद्रावक राजा के लिए [कृणुहि] इस धन को प्रदान कर । कर-प्राप्त धन से ही तो वह इन्द्र राष्ट्र-रक्षण करेगा। २. (विश्वेदेवाः) = सब देव (यजम्) = तेरे इस दान को (जुषन्ताम्) = प्राप्त हों, सेवन करें। इस धन से ही वे प्रजाहित के कार्यों को करनेवाले बनेंगे। सब लोगों को यही चाहिए कि (इदं हवि:) = इस दानपूर्वक अदन का (जुषन्ताम्) = प्रीतिपूर्वक सेवन करें। दान दें, बचे हुए को ही खाएँ।
भावार्थ
एक प्रगतिशील धन-प्राप्त व्यक्ति धन का विनियोग अग्निहोत्र में करे। राजा के लिए धन दे, विद्वानों के लिए धन दे तथा सदा बचे हुए को ही खाए। यह यज्ञशेष ही अमृत है, इसी का सेवन ठीक है।
विशेष
गतमन्त्र के अनुसार धनाकर्षण से डौंवाडोल न होनेवाला 'अथर्वा' अगले सूक्त का ऋषि है।
भाषार्थ
(जातवेदः अग्ने) हे उत्पन्न पदार्थों के ज्ञाता प्रकाशस्वरूप परमेश्वर ! (इन्द्राय) [इन्द्रियों के अधिष्ठाता ] जीवात्मा के लिए (स्वाहा) स्वाहा पूर्वक किये (यज्ञम् ) यज्ञ को (कृणुहि) सफल कर, (विश्वे देवा:) [तेरी कृपा से ] सब विद्वान् या दिव्यगुणी मनुष्य (इदम् हविः) इस हविर्यज्ञ का (जुषन्ताम् ) सेवन करें, अनुष्ठान करें ।
विषय
ब्रह्मोपासना।
भावार्थ
हे (जात-वेदः) समस्त संसार के पदार्थों को जानने हारे ज्ञानमय ! हे (अग्ने) प्रकाशमय ! (स्वाहा) हमारी यही श्रेष्ठ प्रार्थना है कि आप (इन्द्राय) इस सामर्थ्यवान् आत्मा के लिये इस (यज्ञं) को यज्ञ (कृणुहि) सम्पादन करें, उसके जीवनमय-यज्ञ अथवा उसके कर्मफल भोग के लिये इस संसार को बनाओ। (विश्व-देवाः) समस्त देवगण, विद्वान्, इन्द्रियगण अथवा समस्त पञ्चभूत आदि (इदं हविः) इस कर्मफल भोग या संसार में प्राप्त करने योग्य भोग को (जुषन्ताम्) प्राप्त करें। समानार्थक ऋचा देखो ऋ० १। १४२। १२ ॥
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ब्रह्मा ऋषिः। अग्निर्देवता। १ बृहतीगर्भा त्रिष्टुप्। २ द्विपदा साम्नी भुरिगनुष्टुप्। ३ द्विपदा आर्ची बृहती। ४ द्विपदा साम्नी भुरिक् बृहती। ५ द्विपदा साम्नी त्रिष्टुप्। ६ द्विपदा विराड् नाम गायत्री। ७ द्विपदा साम्नी बृहती। २-७ एकावसानाः। ८ संस्तार पंक्तिः। ९ षट्पदा अनुष्टुब्गर्भा परातिजगती। १०-१२ परोष्णिहः। द्वादशर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Agni and Dynamics of Yajna
Meaning
Agni, lord of world knowledge take this holy offering and, in all holiness and sincerity, refine and raise the yajna to the grace and glory of Indra, spirit of power and prosperity of humanity. And may all the Devas of nature and humanity share this holy gift and rejoice.
Translation
O adorable Lord, knower of all beings, may make the sacrifice dedicated (svaha-krnu) to the resplendent Lord May all the enlightened ones enjoy these offerings. (Also Yv. XXVII.22) (Svaha-krti)
Translation
Let this fire which pervades all the created worldly objects, accomplish the yajna performed for Indra by pronouncing Svaha. Let all the physical powers of nature partake their shares in this oblation.
Translation
O Lustrous God, the knower of all created objects, we humbly prayunto Thee, to create the world for the soul to work in. May all the learnedpersons reap in this world the fruit of their actions!
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
१२−(अग्ने) विद्वन् (स्वाहा) सत्यवाण्या (कृणुहि) कुरु (जातवेदः) हे प्रसिद्धविद्य (इन्द्राय) परमैश्वर्याय (यज्ञम्) पूजनीयं व्यवहारम् (विश्वे) सर्वे (देवाः) विद्वांसः (हविः) ग्राह्यं वस्तु (इदम्) (जुषन्ताम्) सेवन्ताम् ॥
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