अथर्ववेद - काण्ड 20/ सूक्त 130/ मन्त्र 1
को अ॑र्य बहु॒लिमा॒ इषू॑नि ॥
स्वर सहित पद पाठक: । अ॒र्य॒ । बहु॒लिमा॒ । इषू॑नि: ॥१३०.१॥
स्वर रहित मन्त्र
को अर्य बहुलिमा इषूनि ॥
स्वर रहित पद पाठक: । अर्य । बहुलिमा । इषूनि: ॥१३०.१॥
अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 130; मन्त्र » 1
भाषार्थ -
(अर्य) हे शरीर और इन्द्रियों के स्वामी जीवात्मन्! (कः) कौन क्लेशों-कष्टों के (बहुलिमा) नानाविध (इषूनि) वाण तुझ पर चलाता है?