अथर्ववेद - काण्ड 20/ सूक्त 130/ मन्त्र 11
सूक्त -
देवता - प्रजापतिः
छन्दः - प्राजापत्या गायत्री
सूक्तम् - कुन्ताप सूक्त
एन॑श्चिपङ्क्ति॒का ह॒विः ॥
स्वर सहित पद पाठएन॑श्चिपङ्क्ति॒का । ह॒वि: ॥१३०.११॥
स्वर रहित मन्त्र
एनश्चिपङ्क्तिका हविः ॥
स्वर रहित पद पाठएनश्चिपङ्क्तिका । हवि: ॥१३०.११॥
अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 130; मन्त्र » 11
भाषार्थ -
हे गुरुदेव! आपके सदुपदेशों द्वारा, हमारे (एनः चि-पंक्तिका) पापों के संचय की पंक्ति, (हविः) ज्ञानाग्नि में आहुत हो गई है, भस्मीभूत हो गई है। हमारे संचित-पाप विनष्ट हो गये हैं।
टिप्पणी -
[चि=चिञ् चयने।]