अथर्ववेद - काण्ड 5/ सूक्त 11/ मन्त्र 8
मा मा॑ वोचन्नरा॒धसं॒ जना॑सः॒ पुन॑स्ते॒ पृश्निं॑ जरितर्ददामि। स्तो॒त्रं मे॒ विश्व॒मा या॑हि॒ शची॑भिर॒न्तर्विश्वा॑सु॒ मानु॑षीषु दि॒क्षु ॥
स्वर सहित पद पाठमा । मा॒ । वो॒च॒न् । अ॒रा॒धस॑म् । जना॑स: । पुन॑: । ते॒ । पृश्नि॑म् । ज॒रि॒त॒: । द॒दा॒मि॒ । स्तो॒त्रम् । मे॒ । विश्व॑म् । आ । या॒हि॒ । शची॑भि: । अ॒न्त: । विश्वा॑सु । मानु॑षीषु । दि॒क्षु॥११.८॥
स्वर रहित मन्त्र
मा मा वोचन्नराधसं जनासः पुनस्ते पृश्निं जरितर्ददामि। स्तोत्रं मे विश्वमा याहि शचीभिरन्तर्विश्वासु मानुषीषु दिक्षु ॥
स्वर रहित पद पाठमा । मा । वोचन् । अराधसम् । जनास: । पुन: । ते । पृश्निम् । जरित: । ददामि । स्तोत्रम् । मे । विश्वम् । आ । याहि । शचीभि: । अन्त: । विश्वासु । मानुषीषु । दिक्षु॥११.८॥
अथर्ववेद - काण्ड » 5; सूक्त » 11; मन्त्र » 8
भाषार्थ -
(जनासः) प्रजाजन (मा) मुझे (अराधसम् ) निर्धन (मा वोचन्) न कहें, इसलिए (जरितः) हे स्तोता ! (ते) तुझे ( पुनः) बार-बार (पृश्निम् ) भूमि (ददामि ) मैं देता हूँ। (विश्वासु मानुषीषु दिक्षु, अन्तः) मनुष्यों से बसी हुई सब दिशाओं के भीतर (शचीभिः) वेदवाणियों द्वारा (मे) मेरे (विश्वम् स्तोत्रम्) सब स्तोत्रों को लिये हुए (आ याहि) तू आ ।
टिप्पणी -
[प्रजाजन मुझे निर्धन न कहें इसलिए हे मेरे स्तोतृवर्ग या अथर्वा तुझे मैं वरुण प्रत्येक सूष्टिकाल में धनधान्यों से भरी भूमि को बार-बार देता हूँ, परन्तु देता हूँ उनके सुख के लिए जोकि मेरे स्तोता हैं, ताकि मेरे सदृश वे, धन को परार्थ देकर, उनके सुख को बढ़ाएँ। इस निमित्त हे मेरे स्तोता ! तू वेदवाणियों में प्रोक्त मेरे सब स्तोत्रोंसहित, दिग्दिगन्तरों में वसी मानुषी प्रजाओं में आया कर, उनमें स्तोत्रों का प्रसार करने के लिए। जरितः= जरिता स्तोतृनाम (निघं० ३।१६)। शचीभिः= शची वाङ्नाम (निघं० १।११) । वाक्=वेदवाणी । स्तोत्रम् =स्तुतिवाले मन्त्र या मन्त्र-समूह। मन्त्र द्वारा वरुण ने निज निर्धनता का अपहार किया है।]