अथर्ववेद - काण्ड 8/ सूक्त 10/ मन्त्र 13
सूक्त - अथर्वाचार्यः
देवता - विराट्
छन्दः - विराड्गायत्री
सूक्तम् - विराट् सूक्त
यन्त्य॑स्या॒मन्त्र॑णमामन्त्र॒णीयो॑ भवति॒ य ए॒वं वेद॑ ॥
स्वर सहित पद पाठयन्ति॑ । अ॒स्य॒ । आ॒ऽमन्त्र॑णम् । आ॒ऽम॒न्त्र॒णीय॑: । भ॒व॒ति॒ । य: । ए॒वम् । वेद॑॥१०.१३॥
स्वर रहित मन्त्र
यन्त्यस्यामन्त्रणमामन्त्रणीयो भवति य एवं वेद ॥
स्वर रहित पद पाठयन्ति । अस्य । आऽमन्त्रणम् । आऽमन्त्रणीय: । भवति । य: । एवम् । वेद॥१०.१३॥
अथर्ववेद - काण्ड » 8; सूक्त » 10;
पर्यायः » 1;
मन्त्र » 13
भाषार्थ -
(यः) जो सम्राट् (एवम्) इस प्रकार (आमन्त्रणम्) आमन्त्रण के महत्त्व को (वेद) जानता है वह (आमन्त्रणीयः) आमन्त्रण-संस्था का अधिपति (भवति) हो जाता है, और (अस्य) इसकी (आमन्त्रणम्) आमन्त्रण-संस्था में (यन्ति) अन्य सम्राट् जाते हैं।
टिप्पणी -
[सम्राट्= सम् (संगत हुए) + राट् (राजाओं) की संस्था। आमन्त्रण= साम्राज्यों के मुखिया-सम्राटों या उनके प्रतिनिधियों की संस्था। ये अधिपति-सम्राट् के आमन्त्रण पर आकर परस्पर मन्त्रणा करते हैं, जिस से कि भूमण्डलव्यापी उन्नति हो सके, और पारस्परिक युद्ध न होने पाएं। विशेष – (मन्त्र २) से “सोदक्रामत्" में "सा" द्वारा गार्हपत्य आदि संस्थाओं में उत्क्रान्त हुई विराट् की उत्तरोत्तर उत्क्रान्तियों का वर्णन हुआ है, मन्त्र (१) सम्बन्धी भयावह-विराट् का नहीं। इन उत्क्रान्त हुई विराटों को भी विराट् कहा है, क्योंकि इन उत्क्रान्त विराटों में भी यत्-किञ्चित् (मन्त्र १) का अंश भी सम्भावित विद्यमान रहता है।]