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अथर्ववेद > काण्ड 20 > सूक्त 63

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  • अथर्ववेद - काण्ड 20/ सूक्त 63/ मन्त्र 6
    सूक्त - गोतमः देवता - इन्द्रः छन्दः - उष्णिक् सूक्तम् - सूक्त-६३

    यश्चि॒द्धि त्वा॑ ब॒हुभ्य॒ आ सु॒तावाँ॑ आ॒विवा॑सति। उ॒ग्रं तत्प॑त्यते॒ शव॒ इन्द्रो॑ अ॒ङ्ग ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    य: । चि॒त् । हि । त्वा॒ । ब॒हुऽभ्य॑: । आ । सु॒तऽवा॑न् । आ॒विवा॑सति । उ॒ग्रम् । तत् । प॒त्य॒ते॒ । शव॑: । इन्द्र॑: । अ॒ङ्ग ॥६३.६॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यश्चिद्धि त्वा बहुभ्य आ सुतावाँ आविवासति। उग्रं तत्पत्यते शव इन्द्रो अङ्ग ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    य: । चित् । हि । त्वा । बहुऽभ्य: । आ । सुतऽवान् । आविवासति । उग्रम् । तत् । पत्यते । शव: । इन्द्र: । अङ्ग ॥६३.६॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 63; मन्त्र » 6

    पदार्थ -
    १.हे (अङ्ग) = सारे ब्रह्माण्ड को गति देनेवाले प्रभो! [अगि गतौ] (य:) = जो (चित् हि) = भी निश्चय से (बहुभ्यः) = बहुतों के लिए (सुतावान्) = यज्ञ आदि उत्तम कर्मोंवाला होता हुआ (त्वा) = आपका (आविवासति) = पूजन करता है, वह (तत्) = तब (उग्रं शव:) = तेजस्वी शत्रुविनाशक बल को (पत्यते) = प्राप्त होता है। "उन शव' को प्राप्त होनेवाला यह उपासक (इन्द्रः) = स्वयं इन्द्र हो जाता है। यह शत्रुओं का विद्रावण करनेवाला इन्द्र बन जाता है।

    भावार्थ - हम लोकहित के लिए यज्ञ आदि कर्म करते हुए प्रभु का पूजन करें और इसप्रकार तेजस्वी बनें।

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