ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 143/ मन्त्र 3
अ॒स्य त्वे॒षा अ॒जरा॑ अ॒स्य भा॒नव॑: सुसं॒दृश॑: सु॒प्रती॑कस्य सु॒द्युत॑:। भात्व॑क्षसो॒ अत्य॒क्तुर्न सिन्ध॑वो॒ऽग्ने रे॑जन्ते॒ अस॑सन्तो अ॒जरा॑: ॥
स्वर सहित पद पाठअ॒स्य । त्वे॒षाः । अ॒जराः॑ । अ॒स्य । भा॒नवः॑ । सु॒ऽस॒न्दृशः॑ । सु॒ऽप्रती॑कस्य । सु॒ऽद्युतः॑ । भाऽत्व॑क्षसः । अति॑ । अ॒क्तुः । न । सिन्ध॑वः । अ॒ग्नेः । रे॒ज॒न्ते॒ । अस॑सन्तः । अ॒जराः॑ ॥
स्वर रहित मन्त्र
अस्य त्वेषा अजरा अस्य भानव: सुसंदृश: सुप्रतीकस्य सुद्युत:। भात्वक्षसो अत्यक्तुर्न सिन्धवोऽग्ने रेजन्ते अससन्तो अजरा: ॥
स्वर रहित पद पाठअस्य। त्वेषाः। अजराः। अस्य। भानवः। सुऽसन्दृशः। सुऽप्रतीकस्य। सुऽद्युतः। भाऽत्वक्षसः। अति। अक्तुः। न। सिन्धवः। अग्नेः। रेजन्ते। अससन्तः। अजराः ॥ १.१४३.३
ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 143; मन्त्र » 3
अष्टक » 2; अध्याय » 2; वर्ग » 12; मन्त्र » 3
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अष्टक » 2; अध्याय » 2; वर्ग » 12; मन्त्र » 3
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनर्विद्वद्विषयमाह ।
अन्वयः
हे मनुष्याः सुसंदृशः सुप्रतीकस्य सुद्युतोऽग्नेर्भानवोऽस्याध्यापकस्याजराः त्वेषा भवन्ति। अस्याजरा अससन्तो भात्वक्षसः सिन्धवोऽक्तुर्नाति रेजन्ते ॥ ३ ॥
पदार्थः
(अस्य) (त्वेषाः) विद्यासुशीलप्रकाशाः (अजराः) हानिरहिताः (अस्य) सूर्यस्य (भानवः) किरणा इव (सुसंदृशः) सत्यासत्ययोः सुष्ठु सम्यग्द्रष्टुः (सुप्रतीकस्य) सुष्ठुप्रतीतियुक्तस्य (सुद्युतः) अभितः प्रकाशमानस्य (भात्वक्षसः) भाः विद्याप्रकाशस्त्वक्षं बलं यासां ताः। त्वक्ष इत बलना०। निघं० २। ९। (अति) (अक्तुः) रात्रिः (न) इव (सिन्धवः) प्रवाहरूपः (अग्नेः) सूर्यस्य (रेजन्ते) कम्पन्ते (अससन्तः) जागृताः (अजराः) हानिरहिताः ॥ ३ ॥
भावार्थः
ये मनुष्याः सूर्यवद्विद्याप्रकाशका अविद्याऽन्धकारनाशकाः सर्वषामानन्दप्रदा भवन्ति त एव मनुष्यशिरोमणयो जायन्ते ॥ ३ ॥
हिन्दी (4)
विषय
फिर विद्वानों के विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।
पदार्थ
हे मनुष्यो ! (सुसंदृशः) सत्य और असत्य को ज्ञानदृष्टि से देखनेवाले (सुप्रतीकस्य) सुन्दर प्रतीतियुक्त (सुद्युतः) सब ओर से प्रकाशमान (अग्नेः) सूर्य के (भानवः) किरणों के समान (अस्य) इस अध्यापक के (अजराः) विनाशरहित (त्वेषाः) विद्या और शील के प्रकाश होते हैं और वे (अस्य) इस महाशय के (अजराः) अजर-अमर (अससन्तः) जागते हुए (भात्वक्षसः) विद्या प्रकाशरूपी बलवाले (सिन्धवः) प्रवाहरूप उक्त तेज (अक्तुः) रात्रि के (न) समान अविद्यान्धकार को (अति, रेजन्ते) अतिक्रमण करते हैं ॥ ३ ॥
भावार्थ
जो मनुष्य सूर्य के समान विद्या के प्रकाश करने, अविद्यान्धकार के विनाश करने और सबको आनन्द देनेवाले होते हैं वे ही मनुष्यों के शिरोमणि होते हैं ॥ ३ ॥
विषय
स्वास्थ्य व ज्ञान की दीप्ति
पदार्थ
१. (अस्य) = हृदयाकाश में प्रादुर्भूत होते हुए इस प्रभु की (त्वेषाः) = दीप्तियाँ अजरा न जीर्ण होनेवाली हैं। प्रभु हृदयस्थ होते हैं तो हमारा शरीर स्वास्थ्य की दीप्ति से चमक उठता है। (अस्य भानव:) = इस प्रभु की ज्ञान दीप्तियाँ (सुसन्दृशः) = प्रत्येक पदार्थ को उत्तमता से ठीक रूप में देखनेवाली होती हैं। हृदयस्थ प्रभु की प्रेरणा से हम प्रत्येक पदार्थ को ठीक रूप में देखते हैं। २. (सुप्रतीकस्य) = उस तेजस्वी (सुद्युतः) = उत्तम ज्ञान की ज्योतिवाले (अग्नेः) = प्रभु की (भात्वक्षसः) = भासमान शक्तियाँ [त्वक्ष इति बलनामसु - नि०] (अत्यक्तुः न) = [अक्तुः - नैशं तमः] रात्रि के अन्धकार को लाँघती हुई-सी (सिन्धवः) = [स्यन्दन्ते] चारों ओर बहनेवाली (अससन्तः) = न सोनेवाली, निरन्तर अपने कार्य को करनेवाली, (अजरा:) = जीर्ण न होनेवाली (रेजन्ते) = सर्वत्र व्याप्त होती हैं। प्रभु के उपासन से जीव भासमान शक्तियों को प्राप्त करता है और 'सुप्रतीक व सुद्युत' हो उठता है।
भावार्थ
भावार्थ- प्रभु का उपासक स्वास्थ्य व ज्ञान की दीति प्राप्त करता है।
विषय
अग्नि सूर्यवत् आचार्य की स्थिति।
भावार्थ
जिस प्रकार ( सुद्युतः ) उत्तम कान्तिमान् सूर्य की (भानवः) किरणें भी ( त्वेषाः, अजराः ) कभी नाश को प्राप्त नहीं होती और जिस प्रकार ( भात्वक्षसः ) तेजोमात्र से बलशाली सूर्य के ( अससन्तः ) कभी नष्ट न होने वाले किरण भी ( सिन्धवः ) सदा वेग वा प्रवाहों के समान सूर्य से बढ़ने वाले होते हैं वे ( अक्तुः अति ) अन्धकारमय रात्रि वेला को लांघ कर प्रकाशित हुआ करते हैं उसी प्रकार ( अस्य ) इस ( सुसंदृशः ) उत्तम रीति से सब पदार्थों को ज्ञान दृष्टि से अच्छी प्रकार देखने वाले ( सुप्रतीकस्य ) उत्तम रूप या मुख शोभा से युक्त, सुन्दर, ( सुद्युतः ) उत्तम कान्तिमान्, तेजस्वी, ( अस्य ) इस विद्वान् आचार्य और शिष्ट विद्वान् के भी ( भानवः ) ज्ञान प्रकाश ( अजराः ) कभी नाश को प्राप्त नहीं होते और (अजराः) अवर्णनीय रूप से उत्तम होते हैं । ( भात्वक्षसः अस्य ) दीप्ति के स्वामी सूर्य के समान तेजस्वी पुरुष के ( अजराः सिन्धवः ) अविनाशी सदा वेग से बहने वालो सरिताओं के समान वेग से गति करने वाले ज्ञान प्रवाह ( अससन्तः ) कभी न सोते हुए, जागरणशील पुरुषों के समान ही ( अक्तुः अति ) रात्रि काल के समान उज्वल गुणों के प्रकाश कर देने वाले गुरु या शिष्य को भी पार कर ( अति रेजन्ते ) प्रकाशित होते हैं ।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
दीर्घतमा ऋषिः ॥ अग्निर्देवता ॥ छन्दः– १, ७ निचृज्जगती । २, ३, ५, विराङ्जगती । ४, ६ जगती । ८ निचृत् त्रिष्टुप् ॥ अष्टर्चं सूक्तम् ॥
मन्त्रार्थ
(अस्य त्वेषा:-अजरा:) इस अग्नि की दीप्तियाँ- प्रकाशतरङ्गे जरा धर्म रहित हैं- अन्धकार उन्हें दबा नहीं सकता स्वयं ही उनसे अन्धकार दब जाता है (अस्य सुप्रतीकस्य भानवः सुसन्दृश:) इस सुन्दर प्रत्यक्त सम्यक् सम्मुख दृष्ट अग्नि के "प्रतीकं प्रत्यक्तं प्रतिदर्शनम्" (निरु० ७।३१) अर्चियांज्वालाएं “अजस्त्रेण भानुना दीद्यतमित्यजत्रेणार्चिषा दीप्यताम्" (शत० ६।४।१।२) भली-भांति चमकने वाली हैं (सुद्युत: व्योमनि” अग्न:-भात्वक्षसः) भली-भांति दीत अग्नि की प्रकाशबलतर (अक्तुः-अति) रात्रि को-रात्रि के अन्धकार को अतिक्रान्त कर नष्ट करके अक्तुः-अक्तुम्-विभक्तिव्यत्ययः "अक्तुः-रात्रि-नाम" (निघ० १।७) (ससन्त:-अजराः सिन्धवः-न रेजन्ते) 'न सोती हुई- निरन्तर जागती हुई अक्षीण नदियों की भांति गति करती हैं जैसे नदियाँ भूस्थल का अतिक्रमण कर समुद्र को जाती हैं- ऐसे अग्निज्वालाएं भी रात्रि के अन्धकार को अतिक्रमण कर अन्तरिक्ष को चली जाती हैं । अग्नि जला कर अन्धकार को दूर करना चाहिये ॥३॥
टिप्पणी
परमे उत्कृष्टे विविधरक्षणवति वेदिदेशे (सायणः) "परमे इत्यप्रामाणिकोऽर्थः
विशेष
ऋषिः - दीर्घतमाः (आयु-जीवन का "आयुर्वेदीर्घम् " [तां० १३७ ११।१२] चाहने वाला “तमु कांक्षायाम्" [दिबा०]) देवता - अग्निः ( सर्वत्र लोकों में प्रकाशमान अग्नि)
मराठी (1)
भावार्थ
जी माणसे सूर्यासारखी विद्या प्रकाशित करणारी, अविद्यान्धकाराचा नाश करणारी व सर्वांना आनंद देणारी असतात तीच माणसे माणसांमध्ये श्रेष्ठ असतात. ॥ ३ ॥
इंग्लिश (2)
Meaning
The beams and brilliance of this holy light, clear and discerning of sight, beautiful of form and blazing with awe, are unaging, beyond decay. The waves of this mighty power of light flowing like rivers in flood are ever youthful, ever wakeful, they ever shine and dispel darkness as the dawn dispels the night.
Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]
The attributes of a learned person are further highlighted.
Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]
A noble teacher is bright, he is capable to distinguish between the truth and untruth, possesses goo knowledge, shines on all sides on account of his virtues. He is always remembered. His rays of wisdom and character, like the sun, are everywhere visible and is intensely shining. Their strength is the light of knowledge and never fades out and is ever wakeful They dispel all darkness of ignorance.
Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]
N/A
Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]
Illuminators of knowledge like the sun become the the best leaders of men. They are dispellers of darkness of ignorance and confer joy and bliss to all.
Foot Notes
(त्वेषा:) विद्यासुशीलप्रकाशा: The lights of wisdom and good character and conduct. (सुसतुषः) सत्यासत्ययोः सुष्ठु सम्यग् द्रष्टु: = Of the good seer of the truth and falsehood. (भत्वक्षसः) भाः = विद्याप्रकाशः त्वक्षं बलं यासां ताः । त्वक्ष इति बलनाम (NTU 2.9) = Whose strength is the light of wisdom or knowledge.
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