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ऋग्वेद मण्डल - 1 के सूक्त 161 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 161/ मन्त्र 13
    ऋषिः - दीर्घतमा औचथ्यः देवता - ऋभवः छन्दः - भुरिक्त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    सु॒षु॒प्वांस॑ ऋभव॒स्तद॑पृच्छ॒तागो॑ह्य॒ क इ॒दं नो॑ अबूबुधत्। श्वानं॑ व॒स्तो बो॑धयि॒तार॑मब्रवीत्संवत्स॒र इ॒दम॒द्या व्य॑ख्यत ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    सु॒षु॒प्वांसः॑ । ऋ॒भ॒वः॒ । तत् । अ॒पृ॒च्छ॒त॒ । अगो॑ह्य । कः । इ॒दम् । नः॒ । अ॒बू॒बु॒ध॒त् । श्वान॑म् । ब॒स्तः । बो॒ध॒यि॒तार॑म् । अ॒ब्र॒वी॒त् । स॒व्ँम्व॒त्स॒रे । इ॒दम् । अ॒द्य । वि । अ॒ख्य॒त॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    सुषुप्वांस ऋभवस्तदपृच्छतागोह्य क इदं नो अबूबुधत्। श्वानं वस्तो बोधयितारमब्रवीत्संवत्सर इदमद्या व्यख्यत ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    सुषुप्वांसः। ऋभवः। तत्। अपृच्छत। अगोह्य। कः। इदम्। नः। अबूबुधत्। श्वानम्। वस्तः। बोधयितारम्। अब्रवीत्। सव्ँम्वत्सरे। इदम्। अद्य। वि। अख्यत ॥ १.१६१.१३

    ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 161; मन्त्र » 13
    अष्टक » 2; अध्याय » 3; वर्ग » 6; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनस्तमेव विषयमाह ।

    अन्वयः

    हे सुसुप्वांस ऋभवो यूयं यदपृच्छत यच्च व्यख्यत तदिदं नः कोऽबूबुधत्। हे अगोह्य वस्तः श्वानं बोधयितारं यथा यदब्रीवत्तदिदं संवत्सरेऽद्य वा त्वं ब्रूहि ॥ १३ ॥

    पदार्थः

    (सुसुप्वांसः) ये सुप्ताः (ऋभवः) मेधाविनः (तत्) (अपृच्छत) (अगोह्य) अरक्ष्य (कः) (इदम्) कर्म (नः) अस्मान् (अबूबुधत्) बोधयेत् (श्वानम्) प्रेरकम् (वस्तः) आच्छादकः (बोधयितारम्) ज्ञापयितारम् (अब्रवीत्) ब्रूयात् (संवत्सरे) (इदम्) प्रत्यक्षम् (अद्य) अस्मिन् दिने (वि) (अख्यत) प्रख्यापय ॥ १३ ॥

    भावार्थः

    धीमन्तो यद्यद्विदुषः पृष्ट्वा निश्चिनुयुः। तत्तन्न मूर्खा निश्चेतुं शक्नुयुः। जडधीर्य्यावत् संवत्सरेऽधीते तावत् प्राज्ञ एकस्मिन् दिने ग्रहीतुं शक्नोति ॥ १३ ॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

    पदार्थ

    हे (सुसुप्वांसः) सोनेवाले (ऋभवः) बुद्धिमान् जनो ! तुम जिस काम को (अपृच्छत) पूछो और जिसको (वि, अख्यत) प्रसिद्ध कहो (तत्, इदम्) उस इस काम को (नः) हम लोगों को (कः) कौन (अबूबुधत्) जनावे। हे (अगोह्य) न गुप्त राखने योग्य (वस्तः) ढाँपने-छिपानेवाला (श्वानम्) कार्य्यों में प्रेरणा देने और (बोधयितारम्) शुभागुण विषय जनानेवाले को जैसे जिस विषय को (अब्रवीत्) कहे वैसे उस (इदम्) प्रत्यक्ष विषय को (संवत्सरे) एक वर्ष में वा (अद्य) आज तू कह ॥ १३ ॥

    भावार्थ

    बुद्धिमान् जन जिस-जिस विषय को विद्वानों को पूछ कर निश्चय करें उस उस को मूर्ख निर्बुद्धि जन निश्चय नहीं कर सकें, जड़ मन्दमति जन जितना एक संवत्सर में पढ़ता है, उतना बुद्धिमान् एक दिन में ग्रहण कर सकता है ॥ १३ ॥

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    विषय

    वृष्टि की प्रेरक वायु

    पदार्थ

    १. (सुषुप्वांसः) = [स्वप्- सु+अप्] वृष्टि द्वारा अन्नोत्पत्ति आदि उत्तम कार्यों को करनेवाली (ऋभवः) = सूर्य- किरणें (तत् अपृच्छत) = यह प्रश्न करती हैं कि (अगोह्य) = किसी के द्वारा न ढाँपे जाने योग्य हे सूर्य! (कः) = कौन (नः) = हमारे (इदम्) = इस वृष्टिकर्म को अबूबुधत् = ( बोधयति) प्रेरित करता है। २. सूर्य-किरणों के इस प्रश्न पर (बस्तः) = सबका वासयिता यह सूर्य (श्वानम्) = [मातरिश्वानम्] अन्तरिक्ष में गति करनेवाली वायु को (बोधयितारम्) = प्रेरक (अब्रवीत्) = कहता है । वृष्टि लानेवाली ये वायुएँ ही 'मॉनसून' कहलाती हैं। सूर्यकिरणों ने जलों को वाष्पीभूत किया और ये वायुएँ उन वाष्पकणों को आकाश में पहुँचाती हैं । ३. हे सूर्यकिरणो! जैसे तुम इस समय इन वायुओं के कार्य को देख रही हो, उसी प्रकार [इदम्] = इस कार्य को (संवत्सरे अद्य) = वर्ष की समाप्ति पर आज के दिन (व्यख्यत) = फिर देखोगी। प्रतिवर्ष समय पर वर्षाऋतु आती है और वायुओं का यह कार्य देखने को मिलता है। भावार्थ - वायु सूर्यकिरणों द्वारा वाष्पीभूत जलों को आकाश में प्रेरित करके वृष्टि का साधक होता है।

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    विषय

    विद्वानों, राष्ट्रवासियों को लाभप्रद उपदेश ।

    भावार्थ

    हे ( ऋभव ) सत्य ज्ञान से प्रकाशित होने वाले सूर्य किरणों के समान देदीप्यमान ! हे ( सुषुप्वांसः ) सुख से शयन करने हारे, निश्चिन्त, निष्पाप विद्यार्थी जनो ! आप लोग ( तत् ) उस परम ज्ञान के सम्बन्ध में सदा ( अपृच्छत ) प्रश्न किया करो । हे (अगोह्य) तुझ से कुछ भी न छिपा रखने योग्य, हे आचार्य ! ( नः ) हमें ( इदं ) यह सब ज्ञातव्य विषय कौन बतला सकता है ? तब ( बस्तः ) अपने गुरु के दोषों को अच्छादन करने और उसके अधीन बसने वाला विद्यार्थी ही ( श्वानं ) अति शीघ्रता से ज्ञान मार्ग पर ले जाने हारे, ( बोधयितारं ) ज्ञान प्रदान करने वाले आचार्य को ( अब्रवीत् ) कहे (संवत्सरे) एक वर्ष में ही (इदं) यह समस्त ज्ञान हमें ( अद्य ) अभी ( वि अख्यत ) विशेष रूप से व्याख्यान कर दें ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    दीर्घतमा ऋषिः ॥ ऋभवो देवता ॥ छन्दः– १ विराट् जगती ॥ ३, ५, ६, ८, १२ निचृज्जगती । ७, १० जगती च । ३ निचृत् त्रिष्टुप् । ४, १३ भुरिक् त्रिष्टुप् । ९ स्वराट् त्रिष्टुप । ११ त्रिष्टुप् । १४ स्वराट् पङ्क्तिः । चतुर्दशर्चं सूक्तम् ॥

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    बुद्धिमान लोक जो जो विषय विद्वानांना विचारून निश्चय करतात त्या त्या गोष्टीचा निर्बुद्ध लोक निश्चय करू शकत नाहीत. जड मंदमती माणूस जितके एका संवत्सरात (वर्षात) शिकतो तितके बुद्धिमान एका दिवसात ग्रहण करू शकतो. ॥ १३ ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    Sleeping Rbhus, like potential scholars and rays of the sun, ask that supreme lord of light such as sun who it is who wakes them up into light and life. He, the lord of light from whom nothing is hidden says: it is vayu, waves of divine energy, which wakes them up into life and light. The lord of light is the shelter home of all. It is now a year (cycle) when you awaken us and tell us of that to-day.$(It is life waking up to self-consciousness at the dawn of creation after a Tong year’ of sleep in Divinity during the long night of annihilation.)

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    The students ideal be-haviour is defined.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    O pupils! who are free from evils, sleep well at night. And also those who are like the rays of the sun, shine on account of the observance of truth. You should always enquire about that Supreme knowledge. O Acharya (Preceptor)! from whom nothing should be concealed, who except you can tell us about this Supreme knowledge? The pupil who hides the deficiencies of his teacher and wraps up himself with noble virtues, living under his impelling preceptor, requests him (preceptor) to impart that great knowledge in the course of a year or even to day.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    N/A

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    The foolish can not decide anything by way of questioning to wise men as the way, the intelligent pupils do. An intelligent person can learn in a day what a dull headed person takes a year to grasp.

    Foot Notes

    (श्वानम् ) प्रेरकम् = Impeller. (वस्त:) आच्छादक:= A pupil who hides or conceals the deficiencies of his preceptor (if any) and lives under him.

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