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ऋग्वेद मण्डल - 1 के सूक्त 161 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 161/ मन्त्र 8
    ऋषिः - दीर्घतमा औचथ्यः देवता - ऋभवः छन्दः - निचृज्जगती स्वरः - निषादः

    इ॒दमु॑द॒कं पि॑ब॒तेत्य॑ब्रवीतने॒दं वा॑ घा पिबता मुञ्ज॒नेज॑नम्। सौध॑न्वना॒ यदि॒ तन्नेव॒ हर्य॑थ तृ॒तीये॑ घा॒ सव॑ने मादयाध्वै ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    इ॒दम् । उ॒द॒कम् । पि॒ब॒त॒ । इति॑ । अ॒ब्र॒वी॒त॒न॒ । इ॒दम् । वा॒ । घ॒ । पि॒ब॒त॒ । मु॒ञ्ज॒ऽनेज॑नम् । सौध॑न्वनाः । यदि॑ । तत् । नऽइ॑व । हर्य॑थ । तृ॒तीये॑ । घ॒ । सव॑ने । मा॒द॒या॒ध्वै॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    इदमुदकं पिबतेत्यब्रवीतनेदं वा घा पिबता मुञ्जनेजनम्। सौधन्वना यदि तन्नेव हर्यथ तृतीये घा सवने मादयाध्वै ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    इदम्। उदकम्। पिबत। इति। अब्रवीतन। इदम्। वा। घ। पिबत। मुञ्जऽनेजनम्। सौधन्वनाः। यदि। तत्। नऽइव। हर्यथ। तृतीये। घ। सवने। मादयाध्वै ॥ १.१६१.८

    ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 161; मन्त्र » 8
    अष्टक » 2; अध्याय » 3; वर्ग » 5; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनस्तमेव विषयमाह ।

    अन्वयः

    हे सौधन्वनाः सद्वैद्या यूयं पथ्यार्थिभ्य इदमुदकं पिबत इदं मुञ्जनेजनं पिबत वा नेव पिबतेति घैवाब्रवीतन यदि तद्धर्यथ तर्हि तृतीये सवने घैव सततं मादयाध्वै ॥ ८ ॥

    पदार्थः

    (इदम्) (उदकम्) (पिबत) (इति) अनेन प्रकारेण (अब्रवीतन) ब्रूयुः (इदम्) (वा) पक्षान्तरे (घ) एव (पिबत) (मुञ्जनेजनम्) मुञ्जैर्नेजनं शुद्धिकृतम् (सौधन्वनाः) शोभनानि धनूंषि येषान्ते सुधन्वानस्तेषु कुशलाः (यदि) (तत्) (नेव) यथा न कामयते तथा (हर्यथ) कामयध्वम् (तृतीये) (घ) एव (सवने) ऐश्वर्ये (मादयाध्वै) आनन्दत ॥ ८ ॥

    भावार्थः

    अत्रोपमालङ्कारः। वैद्यैर्मातापितृभिर्वा सर्वे रोगिणः सन्तानाश्च युष्माभिः शरीरात्मसुखायेदं सेव्यमिदन्न सेव्यमिदमनुष्ठेयं नेदं चेति प्रथमत उपदेष्टव्याः। यत एते पूर्णशरीरात्मसुखाः सततं भवेयुः ॥ ८ ॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

    पदार्थ

    हे (सौधन्वनाः) उत्तम धनुषवालों में कुशल अच्छे वैद्यो ! तुम पथ्य भोजन चाहनेवालों से (इदम्) इस (उदकम्) जल को (पिबत) पिओ (इदम्) इस (मुञ्जनेजनम्) मूँज के तृणों से शुद्ध किये हुए जल को पिओ (वा) अथवा (नेव) नहीं (पिबत) पिओ (इति) इस प्रकार से (घ) ही (अब्रवीतन) कहो औरों को उपदेश देओ, (यदि) जो (तत्) उसको (हर्यथ) चाहो तो (तृतीये) तीसरे (सवने) ऐश्वर्य में (घ) ही निरन्तर (मादयाध्वै) आनन्दित होओ ॥ ८ ॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। वैद्य वा माता-पिताओं को चाहिये कि समस्त रोगी और सन्तानों के लिये प्रथम ऐसा उपदेश करे कि तुमको शारीरिक और आत्मिक सुख के लिये यह सेवन करना चाहिये, यह न सेवन करना चाहिये, यह अनुष्ठान करना चाहिये, यह नहीं। जिस कारण ये पूर्ण आत्मिक और शारीरिक सुखयुक्त निरन्तर हों ॥ ८ ॥

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    विषय

    मुञ्जनेजन का पान

    पदार्थ

    १. अपने जीवन को गतमन्त्र के अनुसार बनाने के लिए सब देव (इति अब्रवीतन) = यह कहते हैं कि (इदम् उदकम्) = शरीर में उत्पन्न वीर्यरूप जल को जीवन के प्रातः सवन में (पिबत )= अपने शरीर में ही पीने का प्रयत्न करो। (वा घ आ) = निश्चय से (इदम्) = इस (मुञ्जनेजनम्) = [मुञ्ज = to cleanse, निज् = पोषण] पवित्र व पोषण करनेवाले सोम [वीर्य] को (पिबत) = शरीर में ही व्याप्त करने का प्रयत्न करो। २. हे (सौधन्वनाः) = ओम्-रूप उत्तम धनुष्वाले लोगो! (यदि) = यदि (तत् न इव हर्यथ) = इतने से ही आप्तकाम नहीं हो जाते हो तो (घ आ) = निश्चय से तृतीये सवने जीवन के तृतीय सवन में (मादयाध्वै) = आनन्द प्राप्ति के लिए अवश्य ऐसा करो ही। शरीर में सोम का पान हमारे जीवन को पवित्र बनाता है, यह पवित्रता व पोषण हमें बड़े महत्त्वपूर्ण लाभ न लगें तो हमें यह ध्यान करके सोमपान करना है कि यह हमारे जीवन-यज्ञ के तृतीय सवन में आनन्द देनेवाला होगा। बाल्यकाल प्रातः सवन है, यौवन माध्यन्दिन सवन है तथा वार्धक्य सायन्तन-सवन है। यह सोमपान हमें वार्धक्य में जीर्ण होने से बचाता है।

    भावार्थ

    भावार्थ –'सोम'-पान 'मुञ्जनेजन' का पान है। सोम शरीर को पुष्ट व पवित्र करता है। यह वार्धक्य में भी उल्लास को स्थिर रखता है।

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    विषय

    धनुर्धर पुरुषों और शिल्पियों के कर्तव्य ।

    भावार्थ

    हे ( सौधन्वनाः ) उत्तम ज्ञानवान् और धनुर्धर वीर पुरुषों के शिक्षण में कुशल पुरुषों ! आप लोग अपने अधीन पुरुषों को ( इति अब्रवीतन) ऐसा उपदेश देते रहा करो कि ( इदम् उदकं पिबत ) ऐसा जल पान किया करो । ( इदं ) यह ( मुञ्जनेजनं ) रोगों से छुड़ाने और शरीर को शुद्ध कर देने वाला औषधि रस ( घ ) निश्चय ही (पिवन ) पान किया करो । ( यदि ) यदि ( तत् न इव हर्यथ ) वह भी पान न करना चाहो तो ( तृतीये ) उन सबसे भी उत्तम ( सवने ) सोम आदि रस और ऐश्वर्य में ( घ ) ही ( मादयध्यै ) सदा आनन्दिन रहो ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    दीर्घतमा ऋषिः ॥ ऋभवो देवता ॥ छन्दः– १ विराट् जगती ॥ ३, ५, ६, ८, १२ निचृज्जगती । ७, १० जगती च । ३ निचृत् त्रिष्टुप् । ४, १३ भुरिक् त्रिष्टुप् । ९ स्वराट् त्रिष्टुप । ११ त्रिष्टुप् । १४ स्वराट् पङ्क्तिः । चतुर्दशर्चं सूक्तम् ॥

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    या मंत्रात उपमालंकार आहे. वैद्य, माता-पिता यांनी संपूर्ण रोगी व संतानांना असा उपदेश करावा की तुम्ही शारीरिक व आत्मिक सुखासाठी हे सेवन करावे, हे करू नये, हे अनुष्ठान करावे, हे करू नये. ज्यामुळे ते पूर्ण आत्मिक व शारीरिक सुखाने युक्त व्हावेत. ॥ ८ ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    Master experts of pharmacy and distillation of medicinal drinks, to the patients and admirers say: Taste and drink this tonic, or drink this one which has been purified and reinforced with munja grass, and if you choose to drink neither, then take this one prepared in the third distillation for purity and power and be happy.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    In the praise of medical men.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    O good vaidyas (physicians) ! (who are also expert archers)! you give instructions to your patients like drink this water, or drink the water purified with Munja grass or do not drink this or that beyerage. If you do not want anything, be exhilarated in the third state of Bliss which takes you away from all miseries — in an emancipated state.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    N/A

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    It is the duty of the Vaidyas (physicians) and parents io tell their patients and children as to what they should take and what not in order to enjoy physical and spiritual happiness, so that they may be full of perfect physical and spiritual delight.

    Foot Notes

    (सौधन्वनाः) शोभनानि धनूंषि येषां ते सुधन्वानः तेषु कुशलाः सद्वैद्या: = Good archers or those who use their drugs like arrows to destroy various diseases. (हर्यथ) कामयध्वम् = Desire.

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