ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 161/ मन्त्र 9
ऋषिः - दीर्घतमा औचथ्यः
देवता - ऋभवः
छन्दः - स्वराट्त्रिष्टुप्
स्वरः - धैवतः
आपो॒ भूयि॑ष्ठा॒ इत्येको॑ अब्रवीद॒ग्निर्भूयि॑ष्ठ॒ इत्य॒न्यो अ॑ब्रवीत्। व॒ध॒र्यन्तीं॑ ब॒हुभ्य॒: प्रैको॑ अब्रवीदृ॒ता वद॑न्तश्चम॒साँ अ॑पिंशत ॥
स्वर सहित पद पाठआपः॑ । भूयि॑ष्ठाः । इति॑ । एकः॑ । अ॒ब्र॒वी॒त् । अ॒ग्निः । भूयि॑ष्ठः । इति॑ । अ॒न्यः । अ॒ब्र॒वी॒त् । व॒धः॒ऽयन्ती॑म् । ब॒हुऽभ्यः॑ । प्र । एकः॑ । अ॒ब्र॒वी॒त् । ऋ॒ता । वद॑न्तः । च॒म॒सान् । अ॒पिं॒श॒त॒ ॥
स्वर रहित मन्त्र
आपो भूयिष्ठा इत्येको अब्रवीदग्निर्भूयिष्ठ इत्यन्यो अब्रवीत्। वधर्यन्तीं बहुभ्य: प्रैको अब्रवीदृता वदन्तश्चमसाँ अपिंशत ॥
स्वर रहित पद पाठआपः। भूयिष्ठाः। इति। एकः। अब्रवीत्। अग्निः। भूयिष्ठः। इति। अन्यः। अब्रवीत्। वधःऽयन्तीम्। बहुऽभ्यः। प्र। एकः। अब्रवीत्। ऋता। वदन्तः। चमसान्। अपिंशत ॥ १.१६१.९
ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 161; मन्त्र » 9
अष्टक » 2; अध्याय » 3; वर्ग » 5; मन्त्र » 4
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अष्टक » 2; अध्याय » 3; वर्ग » 5; मन्त्र » 4
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनस्तमेव विषयमाह ।
अन्वयः
हे मनुष्या यूयं यथैकः संयुक्तेषु पृथिव्यादिषु पदार्थेष्वापो भूयिष्ठा इत्यब्रवीदन्योऽग्निर्भूयिष्ठ इति प्राब्रवीदेको बहुभ्यो वधर्यन्तीं भूमिं भूयिष्ठामब्रवीदेवमृता वदन्तः सन्तः चमसानिव पदार्थानपिंशत ॥ ९ ॥
पदार्थः
(आपः) जलानि (भूयिष्ठाः) अधिकाः (इति) एवम् (एकः) (अब्रवीत्) ब्रूते (अग्निः) पावकः (भूयिष्ठः) अधिकः (इति) (अन्यः) (अब्रवीत्) ब्रूते (वधर्यन्तीम्) भूमिम् (बहुभ्यः) पदार्थेभ्यः (प्र) (एकः) (अब्रवीत्) वदति (ऋता) ऋतानि सत्यानि (वदन्तः) उच्चरन्तः (चमसान्) मेघानिव (अपिंशत) विभक्तान् कुरुत ॥ ९ ॥
भावार्थः
अस्मिन् संसारे स्थूलेषु पदार्थेषु वा केचिदपोऽधिकाः केचिदग्निमधिकं केचिद्भूमिं पुष्कलां वदन्ति परन्तु स्थूलेषु भूमिरेवाधिकास्तीति। सत्येन विज्ञानेन मेघाऽवयवविवेकवत् सर्वान् पदार्थान् विभक्तान् कृत्वा तत्त्वानि सर्वे सुपरीक्षेरन्नैतेन विना यथार्थां पदार्थविद्यां वेदितुं शक्नुवन्ति ॥ ९ ॥
हिन्दी (3)
विषय
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।
पदार्थ
हे मनुष्यो ! तुम जैसे (एकः) एक पुरुष संयुक्त पृथिवी आदि पदार्थों में (आपः) जल (भूयिष्ठा) अधिक हैं (इति) ऐसा (अब्रवीत्) कहता है (अन्यः) और दूसरा (अग्निः) अग्नि (भूयिष्ठः) अधिक है (इति) ऐसा (प्राब्रवीत्) उत्तमता से कहता है तथा (एकः) कोई (बहुभ्यः) बहुत पदार्थों में (वधर्यन्तीम्) बढ़ती हुई भूमि को अधिक (अब्रवीत्) बतलाता है इसी प्रकार (ऋता) सत्य बातों को (वदन्तः) कहनेवाले होते हुए सज्जन (चमसान्) मेघों के समान पदार्थों को (अपिंशत) अलग-अलग करो ॥ ९ ॥
भावार्थ
इस संसार में स्थूल पदार्थों के बीच कोई जल को अधिक, कोई अग्नि को अधिक और कोई भूमि को बड़ी-बड़ी बतलाते हैं। परन्तु स्थूल पदार्थों में भूमि ही अधिक है, इस प्रकार सत्यविज्ञान से मेघ के अवयवों का जो ज्ञान उसके समान सब पदार्थों को अलग-अलग कर सिद्धान्तों की सब परीक्षा करें, इस काम के विना यथार्थ पदार्थविद्या को नहीं जान सकते ॥ ९ ॥
विषय
आपः, अग्नि व वज्र
पदार्थ
१. (एकः) = एक विद्वान् (इति अब्रवीत्) = यह कहता है कि (आपः भूयिष्ठाः) = शरीरस्थ रेत: कण [आपः = रेतः] सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण हैं । गतमन्त्र के अनुसार ये ही शरीर में व्याप्त होकर इसका पवित्रीकरण व पोषण करते हैं । २. (अन्यः) = दूसरा विद्वान् (इति अब्रवीत्) = यह कहता है कि (अग्निः भूयिष्ठ:) = अग्नि तत्त्व सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है। 'आपः - सोम' यदि-शान्ति का प्रतीक है तो 'अग्नि' शक्ति का प्रतीक है। वस्तुतः शान्ति व शक्ति दोनों का ही महत्त्व है। ३. (एकः) = एक अन्य विद्वान् ने (प्र अब्रवीत्) = प्रकर्षेण यह कहा कि (बहुभ्यः) = इन अनेक शत्रुओं के लिए (वधर्यन्तीम्) = [वधर्=वज्र] वज्र की कामनावाली भावना को ही मैं भूयिष्ठ समझता हूँ । ४. इस प्रकार (ऋता वदन्तः) = ये सब ऋत बातों का प्रतिपादन करते हुए (चमसान्) = इन शरीरों को (अपिंशत) = [to adorn] अलंकृत करते हैं। 'ऋभु' आपः = रेतः कणों के रक्षण को महत्त्व देता है। इनके रक्षण से ही वह दीप्त ज्ञानाग्निवाला बनकर ज्ञान से चमक उठता है। 'विभ्वा' अग्नि को महत्त्व देता है। इसी से वह संसार में आगे बढ़ता है, उत्साहमय बना रहकर ऐश्वर्यवान् होता है। 'वाज' वासनाओं के विनाश पर बल देता है। वासनाओं के विनाश के लिए क्रियाशीलतारूप वज्र को अपनाता है। ये सब बातें जीवन के सौन्दर्य को बढ़ानेवाली हैं । रेतः कण शरीर को नीरोग बनाते हैं, अग्नितत्त्व मन में उत्साह को बनाये रखता है और वासना- विनाशक वज्र पवित्रता का प्रमुख साधन बनता है।
भावार्थ
भावार्थ- हम अपने जीवन में 'आपः, अग्नि व क्रियाशीलतारूप वज्र'- तीनों को स्थान दें। ये तीनों मिलकर ही जीवन को अलंकृत करते हैं ।
विषय
विद्वानों का नाना विद्याओं के प्रचार का कार्य । (
भावार्थ
हे विद्वान् पुरुषो ! आप लोगों में ( एकः ) एक विद्वान् ( इति अब्रवीत् ) यही उपदेश करे ( आपः भूयिष्ठाः) जल ही बहुत गुणों युक्त हैं । वह जलों की विद्याओं का ही उपदेश किया करे । ( अन्यः ) दूसरा व्यक्ति ( इति ) ऐसा ही ( अब्रवीत् ) उपदेश किया करे ( अग्निः भूयिष्ठः ) अग्नि ही बहुत गुणों से युक्त है । वह अग्नि के ही गुणों का उपदेश किया करे । और ( एकः ) आप में से एक ( बहुभ्यः ) बहुत से शिष्यों को ( वधर्यन्तीम् ) शस्त्रास्त्रों और विद्युत् की विद्या का या भूमि की विद्या का हो ( अब्रवीत् ) अच्छी प्रकार प्रवचन किया करे, उपदेश किया करे । इस प्रकार आप सब लोग ( ऋता वदन्तः ) सत्य ज्ञानों का उपदेश करते हुए ( चमसान् ) ज्ञान और ऐश्वर्यों का भोग करने वाले या ज्ञान जिज्ञासू मानवों को ( अपिंशत ) नाना विभागों में बाट दो ।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
दीर्घतमा ऋषिः ॥ ऋभवो देवता ॥ छन्दः– १ विराट् जगती ॥ ३, ५, ६, ८, १२ निचृज्जगती । ७, १० जगती च । ३ निचृत् त्रिष्टुप् । ४, १३ भुरिक् त्रिष्टुप् । ९ स्वराट् त्रिष्टुप । ११ त्रिष्टुप् । १४ स्वराट् पङ्क्तिः । चतुर्दशर्चं सूक्तम् ॥
मराठी (1)
भावार्थ
या जगात स्थूल पदार्थात कुणी जल, कुणी अग्नी तर कुणी भूमीला मोठे मानतात; परंतु स्थूल पदार्थात भूमीच अधिक आहे. या प्रकारच्या सत्यविज्ञानाने मेघाच्या अवयवाचे ज्ञान त्याच्यासारख्या सर्व पदार्थांना वेगवेगळे करून सिद्धांताची सर्वांनी परीक्षा करावी. या कार्याशिवाय यथार्थ पदार्थ विद्या जाणता येत नाही. ॥ ९ ॥
इंग्लिश (2)
Meaning
One of the experts says: waters are the best and most efficacious. Another says: fire is the best and most efficacious. Out of all, one speaks of earth as the most powerful for life and against anti-life. Thus do you all speak of the existent elements of truth and reality and distinguish between one source of power and grandeur and another for yourself and develop the same.
Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]
Various scientific analyses should be performed.
Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]
Among the combined objects like the earth, water is the most predominant, says one of the Ribhus (wisemen). Fire is the most predominant says another; the third declares the earth is the most predominant. All these are thus presenting the truth from different angles. They divide various articles like the particles of clouds.
Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]
N/A
Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]
In this world among the gross objects, some say the waters are most predominant, some tell us that the fire is the most predominant, but the earth is the predominant according to many wise men. All must analyze different elements and substances in a true. scientific perspective, as it is not possible to acquire the knowledge of various objects without this.
Foot Notes
(वर्धयन्तीम्) भूमिम् = The earth. (चमसान्) मेघान् इव = Like the clouds.
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