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ऋग्वेद मण्डल - 1 के सूक्त 161 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 161/ मन्त्र 4
    ऋषिः - दीर्घतमा औचथ्यः देवता - ऋभवः छन्दः - भुरिक्त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    च॒कृ॒वांस॑ ऋभव॒स्तद॑पृच्छत॒ क्वेद॑भू॒द्यः स्य दू॒तो न॒ आज॑गन्। य॒दावाख्य॑च्चम॒साञ्च॒तुर॑: कृ॒तानादित्त्वष्टा॒ ग्नास्व॒न्तर्न्या॑नजे ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    च॒कृ॒ऽवांसः॑ । ऋ॒भ॒वः॒ । तत् । अ॒पृ॒च्छ॒त॒ । क्व॑ । इत् । अ॒भू॒त् । यः । स्यः । दू॒तः । नः॒ । आ । अज॑गन् । य॒दा । अ॒व॒ऽअख्य॑त् । च॒म॒सान् । च॒तुरः॑ । कृ॒तान् । आत् । इत् । त्वष्टा॑ । ग्नासु॑ । अ॒न्तः । नि । आ॒न॒जे॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    चकृवांस ऋभवस्तदपृच्छत क्वेदभूद्यः स्य दूतो न आजगन्। यदावाख्यच्चमसाञ्चतुर: कृतानादित्त्वष्टा ग्नास्वन्तर्न्यानजे ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    चकृऽवांसः। ऋभवः। तत्। अपृच्छत। क्व। इत्। अभूत्। यः। स्यः। दूतः। नः। आ। अजगन्। यदा। अवऽअख्यत्। चमसान्। चतुरः। कृतान्। आत्। इत्। त्वष्टा। ग्नासु। अन्तः। नि। आनजे ॥ १.१६१.४

    ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 161; मन्त्र » 4
    अष्टक » 2; अध्याय » 3; वर्ग » 4; मन्त्र » 4
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनस्तमेव विषयमाह ।

    अन्वयः

    हे चकृवांस ऋभवो यो दूतो न आजगन् स्य सः क्वाभूदिति तदित्तमेव विदुषः प्रति भवन्तोऽपृच्छत। यस्त्वष्टा यदा चमसानवाख्यत्तदा स चतुरः कृतान् विजानीयादात्स इत् ग्नास्वन्तर्यानानि न्यानजे ॥ ४ ॥

    पदार्थः

    (चकृवांसः) कर्त्तारः (ऋभवः) मेधाविनः। ऋभुरिति मेधाविना०। निघं० ३। १५। (तत्) (अपृच्छत) पृच्छन्तु (क्व) कस्मिन् (इत्) एव (अभूत्) भवति (यः) (स्यः) (दूतः) (नः) अस्मान् (आ) (अजगन्) पुनः पुनः प्राप्नोति (यदा) (अवाख्यत्) प्रख्यापयेत् (चमसान्) मेघान् (चतुरः) वाय्वग्निजलभूमीः (कृतान्) (आत्) (इत्) (त्वष्टा) तनूकर्त्ता (ग्नासु) गन्तुं योग्यासु भूमिषु (अन्तः) मध्ये (नि) (आनजे) अस्येच्चालयेत् ॥ ४ ॥

    भावार्थः

    ये विद्वत्सनीडे सुशिक्षा विद्यां च प्राप्य सर्वसिद्धान्तोत्तराणि विज्ञाय कार्येषु संप्रयुञ्जते ते मेधाविनो जायन्ते ॥ ४ ॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

    पदार्थ

    हे (चकृवांसः) कर्म करनेवाले (ऋभवः) मेधावि सज्जनो ! (यः) जो (दूतः) दूत (नः) हमारे प्रति (आ, अजगन्) बार-बार प्राप्त होवे (स्थः) वह (क्व) कहाँ (अभूत्) उत्पन्न हुआ है (तत्, इत्) उस ही को विद्वानों के प्रति आप लोग (अपृच्छत) पूछो। जो (त्वष्टा) सूक्ष्मता करनेवाला (यदा) जब (चमसान्) मेघों को (अवाख्यत्) विख्यात करे तब वह (चतुरः) चार पदार्थों को अर्थात् वायु, अग्नि, जल और भूमि को (कृतान्) किये हुए अर्थात् पदार्थ विद्या से उपयोग में लिये हुए जाने (आत्) और (इत्) वही (ग्नासु) गमन करने योग्य भूमियों के (अन्तः) बीच यानों को (नि, आनजे) चलावे ॥ ४ ॥

    भावार्थ

    जो विद्वानों के समीप में उत्तम शिक्षा और विद्या को पाकर समस्त सिद्धान्तों के उत्तरों को जान कार्य्यों में अत्युत्तम योग करते हैं, वे बुद्धिमान् होते हैं ॥ ४ ॥

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    विषय

    जीवन-परिष्कार

    पदार्थ

    १. गतमन्त्र में वर्णित कर्त्तव्यों को (चकृवांसः) = पालन करनेवाले (ऋभवः) = 'ऋभु, विश्वा और वाज' - ज्ञानदीप्त, ऐश्वर्यसम्पन्न, त्यागी (तत् अपृच्छत) = यह बात पूछते हैं कि (यः स्यः) = जो वह (दूतः) = प्रभु का सन्देश देनेवाला अग्नि (नः आजगन्) = हमें प्राप्त हुआ था (क्व इत् अभूत्) = वह कहाँ है ? ताकि हम उससे चर्चा करके यह जान सकें कि हमने कर्त्तव्यों को कहाँ तक निभाया है और हमें और क्या करना है ? उससे ज्ञान प्राप्त करके हम अपने कर्त्तव्यों को पूर्ण करनेवाले बनें । २. इन कर्त्तव्यों को पूर्ण करने पर (यदा) = जब (त्वष्टा) = संसार का निर्माता - ज्ञानदीप्त प्रभु हमसे (कृतान्) = किये (चतुरः चमसान्) = चार चम्मचों को (अवाख्यत्) = देखता है, अर्थात् 'हमने इस जीवन को चारों आश्रमों में चलते हुए एक को चार भागों में बाँट-सा दिया है' – इस बात के देखने पर (आत् इत्) = शीघ्र ही वे निर्माता प्रभु (ग्नासु) = वेदवाणियों के (अन्तः) = अन्दर (नि आनजे) = हमारे जीवनों को निश्चय से अलंकृत करते हैं। जब एक व्यक्ति कर्तव्य मार्ग पर चलने का प्रयत्न करता है तब प्रभु भी उसके सहायक बनते हैं और इसके जीवन को वेदवाणियों से परिष्कृत कर डालते हैं।

    भावार्थ

    भावार्थ- जब हम अपने जीवन को चारों आश्रमों में चलाने का संकल्प कर लेते हैं तब प्रभु हमारे जीवन को अलंकृत कर देते हैं।

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    विषय

    सूर्य मेघ के दृष्टान्त से राजा वा शासकों का कर्त्तव्य ।

    भावार्थ

    जिस प्रकार ( त्वष्टा ) सूर्य ( कृतान् चमसान् ) उत्पन्न किये मेघों को प्रकट करता है और स्वयं ( ग्नासु अन्तः नि आनजे ) भित्तियों व दिशाओं के बीच में भी प्रकाशित होता है उसी प्रकार (त्वष्टा) तेजस्वी पुरुष ( यत् ) जिन ( कृतान् ) स्वयं तैयार किये ( चतुरः ) चार ( चमसान् ) शत्रु पक्ष के खो जाने वाले चतुरंग सैन्य बलों को मेघ के समान शस्त्रवर्षी और चारों वर्णों या चारों आश्रमों को राज्य समृद्धि के भोक्ता रूप से ( कृतान् ) सुव्यवस्थित रूप से बने और अच्छे रूप से आचरण किये हुए ( अव अख्यत् ) अपने अधीन देखता है । तब वह ( त्वष्टा ) राजा सूर्य के समान तेजस्वी होकर (ग्नासु अन्तः) गमन करने योग्य दाराओं में पति के समान, प्रजा और शासन करने योग्य भूमियों के बीच उनका भोक्ता होकर ( नि आनजे ) सब प्रकार से प्रकाशित होता है । तब ( चकृवांसः ) राज्य शासन करने वाले, ( ऋभवः ) सत्य धर्म और ज्ञान से प्रकाशित होने वाले बड़े पुरुष ( तत् अपृच्छत ) उससे यह प्रश्न करें कि ( यः स्यः दूतः नः आजगन् ) वह जो भी दूत हमारे पास आवे ( क्व इत् अभूत् ) वह कहां रहे ? प्रमुख प्रमुख विद्वान् को किस किस पद पर स्थापित करें। इस प्रकार राजा से पूछ कर विद्वान् लोग उसी प्रकार उसका निश्चय करें जैसे विद्वान् लोग अग्नि के नाना कार्यों, उसके स्वरूप और प्रयोगों का प्रश्न किया करते हैं ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    दीर्घतमा ऋषिः ॥ ऋभवो देवता ॥ छन्दः– १ विराट् जगती ॥ ३, ५, ६, ८, १२ निचृज्जगती । ७, १० जगती च । ३ निचृत् त्रिष्टुप् । ४, १३ भुरिक् त्रिष्टुप् । ९ स्वराट् त्रिष्टुप । ११ त्रिष्टुप् । १४ स्वराट् पङ्क्तिः । चतुर्दशर्चं सूक्तम् ॥

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    जे विद्वानांच्या संगतीने उत्तम शिक्षण व विद्या प्राप्त करून संपूर्ण सिद्धांताची उत्तरे जाणून कार्यामध्ये अत्युत्तम संप्रयोजन करतात ते बुद्धिमान असतात. ॥ ४ ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    O Rbhus, eminent scientists, technologists and engineers of the top-most intellectual order of vision and dynamic action, if that messenger of knowledge, light and fire energy were to come to us, ask him where the origin of that power is, and who the messenger is, since when Tvashta, analyst and maker of fine things, analysed one form of composite matter or compound such as the cloud or a ladleful of sacrificial input of the furnace-vedi into its four chemical components like earth, water, heat and vayu, wind energy of electric potential, then only was agni energy able to move things over and into the moving spheres such as earth.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    The old theme is further developed.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    o wisemen ! you do noble deeds. I put to you some questions. Who is the communicator of truth that comes to us? Ask enlightened persons about him. When an analyzing scientist investigates about the clouds then he should know about four elements — air, fire, water and earth. It is after getting the knowledge of these four elements, that he is able to manifest good carriers on earth.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    N/A

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    Those who utilize the knowledge and good education, they received it from the enlightened persons. They also get the answer of all questions regarding the fundamental principles, and become great geniuses.

    Foot Notes

    (ॠऋभव:) मेधाविनः - Geniuses. (ग्नासु) गन्तुं योग्यासु भूमिषु = On different parts of the earth. (त्वष्टा ) तनूकर्ता = Analyzer, an investigating scientist.

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