ऋग्वेद मण्डल - 1 के सूक्त 43 के मन्त्र
1 2 3 4 5 6 7 8 9

मन्त्र चुनें

  • ऋग्वेद का मुख्य पृष्ठ
  • ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 43/ मन्त्र 1
    ऋषि: - कण्वो घौरः देवता - रुद्रः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः
    पदार्थ -

    हम लोग (कत्) कब (प्रचेतसे) उत्तम ज्ञानयुक्त (मीढुष्टमाय) अतिशय करके सेवन करने वा (तव्यसे) अत्यन्त वृद्ध (हृदे) हृदय में रहनेवाले (रुद्राय) परमेश्वर जीव वा प्राण वायु के लिये (शंतमम्) अत्यन्त सुख रूप वेद का (वोचेम) अच्छे प्रकार उपदेश करें ॥१॥

    भावार्थ -

    रुद्र शब्द से तीन अर्थों का ग्रहण है, परमेश्वर, जीव और वायु उनमें से परमेश्वर अपने सर्वज्ञपन से जिसने जैसा पाप कर्म किया उस कर्म के अनुसार फल देने में उसको रोदन करनेवाले है। जीव निश्चय करके मरने समय अन्य से सम्बन्धियों को इच्छा कराता हुआ शरीर को छोड़ता है, तब अपने आप रोता है और वायु शूल आदि पीड़ा कर्म से रोदन कर्म का निमित्त है इन तीनों के योग से मनुष्यों को अत्यन्त सुखों को प्राप्त होना चाहिये ॥१॥

    अन्वय -

    अथ रुद्रशब्दार्थ उपदिश्यते।

    पदार्थ -

    वयं कत्कदा प्रचेतसे मीढुष्टमाय तव्यसे हृदे रुद्राय शंतमं वोचेम ॥१॥

    भावार्थ -

    रुद्रशब्देन त्रयोऽर्था गृह्यंते। परमेश्वरो जीवो वायुश्चेति तत्र परमेश्वरः सर्वज्ञतया येन यादृशं पापकर्म कृतं तत्फलदानेन रोदयिताऽस्ति जीवः खलु यदा मरणसमये शरीरं जहाति पापफलं च भुंक्ते तदा स्वयं रोदिति वायुश्च शूलादिपीडाकर्म्मणा कर्मनिमित्तः सन्रोदयिताऽस्त्यत एते रुद्रा विज्ञेयाः ॥१॥

    भावार्थ -

    भावार्थ - रुद्र या शब्दाचे तीन अर्थ स्वीकारले जातात. परमेश्वर, जीव व वायू. परमेश्वर सर्वज्ञतेने प्रत्येकाला त्याच्या पापकर्माचे फळ देतो त्यामुळे त्याला रोदन करविणारा म्हटले जाते. जीव निश्चयाने मरताना इतर संबंधाची इच्छा करीत, पापकर्माचे फळ भोगत शरीराचा त्याग करताना रडतो, तसेच वायू, वेदना, त्रासामुळे रोदन कर्माचे निमित्त आहे. हे जाणावे. ॥ १ ॥

    कृपया कम से कम 20 शब्द लिखें!
    Top