ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 43/ मन्त्र 3
यथा॑ नो मि॒त्रो वरु॑णो॒ यथा॑ रु॒द्रश्चिके॑तति । यथा॒ विश्वे॑ स॒जोष॑सः ॥
स्वर सहित पद पाठयथा॑ । नः॒ । मि॒त्रः । वरु॑णः । यथा॑ । रु॒द्रः । चिके॑तति । यथा॑ । विश्वे॑ । स॒ऽजोष॑सः ॥
स्वर रहित मन्त्र
यथा नो मित्रो वरुणो यथा रुद्रश्चिकेतति । यथा विश्वे सजोषसः ॥
स्वर रहित पद पाठयथा । नः । मित्रः । वरुणः । यथा । रुद्रः । चिकेतति । यथा । विश्वे । सजोषसः॥
ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 43; मन्त्र » 3
अष्टक » 1; अध्याय » 3; वर्ग » 26; मन्त्र » 3
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अष्टक » 1; अध्याय » 3; वर्ग » 26; मन्त्र » 3
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
(यथा) येन प्रकारेण (नः) अस्मान् (मित्रः) सखा प्राणो वा (वरुणः) उत्तम उपदेष्टोदानो वा (यथा) (रुद्रः) परमेश्वरः (चिकेतति) ज्ञापयति (यथा) (विश्वे) सर्वे (सजोषसः) समानो जोषः प्रीतिः सेवनं वा येषान्ते ॥३॥
अन्वयः
अथ सर्वैः सह विद्वांसः कथं वर्तेरन्नित्युपदिश्यते।
पदार्थः
यथा मित्रो यथा वरुणो यथा रुद्रो नोऽस्माँश्चिकेतति यथा विश्वे सजोषसः सर्वे विद्वांसः सर्वा विद्याश्चिकेतन्ति तथाऽऽप्ता जनाः सत्यं विज्ञापयन्तु ॥३॥
भावार्थः
अत्रोपमालंकारः। यथा सर्वैर्विद्वद्भिर्मैत्रीमुत्तमशीलं च धृत्वा सर्वेभ्यो मनुष्येभ्यो यथार्था विद्या उपदेष्टव्याः। यथा परमेश्वरेण वेदद्वारा सर्वा विद्याः प्रकाशितास्तथैवाध्यापकैः सर्वे मनुष्या विद्यायुक्ताः सम्पादनीया इति ॥३॥
हिन्दी (4)
विषय
अब सबके साथ विद्वान् लोग कैसे वर्त्तें, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।
पदार्थ
(यथा) जैसे (मित्रः) सखा वा प्राण (वरुणः) उत्तम उपदेष्टा वा उदान (यथा) जैसे (रुद्रः) परमेश्वर (नः) हम लोगों को (चिकेतति) ज्ञानयुक्त करते हैं (यथा) जैसे (विश्वे) सब (सजोषसः) स्वतुल्य प्रीति सेवन करने वाले विद्वान् लोग सब विद्याओं के जाननेवाले होते हैं, वैसे यथार्थ वक्ता पुरुष सबको जनाया करें ॥३॥
भावार्थ
इस मंत्र में उपमालंकार है। जैसे विद्वान् लोग सब मनुष्यों को मित्रपन और उत्तम शील धारण कराकर उनके लिये यथार्थ विद्याओं की प्राप्ति और जैसे परमेश्वर ने वेदद्वारा सब विद्याओं का प्रकाश किया है, वैसे विद्वान् अध्यापकों को भी सब मनुष्यों को विद्यायुक्त करना चाहिये ॥३॥
विषय
उत्तम निवास व रोगापनयन
पदार्थ
१. पूर्वमन्त्र के अनुसार हम उस 'रुद्र' प्रभु का शन्तम स्तोत्र कब कर पाएँगे (यथा) - जिससे कि (मित्रः , वरुणः) - मित्र और वरुण (नः) - हमें (चिकेतति) - अनुग्राह्यत्वेन जानें अथवा हमारे लिए निवास को उत्तम बनाएँ तथा हमारे रोगों को दूर करें [कित ज्ञाने अथवा कित निवासे रोगापनयेन च] 'मित्र' स्नेह का देवता है, 'वरुण' द्वेष - निवारण का । एवं, भाव यह हुआ कि हम प्रभु का ऐसा स्तवन करें जिससे कि 'स्नेह व निर्द्वेषता' से परिपूर्ण होकर हम शरीर व मन दोनों से नीरोग बनें ।
२. हमारा प्रभुस्तवन इस प्रकार हो कि (यथा) - जिससे (रुद्रः) - वह रोगों का चिकित्सक प्रभु (चिकेतति) - हमारे लिए नीरोगता प्राप्त करानेवाला हो और (यथा) - जिससे (विश्वे) - सब देव (सजोषसः) - समान प्रीतिवाले होकर हमारे निवास को उत्तम बनानेवाले हों ।
भावार्थ
भावार्थ - मित्र, वरुण, रुद्र व सब देव हमें नीरोगता प्रदान करें । हम उनके अनुग्रह के पात्र हों ।
विषय
रुद्र, मित्र, वरुण इन अधिकारिथों का वर्णन ।
भावार्थ
(यथा) जिस प्रकार (नः) हमें (मित्रः) हमारा मित्र या प्राण (चिकेतति) हमें चेताता और चैतन्य बनाये रखता है और (यथा) जिस प्रकार (वरुणः) सर्वश्रेष्ठ विद्वान्, अज्ञानों और दुष्टों का वारक राजा (नः चिकेतति) हमें कुमार्ग में पैर रखने से चेताता है। और (नः चिकेतति) हमें वार वार चेताता रहता है। और (यथा) जिस प्रकार (विश्वे सजोषसः) समस्त प्रेम से युक्त पुरुष (नः चिकेतन्ति) हमें संकट से चेताते हैं उसी प्रकार वह (रुद्रः) दुष्टों का पीड़क परमेश्वर राजा और ज्ञानोपदेष्टा आचार्य भी समस्त प्रजाओं, पुत्रों और शिष्यों को उपदेश करें उनको कष्टों, दुःखों से बचावें।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
१-९ कण्वो घौर ऋषिः ॥ देवता १, २, ४—६ रुद्रः । ३ मित्रावरुणौ । ७-९ सोमः ॥ छन्दः—१, ७, ८ गायत्री । ५ विराङ्गायत्री । ६ पादनिचृद्गायत्री । ९ अनुष्टुप् ॥
विषय
अब सबके साथ विद्वान् लोग कैसे वर्त्तें, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।
सन्धिविच्छेदसहितोऽन्वयः
यथा मित्रः यथा वरुणः यथा रुद्रः नःअस्मान् चिकेतति यथा विश्वे सजोषसः सर्वे विद्वांसः सर्वा विद्यान् चिकेतन्ति तथा आप्ता जनाः सत्यं विज्ञापयन्तु ॥३॥
पदार्थ
(यथा) येन प्रकारेण=जिस प्रकार से, (मित्रः)= सखा, (यथा) येन प्रकारेण= जिस प्रकार से, (वरुणः) उत्तम उपदेष्टोदानो वा = उत्तम उपदेशों को देनेवाले, (यथा) येन प्रकारेण= जिस प्रकार से, (रुद्रः) परमेश्वरः=परमेश्वर, (नः) अस्मान्= हमें, (चिकेतति) ज्ञापयति=जानकारी देता है, (यथा) येन प्रकारेण= जिस प्रकार से, (विश्वे) सर्वे=समस्त, (सजोषसः) समानो जोषः प्रीतिः सेवनं वा येषान्ते=आनन्द, प्रीति और उपासना जिनमें हैं,वे (सर्वे)=समस्त, (विद्वांसः) =विद्वान्, (सर्वा)= समस्त, (विद्यान्)= विद्याओं की, (चिकेतन्ति)= जानकारी देते हैं, (तथा)=वैसे ही, (आप्ता)= आप्त, (जनाः)=लोग, (सत्यम्)= सत्य की, (विज्ञापयन्तु)= जानकारी देते हैं ॥३॥
महर्षिकृत भावार्थ का भाषानुवाद
इस मंत्र में उपमालंकार है। जैसे सब विद्वानों के द्वारा मित्रता और उत्तम स्वभाव धारण करके सब मनुष्यों के लिये उचित रूप से विद्या का उपदेश करना चाहिए। जैसे परमेश्वर से वेद विद्या के द्वारा समस्त विद्यायें प्रकाशित की गईं हैं, उसी प्रकार अध्यापकों के द्वारा सब मनुष्यों को विद्या से युक्त बनाना चाहिये ॥३॥
विशेष
अनुवादक की टिप्पणी- आप्त- महर्षि दयानन्द सरस्वती के अनुसार आप्त की परिभाषा-जो छलादि दोषरहित, धर्मात्मा, विद्वान् सत्योपदेष्टा, सब पर कृपादृष्टि से वर्त्तमान होकर अविद्यान्धकार का नाश करके अज्ञानी लोगों के आत्माओं में विद्यारूप सूर्य का प्रकाश सदा करे, उसको 'आप्त' कहते हैं।
पदार्थान्वयः(म.द.स.)
(यथा) जिस प्रकार से (मित्रः) सखा, (यथा) जिस प्रकार से (वरुणः) उत्तम उपदेशों को देनेवाले [और] (यथा) जिस प्रकार से (रुद्रः) परमेश्वर (नः) हमें (चिकेतति) जानकारी देते हैं। (यथा) जिस प्रकार से (विश्वे) समस्त [लोग] (सजोषसः) जिनमें आनन्द, प्रीति और उपासना हैं, वे (सर्वे) सब (विद्वांसः) विद्वान् (सर्वा) समस्त (विद्यान्) विद्याओं की (चिकेतन्ति) जानकारी देते हैं। (तथा) वैसे ही (आप्ता) आप्त (जनाः) लोग (सत्यम्) सत्य की (विज्ञापयन्तु) जानकारी देते हैं ॥३॥
संस्कृत भाग
पदार्थः(महर्षिकृत)- (यथा) येन प्रकारेण (नः) अस्मान् (मित्रः) सखा प्राणो वा (वरुणः) उत्तम उपदेष्टोदानो वा (यथा) (रुद्रः) परमेश्वरः (चिकेतति) ज्ञापयति (यथा) (विश्वे) सर्वे (सजोषसः) समानो जोषः प्रीतिः सेवनं वा येषान्ते ॥३॥ विषयः- अथ सर्वैः सह विद्वांसः कथं वर्तेरन्नित्युपदिश्यते। अन्वयः- यथा मित्रो यथा वरुणो यथा रुद्रो नोऽस्माँश्चिकेतति यथा विश्वे सजोषसः सर्वे विद्वांसः सर्वा विद्याश्चिकेतन्ति तथाऽऽप्ता जनाः सत्यं विज्ञापयन्तु ॥३॥ भावार्थः(महर्षिकृतः)-अत्रोपमालंकारः। यथा सर्वैर्विद्वद्भिर्मैत्रीमुत्तमशीलं च धृत्वा सर्वेभ्यो मनुष्येभ्यो यथार्था विद्या उपदेष्टव्याः। यथा परमेश्वरेण वेदद्वारा सर्वा विद्याः प्रकाशितास्तथैवाध्यापकैः सर्वे मनुष्या विद्यायुक्ताः सम्पादनीया इति ॥३॥
मराठी (1)
भावार्थ
या मंत्रात उपमालंकार आहे. जसे विद्वान लोक सर्व माणसांना मैत्री व उत्तम शील धारण करवून त्यांना यथार्थ विद्या देतात व जसे परमेश्वराद्वारे वेदातून सर्व विद्या प्रकट केलेल्या आहेत तसे विद्वान अध्यापकांनीही सर्व माणसांना विद्यायुक्त करावे. ॥ ३ ॥
इंग्लिश (3)
Meaning
Just as Mitra, universal friend and breath of life, Varuna, lord omniscient and the teacher, Rudra, lord of love and justice, and all friends of life and common humanity energise and enlighten us, so may all the teachers of the earth give us the light and energy of life.
Etymology and English translation based on Anvaya (logical connection of words) of Maharshi Dayanad Saraswati (M.D.S)-
(yathā)=the kind, (mitraḥ)=friends, (yathā)=the kind, (varuṇaḥ)= good preachers and [aura]=and (yathā) = the kind, (rudraḥ)=God, (naḥ)=to us, (ciketati)=give information, (yathā)=like, (viśve) =all, [loga]=people, (sajoṣasaḥ)=In whom there is joy, love and worship, they, (sarve)=all, (vidvāṃsaḥ)=scholars, (sarvā)=all, (vidyān)=of sholar’s (ciketanti)=give information, (tathā)=in the same way, (āptā)=trusted, (janāḥ)=people, (satyam)=of truth, (vijñāpayantu)=give information.
English Translation (K.K.V.)
The kind of friend, the kind who give good teachings and the way God informs us. Just as all the people who have joy, love and worship, all the scholars give information about all the knowledge. In the same way, trusted people give information about the truth.
TranslaTranslation of gist of the mantra by Maharshi Dayanandtion of gist of the mantra by Maharshi Dayanand
There is simile as a figurative in this mantra.Just as all scholars should maintain friendship and good nature and preach knowledge appropriately to all human beings. Just as all the knowledge has been revealed from God through the knowledge of Vedas, in the same way all human beings should be made equipped with knowledge through teacher.
TRANSLATOR’S NOTES-
āpta- Definition of āpta according to Maharishi Dayanand Saraswati – One who is devoid of deceit, virtuous, learned preacher of truth, being present with the blessings of all, destroys the darkness of ignorance and always gives light of the sun in the form of knowledge in the souls of ignorant people, is called ' āpta'.
Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]
How should learned persons behave with all is taught in the third Mantra.
Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]
As a friend or Prana, as noble preacher or udana and God give us good knowledge and as all enlightened persons with one accord or united do, so should all learned and absolutely truthful persons teach truth to us.
Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]
( मित्र:) सखा प्राणो वा = Friend or Prana. ( वरुण:) उत्तम उपदेष्टा उदानो वा = Noble preacher or Udana.( सजोषसः) समानो जोषः प्रीतिः सेवनं वा येषां ते = Loving one another, united or of one accord.
Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]
As learned persons should give true knowledge to all having friendship with them, good character and conduct, as God has revealed all sciences through the Vedas, in the same manner, teachers also should endow all with knowledge.
Translator's Notes
For the meaning of Mitra and Varuna as प्राण and Udana, there is the clear authority of the Shatapath Brahman which says. प्राणोदानौ वै मित्रावरुणौ (शतपथे १.८.३.१.२.३.६. १.१६ ) । प्राणोदानौ मित्रावरुणौ ( शत० ३.२.२.१३)
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