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ऋग्वेद मण्डल - 1 के सूक्त 43 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 43/ मन्त्र 2
    ऋषिः - कण्वो घौरः देवता - रुद्रः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः

    यथा॑ नो॒ अदि॑तिः॒ कर॒त्पश्वे॒ नृभ्यो॒ यथा॒ गवे॑ । यथा॑ तो॒काय॑ रु॒द्रिय॑म् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    यथा॑ । नः॒ । अदि॑तिः । कर॑त् । पश्वे॑ । नृऽभ्यः॑ । यथा॑ । गवे॑ । यथा॑ । तो॒काय॑ । रु॒द्रिय॑म् ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यथा नो अदितिः करत्पश्वे नृभ्यो यथा गवे । यथा तोकाय रुद्रियम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    यथा । नः । अदितिः । करत् । पश्वे । नृभ्यः । यथा । गवे । यथा । तोकाय । रुद्रियम्॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 43; मन्त्र » 2
    अष्टक » 1; अध्याय » 3; वर्ग » 26; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनः स किं करोतीत्युपदिश्यते।

    अन्वयः

    यथा तोकायादितिर्माता यथा पश्वे पशुपालो यथा नृभ्यो नरेशो यथा गवे गोपालश्च सुखं करत् कुर्यात् तथा नोऽस्मभ्यं रुद्रियं कर्म स्यात् ॥२॥

    पदार्थः

    (यथा) येन प्रकारेण (नः) अस्मभ्यम् (अदितिः) माता। अत्रादितिर्द्यौः इत्यादिना माता गृह्यते। (करत्) कुर्य्यात्। अत्राऽयं# भ्वादि*। (पश्वे) पशुसमूहाय पशुपालः। अत्र जसादिषु छन्दसि वा वचनम्। अ० ७।६।१०९। इति वार्त्तिकेनायं सिद्धः। (नृभ्यः) यथा मनुष्येभ्यो नृपतिः (यथा) (गवे) इन्द्रियाय जीवः पृथिव्यै कृषीवलः (यथा) (तोकाय) सद्योजातायापत्याय बालकाय (रुद्रियम्) रुद्रस्येदं कर्म। अत्र पृषोदराद्याकृतिगणान्तर्गतत्वात् इदमर्थे घः ॥२॥ #[टि० १ कृधातुः। सं०] *[महर्षियाऽत्र भ्यादि गणेऽपि कृधातुः स्वीकृतः, परं वर्त्तमान मुद्रितेषु धातुपाठेषु कृधातु र्भ्यादिगणे नोपलभ्यते, एवं ज्ञायते यत्पुरा काले भ्ऽवादिगणे अपि कृधातुरासीद् यस्य ‘करति, करतः, करन्ति,’ भ्वादि रूपाण्यपि प्रचलितान्यासन् यथास्यैव सूक्त्तस्य षष्ठेमन्त्रे ‘करति’ इति प्रयोगो वर्तते। परमाधुनिकै वैय्याकरणम्मन्यैस्तनादि गणे कृधातुं दृष्ट्वा भ्वादिपाठादसौ बहिष्कृतः। सं०।]

    भावार्थः

    अत्रोपमालंकारः। यथा मातापितृभ्यां सन्तानाय पशुभ्यो गोपालेन राजसभया च विना प्रजाभ्यः सुखं न जायते तथैव विद्यापुरुषार्थाभ्यां विना सुखं न भवति ॥२॥

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    हिन्दी (4)

    विषय

    फिर वह क्या करता है, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

    पदार्थ

    (यथा) जैसे (तोकाय) उत्पन्न हुए बालक के लिये (अदितिः) माता (यथा) जैसे (पश्वे) पशु समूह के लिये पशुओं का पालक (यथा) जैसे (नृभ्यः) मनुष्यों के लिये राजा (यथा) जैसे (गवे) इन्द्रियों के लिये जीव वा पृथिवी के लिये खेती करनेवाला (करत्) सुखों को करता है वैसे (नः) हम लोगों के लिये (रुद्रियम्) परमेश्वर वा पवनों का कर्म प्राप्त हो ॥२॥

    भावार्थ

    इस मंत्र में उपमाऽलंकार है। जैसे माता-पिता पुत्र के लिये, गोपाल पशुओं के लिये और राजसभा प्रजा के लिये सुखकारी होते हैं वैसे ही सुखों के करने और कराने वाले परमेश्वर और पवन भी हैं ॥२॥

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    विषय

    अदितिः व कल्याण

    पदार्थ

    १. (यथा) - जैसे (अदितिः) - [इयं वै पृथिवी अदितिः - शत० १/१/४/५, नि० १/१] यह पृथिवी (पश्वे) - पशुओं के लिए (करत्) - घास आदि को उत्पन्न करती है ।
    २. (यथा) - जैसे (अदितिः) - [गोनाम, नि० २/११] गौ (नृभ्यः) - मनुष्यों के हित के लिए (करत्) - करती है ।
    ३. (यथा) - जैसे (अदितिः) - वेदवाणी [वाङ्नाम, नि० १/११] (गवे) - ज्ञानेन्द्रियों के लिए (करत्) - ज्ञान को प्राप्त कराती है । 
    ४. (यथा) - जैसे (अदितिः) - अदीना देवमाता - दीनता से ऊपर उठी हुई दिव्य गुणों का निर्माण करनेवाली माता (तोकाय) - सन्तान के लिए (करत्) - कल्याण करती और गुणों को सिद्ध करती है उसी प्रकार (नः) - हमारे लिए (अदितिः) - यह वेदवाणी (रुद्रियम्) - रुद्र - सम्बन्धी उपदेश को (करत्) - करती है, अर्थात् यह वेदवाणी हमें प्रभु का उपदेश देती है । 
     

    भावार्थ

    भावार्थ - वेद उस प्रभु का उपदेश देता है जो हमें निरन्तर प्रेरणा प्राप्त करा रहे हैं । 
     

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    विषय

    रुद्र, मित्र, वरुण इन अधिकारिथों का वर्णन ।

    भावार्थ

    (यथा) जिस प्रकार (अदितिः) पृथिवी (पश्वे) पशुओं को घास आदि खाने को देती है और (अदितिः) अखण्ड शासन वाली राज्यव्यवस्था या राजा (नृभ्यः) मनुष्यों की वृद्धि और हित के लिए होता हैं और (यथा) जिस प्रकार (अदितिः) गोपाल (गवे) गौओं के हित के लिए पालन करता है और (यथा) जिस प्रकार (अदितिः) माता (तोकाय) बालक के लिए अति प्रिय पोषक होती है। उसी प्रकार (नः) हमारे लिए शत्रु और और दुष्टों के रुलाने वाले रुद्र, परमेश्वर, राजा का यह जगत्सर्जन, दुष्ट दमन आदि कार्य और विद्वान् उपदेष्टा का उपदेश आदि कार्य (करत्) हमारी कल्याण-वृद्धि करे।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    १-९ कण्वो घौर ऋषिः ॥ देवता १, २, ४—६ रुद्रः । ३ मित्रावरुणौ । ७-९ सोमः ॥ छन्दः—१, ७, ८ गायत्री । ५ विराङ्गायत्री । ६ पादनिचृद्गायत्री । ९ अनुष्टुप् ॥

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    विषय

    फिर वह क्या करता है, इस विषय का उपदेश इस मंत्र में किया है।

    सन्धिविच्छेदसहितोऽन्वयः

    यथा तोकाय अदितिः माता यथा पश्वे पशुपालः यथा नृभ्यः नरेशः यथा गवे गोपालः च सुखं करत् कुर्यात् तथा नःअस्मभ्यं रुद्रियं कर्म स्यात् ॥२॥

    पदार्थ

    (यथा) येन प्रकारेण=जिस प्रकार से, (तोकाय) सद्योजातायापत्याय बालकाय=अभी-अभी उत्पन्न हुए बालक पुत्र के लिये, (अदितिः) माता= माता, (यथा) येन प्रकारेण= जिस प्रकार से, (पश्वे) पशुसमूहाय पशुपालः= पशुओं के समूह के लिये पशुपालक, (यथा) येन प्रकारेण=जिस प्रकार से, (नृभ्यः) यथा मनुष्येभ्यो नृपतिः=मनुष्यों के लिये राजा, (यथा) येन प्रकारेण= जिस प्रकार से, (गवे) इन्द्रियाय जीवः पृथिव्यै कृषीवलः= इन्द्रियों के लिये जीव और पृथिवी के लिये किसान, (गोपालः)=गायों का पालक, (च)=और, (सुखम्)=सुख, (करत्) कुर्य्यात्=करता है, (तथा)=वैसे ही, (नः) अस्मभ्यम्=हमारे लिये, (रुद्रियम्) रुद्रस्येदं कर्म= दुष्टों को रुलानेवाले रुद्र अर्थात् परमेश्वर [की सेवा के] यह कर्म, (स्यात्)=होवें ॥२॥

    महर्षिकृत भावार्थ का भाषानुवाद

    इस मंत्र में उपमाऽलंकार है। जैसे माता-पिता द्वारा सन्तान के लिये और पशुओं और गायों के पालन के विना और राजसभा के विना प्रजा के लिये सुख नहीं हौता है, वैसे ही विद्या और पुरुषार्थ के विना सुख नहीं होता है ॥२॥

    पदार्थान्वयः(म.द.स.)

    (यथा) जिस प्रकार से (तोकाय) अभी-भी उत्पन्न हुए पुत्र के लिये (अदितिः) माता, (यथा) जिस प्रकार से (पश्वे) पशुओं के समूह के लिये पशुपालक, (यथा) जिस प्रकार से (नृभ्यः) मनुष्यों के लिये राजा,(यथा) जिस प्रकार से (गवे) इन्द्रियों के लिये जीव, पृथिवी के लिये किसान (च) और (गोपालः) गायों का पालक (सुखम्) सुख के लिये (करत्) प्रयास करता है, (तथा) वैसे ही (नः) हमारे लिये (रुद्रियम्) दुष्टों को रुलानेवाले रुद्र अर्थात् परमेश्वर की सेवा के यह कर्म (स्यात्) होवें ॥२॥

    संस्कृत भाग

    पदार्थः(महर्षिकृत) -(यथा) येन प्रकारेण (नः) अस्मभ्यम् (अदितिः) माता। अत्रादितिर्द्यौः इत्यादिना माता गृह्यते। (करत्) कुर्य्यात्। अत्राऽयं# भ्वादिः*। (पश्वे) पशुसमूहाय पशुपालः। अत्र जसादिषु छन्दसि वा वचनम्। अ० ७।६।१०९। इति वार्त्तिकेनायं सिद्धः। (नृभ्यः) यथा मनुष्येभ्यो नृपतिः (यथा) (गवे) इन्द्रियाय जीवः पृथिव्यै कृषीवलः (यथा) (तोकाय) सद्योजातायापत्याय बालकाय (रुद्रियम्) रुद्रस्येदं कर्म। अत्र पृषोदराद्याकृतिगणान्तर्गतत्वात् इदमर्थे घः ॥२॥ #[टि० १ कृधातुः। सं०] *[महर्षिणाऽत्र भ्यादि गणेऽपि कृधातुः स्वीकृतः, परं वर्त्तमान मुद्रितेषु धातुपाठेषु कृधातु र्भ्यादिगणे नोपलभ्यते, एवं ज्ञायते यत्पुरा काले भ्वादिगणेऽपि कृधातुरासीद् यस्य ‘करति, करतः, करन्ति,’ भ्वादि रूपाण्यपि प्रचलितान्यासन् यथास्यैव सूक्त्तस्य षष्ठेमन्त्रे ‘करति’ इति प्रयोगो वर्तते। परमाधुनिकै वैय्याकरणम्मन्यैस्तनादि गणे कृधातुं दृष्ट्वा भ्वादिपाठादसौ बहिष्कृतः। सं०।] विषयः – पुनः स किं करोतीत्युपदिश्यते। अन्वयः - यथा तोकायादितिर्माता यथा पश्वे पशुपालो यथा नृभ्यो नरेशो यथा गवे गोपालश्च सुखं करत् कुर्यात् तथा नोऽस्मभ्यं रुद्रियं कर्म स्यात् ॥२॥ भावार्थः(महर्षिकृतः)-अत्रोपमालंकारः। यथा मातापितृभ्यां सन्तानाय पशुभ्यो गोपालेन राजसभया च विना प्रजाभ्यः सुखं न जायते तथैव विद्यापुरुषार्थाभ्यां विना सुखं न भवति ॥२॥

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    या मंत्रात उपमालंकार आहे. जसे माता-पिता पुत्रासाठी, गोपाल पशूंसाठी व राजसभा प्रजेसाठी सुखकारक असतात. तसेच परमेश्वर व वायूही सुखकारक असतात, हे जाणावे. ॥ २ ॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    Just as Aditi, mother, does good to the child, the shepherd to his animals, the ruler to his people, the master to the cows, so, we pray, may Rudra, lord of life and energy, grant us kindness and grace.

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    Subject of the mantra

    Then what does he do, this topic has been preached in this mantra.

    Etymology and English translation based on Anvaya (logical connection of words) of Maharshi Dayanad Saraswati (M.D.S)-

    (yathā)=Like, (tokāya)=for the still born son, (aditiḥ)=mother, (yathā)=like, (paśve)=for a group of friends, (yathā)=like, (nṛbhyaḥ)=king for humans, (yathā)=like, (gave)= the senses for creature, the earth for farmer, (ca)=and, (gopālaḥ)= cowherd, (sukham)=for happiness, (karat) makes an effort, (tathā)=in the same way, (naḥ)=for us, (rudriyam)= These acts of service to Rudra i.e. the Supreme Lord (syāt)=be.

    English Translation (K.K.V.)

    As a mother for the still born son, as a herdsman for herds of animals, as a king for men, as the senses for the creature, the earth for farmer and a cowherd for pleasure. tries, in the same way, these acts of service to Rudra i.e. God, who make the wicked cry, should be done by us.

    TranslaTranslation of gist of the mantra by Maharshi Dayanandtion of gist of the mantra by Maharshi Dayanand

    As a mother for the still born son, as a herdsman for herds of animals, as a king for men, as the senses for the creature, the earth for farmer and a cowherd for pleasure. tries, in the same way, these acts of service to Rudra i.e. God, who make the wicked cry, should be done by us.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    What does Rudra do is taught further in the second Mantra.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    As a mother causes happiness to her child, as a shepherded to his herd of animals, as a king to his subjects, as a cowherd to his cows, in the same way, may Immortal God grant happiness and peace to our children, to the cattle, the men and the cows.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    ( अदितिः ) माता अत्र अदितिद्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता । (ऋ० १.८९.१०) इत्यादिना माता गृह्यते = Mother. (गवे) इन्द्रियाय जीव:, पृथिव्यै कृषीबलः = A soul for the senses and a farmer for the earth. (तोकाय) सद्योजाताय अपत्याय बालकाय = Newborn child. तोकम् इत्यपत्यनाम ( निघ० २.२ ) ( रुद्रियम् ) रुद्रस्य कर्म = God's act of giving happiness.

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    There is Upamalankara or simile used in the Mantra. As there is no happiness to children without parents, no happiness to the cattle without a cowherd, and the people without the king's assembly, in the same manner, none can enjoy happiness without knowledge and exertion.

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