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ऋग्वेद मण्डल - 1 के सूक्त 43 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 43/ मन्त्र 6
    ऋषिः - कण्वो घौरः देवता - रुद्रः छन्दः - पादनिचृद्गायत्री स्वरः - षड्जः

    शं नः॑ कर॒त्यर्व॑ते सु॒गं मे॒षाय॑ मे॒ष्ये॑ । नृभ्यो॒ नारि॑भ्यो॒ गवे॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    शन् । नः॒ । क॒र॒ति॒ । अर्व॑ते । सु॒ऽगम् । मे॒षाय॑ । मे॒ष्ये॑ । नृऽभ्यः॑ । नारि॑ऽभ्यः । गवे॑ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    शं नः करत्यर्वते सुगं मेषाय मेष्ये । नृभ्यो नारिभ्यो गवे ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    शन् । नः । करति । अर्वते । सुगम् । मेषाय । मेष्ये । नृभ्यः । नारिभ्यः । गवे॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 43; मन्त्र » 6
    अष्टक » 1; अध्याय » 3; वर्ग » 27; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    (शम्) सुखम् (नः) अस्माकम् (करति) कुर्यात्। लेट् प्रयोगोऽयम्। (अर्वते) अश्वजातये। अर्वेत्यश्वना०। निघं० १।१४। (सुगम्) सुखं गम्यं यस्मिन्। अत्र बहुल#म् इति करणे डः। (मेषाय) मेषजातये (मेष्ये) तत्स्त्रियै। अत्र वाच्छंदसि सर्वे विधयो भवंति इत्यडाग*मो न भवति (नृभ्यः) मनुष्येभ्यः (नारिभ्यः) तत्स्त्रीभ्यः (गवे) गोजातये ॥६॥ #[ कृतो बहुलमित्यर्थः। सं०] *[‘आण्नद्याः’। अ० ७।३।११२, इत्यनेन सूत्रेण। सं०]

    अन्वयः

    स तस्मै किं करोतीत्युपदिश्यते।

    पदार्थः

    यो रुद्रो नोऽस्माकमर्वते मेषाय मेष्ये नृभ्यो नारिभ्यो गवे सुगं शं सततं करति स एव सभाधीशः स्थापनीयः ॥६॥

    भावार्थः

    मनुष्यैः स्वस्य स्वकीयपरकीयानां मनुष्याणां पश्वादीनां च सुखाय परमेश्वरस्य प्रार्थना विदुषां सहायः प्राणानां यथावदुपयोगः पुरुषार्थश्च कर्त्तव्य इति ॥६॥

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    हिन्दी (4)

    विषय

    वह उसके लिये क्या करता है, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

    पदार्थ

    जो रुद्रस्वामी (नः) हम लोगों की (अर्वते) अश्वजाती (मेषाय) मेषजाति (मेष्ये) भेड़ बकरी (नृभ्यः) मनुष्य जाति (नारिभ्यः) स्त्री जाती और (गवे) गो जाति के लिये (सुगम्) सुगम् (शम्) सुख को (करति) निरन्तर करै वही न्यायाधीश करना चाहिये ॥६॥

    भावार्थ

    मनुष्यों को अपने वा पराए पशु, मनुष्यों के लिये परमेश्वर की प्रार्थना, विद्वानों की सहायता, प्राणवायुओं से यथावत् उपयोग और अपना पुरुषार्थ करना चाहिये ॥६॥

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    विषय

    अश्व - मेष - नर और गौ

    पदार्थ

    १. गतमन्त्र में कीर्तित 'सूर्य व हिरण्य की भाँति देदीप्यमान, देव श्रेष्ठ, वसु' प्रभु (नः) - हमारे (अर्वते) - घोड़ों के लिए (शं करति) - शान्ति करते हैं, प्रभुकुपा से हमारे राष्ट्र में घोड़े शक्तिशाली होते हैं । राष्ट्र में इधर - उधर वस्तुओं के परिवहन - कार्य में वे उत्तमता से उपयुक्त होते हैं । 
    २. वे प्रभु हमारे (मेषाय) - मेड़ों के लिए (मेष्ये) - भेड़ों के लिए (सुगम्) - सुष्ठु गम्य - सुगमता से प्राप्त होनेवाली (शम्) - शान्ति को (करति) - करते हैं । मेढ़े व भेड़ें नीरोग होकर हमारे लिए उत्तम ऊन प्राप्त करानेवाले होते हैं । 
    ३. वे प्रभु (नृभ्यः नारिभ्यः) - राष्ट्र के सब नर - नारियों के लिए (सुगं शम्) - सुष्ठु गम्य शान्ति को देनेवाले होते हैं । राष्ट्र में सब नर - नारी शान्तभाव से, परस्पर प्रेमपूर्वक चलते हुए आगे बढ़ते हैं ।
    ४. वे प्रभु (गवे) - हमारी गौओं के लिए भी शान्ति करते हैं । ये अयक्ष्मा, रोगरहित गौएँ हमें सात्विक दुग्ध का पान कराती हुई सात्विक वृत्तिवाला बनाती हैं । 
     

    भावार्थ

    भावार्थ - राष्ट्र में घोड़े, भेड़ें, नर - नारी व गौएँ सभी सुख व शान्ति को प्राप्त करें, नीरोग हों । 
     

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    विषय

    रुद्र, वैद्य, परमेश्वर ।

    भावार्थ

    वह परमेश्वर और समस्त ज्ञानों का उपदेशक वैद्य तथा राजा (नः) हमारे (अर्वते) अश्व, (मेषाय) भेड़ा, (मेष्ये ) भेड़ी, (नृभ्यः) पुरुषों, (नारिभ्यः) स्त्रियों और (गवे) गौ, बैलों के लिए भी (सुगं) सुख और (शं) शान्ति (करति) उत्पन्न करे।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    १-९ कण्वो घौर ऋषिः ॥ देवता १, २, ४—६ रुद्रः । ३ मित्रावरुणौ । ७-९ सोमः ॥ छन्दः—१, ७, ८ गायत्री । ५ विराङ्गायत्री । ६ पादनिचृद्गायत्री । ९ अनुष्टुप् ॥

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    विषय

    वह (परमेश्वर)उसके लिये क्या करता है, इस विषय का उपदेश इस मंत्र में किया है।

    सन्धिविच्छेदसहितोऽन्वयः

    यः रुद्रः नःअस्माकम् अर्वते मेषाय मेष्ये नृभ्यः नारिभ्यः गवे सुगं शं सततं करति स एव सभाधीशः स्थापनीयः ॥६॥

    पदार्थ

    (यः)=जो, (रुद्रः)=परमेश्वर, (नः) अस्माकम्= हम को , (अर्वते) अश्वजातये=अश्वों और, (मेषाय) मेषजातये=भेड़ों की नस्ल के लिये, (मेष्ये) तत्स्त्रियै=उनकी मादाओं के लिये, (नृभ्यः) मनुष्येभ्यः=मनुष्यों और, (नारिभ्यः) तत्स्त्रीभ्यः= उनकी मादाओं के लिये, (गवे) गोजातये=गायों की नस्ल के लिये, (सुगम्) सुखं गम्यं यस्मिन्=जिसमें प्राप्त करने में सुख है, उस (शम्) सुखम्=सुख की [अनुभूति], (सततम्)=निरन्तर, (करति) कुर्यात्=कीजिये, (सः)=वह, (एव)=ही, (सभाधीशः)= सभा का स्वामी (स्थापनीयः)= स्थापित किये जाने योग्य है ॥६॥

    महर्षिकृत भावार्थ का भाषानुवाद

    मनुष्यों के द्वारा अपने और पराए पशु आदि के सुख के लिये, परमेश्वर की प्रार्थना, विद्वानों की सहायता, प्राणवायुओं का यथावत् उपयोग और पुरुषार्थ करना चाहिये ॥६॥

    पदार्थान्वयः(म.द.स.)

    (यः) जो (रुद्रः) परमेश्वर (नः) हम को (अर्वते) अश्व और (मेषाय) भेड़ की नस्ल के लिये, (मेष्ये) उनकी मादाओं के लिये, (नृभ्यः) मनुष्यों और (नारिभ्यः) उनकी मादाओं के लिये, (गवे) गाय की नस्ल के लिये (सुगम्) जिसमें प्राप्त करने में सुख है, उस (शम्) सुख की [अनुभूति] (सततम्) निरन्तर (करति) करता है। (सः) वह [परमेश्वर] (एव) ही (सभाधीशः) सभा का स्वामी (स्थापनीयः) स्थापित किये जाने योग्य है ॥६॥

    संस्कृत भाग

    पदार्थः(महर्षिकृत)- (शम्) सुखम् (नः) अस्माकम् (करति) कुर्यात्। लेट् प्रयोगोऽयम्। (अर्वते) अश्वजातये। अर्वेत्यश्वना०। निघं० १।१४। (सुगम्) सुखं गम्यं यस्मिन्। अत्र बहुल#म् इति करणे डः। (मेषाय) मेषजातये (मेष्ये) तत्स्त्रियै। अत्र वाच्छंदसि सर्वे विधयो भवंति इत्यडाग*मो न भवति (नृभ्यः) मनुष्येभ्यः (नारिभ्यः) तत्स्त्रीभ्यः (गवे) गोजातये ॥६॥ #[ कृतो बहुलमित्यर्थः। सं०] *[‘आण्नद्याः’। अ० ७।३।११२, इत्यनेन सूत्रेण। सं०] विषयः- स तस्मै किं करोतीत्युपदिश्यते। अन्वयः-यो रुद्रो नोऽस्माकमर्वते मेषाय मेष्ये नृभ्यो नारिभ्यो गवे सुगं शं सततं करति स एव सभाधीशः स्थापनीयः ॥६॥ भावार्थः(महर्षिकृतः)- मनुष्यैः स्वस्य स्वकीयपरकीयानां मनुष्याणां पश्वादीनां च सुखाय परमेश्वरस्य प्रार्थना विदुषां सहायः प्राणानां यथावदुपयोगः पुरुषार्थश्च कर्त्तव्य इति ॥६॥

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    माणसांनी आपल्या व इतरांच्या पशू आणि माणसांसाठी परमेश्वराची प्रार्थना करावी. विद्वानांचे साह्य घ्यावे. प्राणवायूचा यथायोग्य उपयोग करावा व स्वतः पुरुषार्थ करावा. ॥ ६ ॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    Rudra, lord of the world, ruler, healer and teacher may, we pray, bring good health, peace and well being to our horses, sheep and goats, men and women, cows and our mind and sense and to the earth and the environment.

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    Subject of the mantra

    What does He(God) do for him (human), this topic has been preached in this mantra.

    Etymology and English translation based on Anvaya (logical connection of words) of Maharshi Dayanad Saraswati (M.D.S)-

    (yaḥ)=That, (rudraḥ)=God, (naḥ)=to us, (arvate) =horse and, (meṣāya)=for the sheep breed, (meṣye)=for their females, (nṛbhyaḥ)=humans and, (nāribhyaḥ)=for their females, (gave)=for the cow breed, (sugam)=in which there is pleasure in receiving, that, (śam) =of pleasure, [anubhūti]=realization, (satatam)=continuous, (karati)=does, (saḥ)=That. [parameśvara]=God, (eva)=only, (sabhādhīśaḥ)= master of the gathering, (sthāpanīyaḥ)=is to be instituted.

    English Translation (K.K.V.)

    The God who constantly makes us feel happiness for the breed of horses and sheep, for their females, for humans and their females, for the breed of cow which is a pleasure to obtain. That Supreme Lord alone is worthy of being instituted as the master of the gathering.

    TranslaTranslation of gist of the mantra by Maharshi Dayanandtion of gist of the mantra by Maharshi Dayanand

    For the happiness of own and other animals etc., human beings should pray to God, take help from scholars, make proper use of vital air and make efforts.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    What does he ( Rudra ) do for him is taught in the sixth Mantra.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    He who bestows easily obtained happiness upon or brings health to our horses, welfare to ram and ewe, to men, to women and to the cattle should be made the President of the Assembly.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    N/A

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    Men should pray to God for the happiness and health of their own and other men and animals. They should also take the help of learned persons and should make proper use of the Pranas and exertion.

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