ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 92/ मन्त्र 12
प॒शून्न चि॒त्रा सु॒भगा॑ प्रथा॒ना सिन्धु॒र्न क्षोद॑ उर्वि॒या व्य॑श्वैत्। अमि॑नती॒ दैव्या॑नि व्र॒तानि॒ सूर्य॑स्य चेति र॒श्मिभि॑र्दृशा॒ना ॥
स्वर सहित पद पाठप॒शून् । न । चि॒त्रा । सु॒ऽभगा॑ । प्र॒था॒ना । सिन्धुः॑ । न । क्षोदः॑ । उ॒र्वि॒या । वि । अ॒श्वै॒त् । अमि॑नती । दैव्या॑नि । व्र॒तानि॑ । सूर्य॑स्य । चे॒ति॒ । र॒श्मिऽभिः॑ । दृ॒शा॒ना ॥
स्वर रहित मन्त्र
पशून्न चित्रा सुभगा प्रथाना सिन्धुर्न क्षोद उर्विया व्यश्वैत्। अमिनती दैव्यानि व्रतानि सूर्यस्य चेति रश्मिभिर्दृशाना ॥
स्वर रहित पद पाठपशून्। न। चित्रा। सुऽभगा। प्रथाना। सिन्धुः। न। क्षोदः। उर्विया। वि। अश्वैत्। अमिनती। दैव्यानि। व्रतानि। सूर्यस्य। चेति। रश्मिऽभिः। दृशाना ॥ १.९२.१२
ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 92; मन्त्र » 12
अष्टक » 1; अध्याय » 6; वर्ग » 26; मन्त्र » 2
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अष्टक » 1; अध्याय » 6; वर्ग » 26; मन्त्र » 2
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनः सा कीदृशीत्युपदिश्यते ।
अन्वयः
मनुष्यैर्या पशून्नेव यथा पशून्प्राप्य वणिग्जनः सुभगा प्रथाना सिन्धुः क्षोदो नेव वा चित्रोषा उर्विया पृथिव्या सह सूर्यस्य रश्मिभिर्दृशानाऽमिनती रक्षां कुर्वती सती दैव्यानि व्रतानि व्यश्वैच्चेति संज्ञायते तद्विद्यानुसारवर्त्तमानेन सततं सुखयितव्यम् ॥ १२ ॥
पदार्थः
(पशून्) गवादीन् (न) इव (चित्रा) विचित्रस्वरूपोषाः। चित्रेत्युषर्नामसु पठितम्। निघं० १। ८। (सुभगा) सौभाग्यकारिणी (प्रथाना) प्रथते तरङ्गैः शब्दायमाना। उषःपक्षे पक्षिशब्दैः शब्दायमाना (सिन्धुः) विस्तीर्णा नदी (न) इव (क्षोदः) अगाधजलम् (उर्विया)। अत्र टास्थाने डियाजादेशः। (वि) (अश्वैत्) व्याप्नोति (अमिनती) अहिंसन्ती (दैव्यानि) देवेषु विद्वत्सु जातानि (व्रतानि) सत्यपालनादीनि कर्माणि (सूर्यस्य) मार्तण्डस्य (चेति) संज्ञायते। अत्र चितीधातोर्लुङ्यडभावश्चिण् च। (रश्मिभिः) किरणैः (दृशाना) दृश्यमाना। अत्र कर्मणि लटः शानच् बहुलं छन्दसीति विकरणस्य लुक् च ॥ १२ ॥
भावार्थः
अत्रोपमालङ्कारः। यथा पशूनां प्राप्त्या विना वणिग्जनो, जलस्य प्राप्त्या विना नद्यादिः सौभाग्यकारको न भवति तथोषर्विद्यया पुरुषार्थेन च विना मनुष्याः प्रशस्तैश्वर्य्या न भवन्तीति वेद्यम् ॥ १२ ॥
हिन्दी (3)
विषय
फिर वह कैसी है, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।
पदार्थ
मनुष्यों को चाहिये कि (न) जैसे (पशून्) गाय आदि पशुओं को पाकर वैश्य बढ़ता और (न) जैसे (सुभगा) सुन्दर ऐश्वर्य्य करनेहारी (प्रथाना) तरङ्गों से शब्द करती हुई (सिन्धुः) अति वेगवती नदी (क्षोदः) जल को पाकर बढ़ती है, वैसे सुन्दर ऐश्वर्य्य करानेहारी प्रातःसमय चूँ-चाँ करनेहारे पखेरुओं के शब्दों से शब्दवाली और कोसों फैलती हुई (चित्रा) चित्र-विचित्र प्रातःसमय की वेला (उर्विया) पृथिवी के साथ (सूर्यस्य) मार्त्तण्डमण्डल की (रश्मिभिः) किरणों से (दृशाना) जो देखी जाती है, वह (अमिनती) सब प्रकार से रक्षा करती हुई (दैव्यानि) विद्वानों में प्रसिद्ध (व्रतानि) सत्यपालन आदि कामों को (व्यश्वैत्) व्याप्त हो अर्थात् जिसमें विद्वान् जन नियमों को पालते हैं, वैसे प्रितिदिन अपने नियमों को पालती हुई (चेति) जानी जाती है, उस प्रातःसमय की वेला की विद्या के अनुसार वर्त्ताव रखकर निरन्तर सुखी हों ॥ १२ ॥
भावार्थ
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे पशुओं की प्राप्ति के विना वैश्यलोग वा जल की प्राप्ति के विना नदी-नद आदि अति उत्तम सुख करनेवाले नहीं होते, वैसे प्रातःसमय की वेला के गुण जतानेवाली विद्या और पुरुषार्थ के विना मनुष्य प्रशंसित ऐश्वर्य्यवाले नहीं होते, ऐसा जानना चाहिये ॥ १२ ॥
विषय
दैव्य व्रत [उपासना व स्वाध्याय]
पदार्थ
१. (पशून् न) = जैसे एक ग्वाला चरागाह में पशुओं को फैला देता है और (न) = जिस प्रकार (सिन्धुः) = स्यन्दनशील (क्षोदः) = उदक [पानी] निम्न प्रदेश में फैल जाता है, इसी प्रकार (चित्रा) = यह पूजनीय [चायनीय] ज्ञान देनेवाली, प्रकाश प्राप्त करानेवाली (सुभगा) = सुन्दरता से युक्त सौभाग्यवाली उषा (प्रथाना) = इस द्युलोक में प्रकाश फैलाती हुई (उर्विया व्यश्वैत्) = खूब ही व्याप्त हो जाती है, सारे जगत् में प्रकाश - ही - प्रकाश कर देती है । उषः काल मानो ग्वाले के समान है, यह किरणरूप गौवों को जगद्रूप चरागाह [गोचरभूमि] में फैला देती है । उषा एक स्रोत के समान है, यह किरणरूप जलधाराओं को जगद्रूप निम्न प्रदेश में व्याप्त कर देती है । २. यह उषा (दैव्यानि व्रतानि) = देव - सम्बन्धी व्रतों को (अमिनती) = हिंसित करनेवाली नहीं होती । इस उषा में सज्जन लोग प्रभुभक्ति के लिए किए जानेवाले उपासना व स्वाध्याय आदि कर्मों में लगे रहते हैं । उनके ये दैव्य व्रत कभी विच्छिन्न नहीं होते । ३. यह उषा (सूर्यस्य) = सूर्य की (रश्मिभिः) = किरणों से (दृशाना) = जगत् के पदार्थों को दिखाती हुई (चेति) = जानी जाती है । वस्तुतः उषा का प्रकाश सूर्य की प्रारम्भिक किरणों का ही प्रकाश है । इसी प्रकाश को उषा का अरुण प्रकाश कहते हैं ।
भावार्थ
भावार्थ = उषा का प्रकाश जगत् में फैलता है, उसके साथ ही देववृत्ति के लोग उपासना व स्वाध्याय आदि में प्रवृत्त होते हैं ।
विषय
उत्तम गृहपत्नी का स्वरूप ।
भावार्थ
जिस प्रकार (चित्रा) संग्रहशील वैश्य प्रजा ( पशून् ) पशुओं को प्राप्त होकर वृद्धि को प्राप्त होती है और जिस प्रकार (सिन्धुः क्षोदः न ) समुद्र या वेगवती नदी जल को प्राप्त होकर बढ़ती, या फैलती है उसी प्रकार (उर्विया) अति अधिक तेज को प्राप्त होकर ( सुभगा ) उत्तम ऐश्वर्यवती ( चित्रा ) सूर्य की प्रातः-प्रभा ( प्रथाना ) वृद्धि को प्राप्त होती हुई (अश्वैत्) सर्वत्र फैलती है। इसी प्रकार ( चित्रा ) सञ्चयशील एवं गुणों से आदर करने योग्य ( सुभगा ) उत्तम सौभाग्यवती स्त्री ( उर्विया ) बड़े डील तथा अधिक ज्ञान और तेज से ( प्रथाना ) बढ़ती हुई अपने ऐश्वर्य यश को बढ़ाती हुई ( अश्वैत् ) सर्वत्र प्रसिद्ध हो जाती है। जिस प्रकार प्रातःप्रभा ( दैव्यानि व्रतानि अमिनती ) देव, परमेश्वर सम्बन्धी उपासना आदि नियमों को न विनाश होने देती हुई, भक्त, व्रतपालक जनों से पालन कराती हुई ( सूर्यस्य रश्मिभिः ) सूर्य की किरणों सहित ( दृशाना ) देखी जाती और उनसे ही ( चेति ) जानी जाती है, एवं सूर्य-किरणों से ही अन्यों को जगत् के पदार्थ दिखाती और उनका ज्ञान कराती है, उसी प्रकार उत्तम महिला भी ( दैव्यानि ) देव, परमेश्वरसम्बन्धी, संध्या उपासना, अग्निहोत्रादि और देव, अर्थात् विद्वानों सम्बन्धी बलि-वैश्वदेव और आतिथ्य सत्कार तथा दैव अर्थात् अग्नि, जल, पृथिवी आदि पञ्चभूत तथा शरीरस्थ इन्द्रियों के हितकारी परोपकारक जगत् के हित तथा शरीर के हित के स्नानादि ( व्रतानि ) नित्य कृत्यों को (अमिनती) कभी न विनाश करती हुई उनको करने से कभी न चूकती हुई (दैव्यानि व्रतानि) देव अर्थात् अपने प्रिय इच्छुक पति के कार्यों की हानि न करती हुई ( सूर्यस्य ) सूर्य के समान तेजस्वी विद्वान् पुरुष के ( रश्मिभिः ) ज्ञान प्रकाशों से ( दृशाना ) तत्वों का दर्शन करती हुई और औरों को दिखाती हुई ( चेति ) ज्ञान प्राप्त करे और करावे । अथवा—वह स्त्री (चित्रा पशून् प्रथाना उर्विया व्यश्वैत् ) महानदी जिस प्रकार जल राशि का विस्तार करके बड़ी हो जाती है उसी प्रकार सञ्चयशील होकर पशुओं को बढ़ाती हुई बहुत अधिक विविध प्रकार से समृद्ध हो ।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
गोतमो राहूगणपुत्र ऋषिः ॥ उषा देवता ॥ छन्दः—१, २ निचृज्जगती । ३ जगती । ४ विराड् जगती । ५, ७, १२ विराड् त्रिष्टुप् । ६, १२ निचृत्त्रिष्टुप् ८, ९ त्रिष्टुप् । ११ भुरिक्पंक्तिः । १३ निचृत्परोष्णिक् । १४, १५ विराट्परोष्णिक् । १६, १७, १८ उष्णिक् ॥
मराठी (1)
भावार्थ
या मंत्रात उपमालंकार आहे. जसे पशूंच्या प्राप्तीशिवाय वैश्य लोक व जलाच्या प्राप्तीशिवाय नद्या नद इत्यादी अतिउत्तम सुख देणारे नसतात, तसे प्रातःकाळच्या वेळेचे गुण दाखविणारी विद्या व पुरुषार्थ याखेरीज माणसे प्रशंसनीय, ऐश्वर्यवान होत नाहीत हे जाणले पाहिजे. ॥ १२ ॥
इंग्लिश (2)
Meaning
Wonderful and glorious, waxing like animals spreading and roaming around out of the stalls, like a river in spate and like swell of the sea, the Dawn radiates and expands over the expanse of the earth. Transgressing no laws of Nature and holy observances of Truth, shining with the rays of the sun, she reveals herself to our eyes.
Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]
How is Usha is taught further in the 12th Mantra.
Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]
The bright Charming and blessed Usha shines forth extending her rays as a cowherd drives the cattle to pasture and spreads extensively, like flowing water. She is beheld associated with the rays of the sun, never transgressing the Divine vows of truth, purity and kindness etc. observed by the enlightenen persons.
Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]
(क्षोद:) प्रगाधजलम् = Deep water. (अमिती) हिंसन्ती = Not transgressing. (दैव्यानि व्रतानि) देवेषु विद्वत्सु जातानि सत्यपालनादीनि कर्माणि = Vows or acts observed by the enlightened persons.
Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]
There is Upamalankara (simile) used in the Mantra. As a trader does not prosper without cattle and other animals and river does not become without deep water, in the same manner, men do not prosper well without the proper knowledge of the Usha (Science of time) and exertion.
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