ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 92/ मन्त्र 7
भास्व॑ती ने॒त्री सू॒नृता॑नां दि॒वः स्त॑वे दुहि॒ता गोत॑मेभिः। प्र॒जाव॑तो नृ॒वतो॒ अश्व॑बुध्या॒नुषो॒ गोअ॑ग्राँ॒ उप॑ मासि॒ वाजा॑न् ॥
स्वर सहित पद पाठभास्व॑ती । ने॒त्री । सू॒नृता॑नाम् । दि॒वः । स्त॒वे॒ । दु॒हि॒ता । गोत॑मेभिः । प्र॒जाऽव॑तः । नृ॒ऽवतः॑ । अश्व॑ऽबुध्यान् । उषः॑ । गोऽअ॑ग्रान् । उप॑ । मा॒सि॒ । वाजा॑न् ॥
स्वर रहित मन्त्र
भास्वती नेत्री सूनृतानां दिवः स्तवे दुहिता गोतमेभिः। प्रजावतो नृवतो अश्वबुध्यानुषो गोअग्राँ उप मासि वाजान् ॥
स्वर रहित पद पाठभास्वती। नेत्री। सूनृतानाम्। दिवः। स्तवे। दुहिता। गोतमेभिः। प्रजाऽवतः। नृऽवतः। अश्वऽबुध्यान्। उषः। गोऽअग्रान्। उप। मासि। वाजान् ॥ १.९२.७
ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 92; मन्त्र » 7
अष्टक » 1; अध्याय » 6; वर्ग » 25; मन्त्र » 2
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अष्टक » 1; अध्याय » 6; वर्ग » 25; मन्त्र » 2
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनः सा कीदृशीत्युपदिश्यते ।
अन्वयः
यथा सूनृतानां भास्वती नेत्री दिवो दुहितोषरुषा गोतमेभिः स्तूयते तथैतामहं स्तवे। हे स्त्रि ! यथेयं प्रजावतो नृवतोऽश्वबुध्यान् गोअग्रान् वाजानुपमासि तथा त्वं भव ॥ ७ ॥
पदार्थः
(भास्वती) दीप्तिमती (नेत्री) या जनान् व्यवहारान्नयति सा (सूनृतानाम्) शोभनकर्मान्नानाम् (दिवः) द्योतमानस्य सवितुः (स्तवे) प्रशंसामि। अत्र शपो लुङ् न। (दुहिता) कन्येव (गोतमेभिः) सर्वविद्यास्तावकैर्विद्वद्भिः (प्रजावतः) प्रशस्ताः प्रजा येषु तान् (नृवतः) बहुनायकसहितान्। छन्दसीर इति वत्वम्। सायणचार्येणेदमशुद्धं व्याख्यातम्। (अश्वबुध्यान्) अश्वान् वेगवतस्तुरङ्गान् वा बोधयन्त्यवगमयन्त्येषु तान्। अथान्तर्गतो ण्यर्थो बाहुलकादौणादिकोऽधिकरणे यक् च। (उषः) उषाः (गोअग्रान्) गौर्भूमिरग्रे प्राप्नुवन्ति यैस्तान्। गौरित्युपलक्षणं तेन भूम्यादिसर्वपदार्थनिमित्तानि संपद्यन्ते। (उप) (मासि) प्रापयसि (वाजान्) संग्रामान् ॥ ७ ॥
भावार्थः
अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारौ। यथा सर्वगुणसम्पन्नया सुलक्षणया कन्यया पितरौ सुखिनौ भवतः तथोषर्विद्यया विद्वांसः सुखिनो भवन्तीति ॥ ७ ॥
हिन्दी (3)
विषय
फिर वह कैसी है, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।
पदार्थ
जैसे (सूनृतानाम्) अच्छे-अच्छे काम वा अन्न आदि पदार्थों को (भास्वती) प्रकाशित (नेत्री) और मनुष्यों को व्यवहारों की प्राप्ति कराती वा (दिवः) प्रकाशमान सूर्य्य की (दुहिता) कन्या के समान (उषः) प्रातःसमय की वेला (गोतमेभिः) समस्त विद्याओं को अच्छे प्रकार कहने-सुननेवाले विद्वानों से स्तुति की जाती है, वैसे इसकी मैं (स्तवे) प्रशंसा करूँ। हे स्त्री ! जैसे यह उषा (प्रजावतः) प्रशंसित प्रजायुक्त (नृवतः) वा सेना आदि कामों के बहुत नायकों से युक्त (अश्वबुध्यान्) जिनसे वेगवान् घोड़ों को बार-बार चैतन्य करें (गोअग्रान्) जिनसे राज्य भूमि आदि पदार्थ मिलें, उन (वाजान्) संग्रामों को (उपमासि) समीप प्राप्त कराती है अर्थात् जैसे प्रातःकाल की वेला से अन्धकार का नाश होकर सब प्रकार के पदार्थ प्रकाशित होते हैं, वैसी तू भी हो ॥ ७ ॥
भावार्थ
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सब गुणों से युक्त सुलक्ष्णा कन्या से पिता, माता, चाचा आदि सुखी होते हैं, वैसे ही प्रातःकाल की वेला के गुण-अपगुण प्रकाशित करनेवाली विद्या से विद्वान् लोग सुखी होते हैं ॥ ७ ॥
विषय
सूनृतानां नेत्री
पदार्थ
१. (भास्वती) = प्रकाशवाली (सूनृतानां नेत्री) = प्रिय, सत्यवाणियों का प्रणयन करनेवाली (दिवः दुहिता) = यह प्रकाश का पूरण करनेवाली उषा (गोतमेभिः) = प्रशस्तेन्द्रिय पुरुषों से (स्तवे) = स्तुत होती है । प्रशस्तेन्द्रिय पुरुषों के लिए यह उषः काल प्रभु के शुभ नामों के उच्चारण के लिए तथा स्वाध्याय द्वारा अपने अन्दर ज्ञान - ज्योति भरने के लिए होता है । सामान्य मनुष्य भी उस समय किसी को कुछ अशुभ बोलते सुनकर कह उठते हैं कि - अरे भाई । सवेरे - सवेरे यह क्या शब्द बोलने लग गये ? २. हे (उषः) = उषो देवते ! तू भी स्तुत होकर उन (वाजान्) = उत्तम अन्नों को (उपमासि) = देती है जो (प्रजावतः) = प्रकृष्ट विकास का कारण बनते हैं, (नृवतः) = उत्तम मनुष्योंवाले होते हैं, (अश्वबुध्यान्) = [अश्वबुध्नान्] उत्तम कर्मेन्द्रियाँ जिनके मूल में हैं और (गो अग्रान् ) = ज्ञानेन्द्रियों जिनके अग्रभाग में हैं, अर्थात् जिन अन्नों से [क] शरीर की शक्तियों का विकास ठीक से होता है अथवा सन्तानों को जन्म मिलता है, [ख] जिनसे मनुष्य प्रगतिशील [नृ] बनते हैं, [ग] जिनसे कर्मेन्द्रियों की शक्तियों का विकास होता है और [घ] जो ज्ञानेन्द्रियों को उच्च ज्ञान - प्राप्ति के योग्य बनाते हैं, उन अन्नों को यह उषा इन स्तोताओं के लिए प्राप्त कराती है । इन अन्नों के सेवन करने पर ही 'भास्वती व नेत्री सूनृतानाम्' ये विशेषण संगत प्रतीत होते हैं ।
भावार्थ
भावार्थ = उषः काल ज्ञान - प्राप्ति व प्रभुस्तवन के शुभ शब्दों के लिए ही विनियुक्त होना चाहिए । ऐसी वृत्ति के लिए सात्त्विक अन्नों का सेवन आवश्यक है ।
विषय
उषा के वर्णन के साथ, उसके दृष्टान्त से उत्तम गृह-पत्नी के कर्तव्यों का वर्णन ।
भावार्थ
जिस प्रकार ‘उषा’, प्रभात की सूर्यप्रभा (दिवः दुहिता) आकाश को और पृथिवी को प्रकाश से पूर्ण करनेवाली, ( भास्वती ) नाना प्रकाशों युक्त होकर ( सूनृतानां नेत्री ) उत्तम विचारक योगी जनों के हृदयों में उत्तम २ सत्य ज्ञानों, स्तुति-वचनों तथा वेद-वाणियों प्राप्त कराती है उसी प्रकार योगी के साधना काल में उत्पन्न हुई ज्योतिष्मती प्रज्ञा भी ( दिवः दुहिता ) ज्ञान प्रकाश का दोहन करने वाली, ( सुनृतानां ) उत्तम सत्य ज्ञानों और वाणियों को ( नेत्री ) प्रकट करने वाली ( भास्वती ) प्रकाशमयी, ज्योतिष्मती होकर ( गोतमेभिः ) विद्वान्, वाणीकुशल पुरुषों द्वारा ( स्तवे ) स्तुति की जाती है। इसी प्रकार कमनीया कन्या भी ( सूनृतानां नेत्री ) उत्तम वचन और वाणियों की बोलने वाली, ( भास्वती ) गुणों से प्रकाशित होती हुई ( नेत्री ) नायिका सर्वश्रेष्ठ महिला रूप ( गोतमेभिः स्तवे ) श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा स्तुति की जाती है, नाना कविजन भी उसका यश गाते हैं । हे ( उषः ) प्रभात वेला के समान कान्ति और कमनीय गुणों से युक्त कन्ये ! तू ( प्रजावतः ) उत्तम प्रजाओं से युक्त, ( नृवतः ) भृत्यादि कर्म कर पुरुषों से युक्त ( अश्वबुध्यान्) अश्वादि विजय के साधन रूप बलवान् पशुओं के दृढ़ आश्रय वाले ( गो-अग्रान् ) गौ आदि पशु और भूमि आदि मुख्य सम्पत्ति से युक्त ( वाजान् ) ऐश्वर्यों को (उपमासि) प्राप्त करा । स्त्री द्वारा घर बसने पर पुत्र भृत्य, अश्व हाथी, गौ भूमि आदि समस्त ऐश्वर्य बढ़ें । और उनका नाश न हो । उषा के पक्ष में—हे उषः ! तू ( गो-अग्रान् वाजान्) किरणों से युक्त प्रकाशों को देती है। सेना आदि शत्रु पीड़क होने से ‘उषा’ है । वह भी राष्ट्र, प्रजा, नायक, चतुरंग सेना गवादि तथा भूमि से युक्त ऐश्वर्यों को प्राप्त करावे ।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
गोतमो राहूगणपुत्र ऋषिः ॥ उषा देवता ॥ छन्दः—१, २ निचृज्जगती । ३ जगती । ४ विराड् जगती । ५, ७, १२ विराड् त्रिष्टुप् । ६, १२ निचृत्त्रिष्टुप् ८, ९ त्रिष्टुप् । ११ भुरिक्पंक्तिः । १३ निचृत्परोष्णिक् । १४, १५ विराट्परोष्णिक् । १६, १७, १८ उष्णिक् ॥
मराठी (1)
भावार्थ
या मंत्रात उपमा व वाचकलुप्तोपमालंकार आहेत. जसे सर्व गुणांचे आकार असणाऱ्या सुलक्षणी कन्येमुळे पिता, माता, काका इत्यादी सुखी होतात तसेच प्रातःकाळच्या वेळेचे गुण अवगुण प्रकाशित करणाऱ्या विद्येमुळे विद्वान लोक सुखी होतात. ॥ ७ ॥
इंग्लिश (2)
Meaning
Brilliant and radiating, inspiring the devotees of truth and piety, the Dawn, daughter of light, is celebrated by divine scholars. So do I sing in honour of her. She brings over the foods, energies, inspirations and noble aspirations and battles of action which lead to awakening of family people and leaders of men to speed of advancement, planning for land and cows, human development and family management.
Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]
How is Ushas is taught further in the seventh Mantra.
Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]
O lady, you should be like the Usha (Dawn) who is like the brilliant daughter of the sun, the exciter of pleasant voices and prompter of good actions and production of food. She is praised learned persons on account of noble attributes. The Usha causes to obtain us food associated with progeny and good leading men and distinguished with horses cattle, land and other good things.
Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]
(गोतमेभिः) सर्वविद्यास्तावकैविद्वद्भिः = By learned persons praising all sciences.
Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]
As parents become happy by having a good and virtuous girl, in the same manner, learned persons become delightened by acquiring the knowledge of the Dawn.
Translator's Notes
गौरितिस्तोतृनाम (निध० ३१.६ ) Therefore Rishi Dayananda has interpreted the word as सर्वविद्यास्तावकैः । It is wrong on the part of Sayanacharya to explain as गोतमेभिः ऋषिभिरस्माभिः। By us Rishis-Gotamas. Is it not strange that a man should use honorofic plural form for himself? Following Sayana, Prof. Wilson and Griffith have committed the same mistake, forgetting the main principle of the Vedic Terminology, put in the Meemansa Shastra as परन्तु श्रुति सामान्यमात्रम् (मीमांसा १-३१ ) i.e. There are no proper nouns in the Vedas, but common nouns.
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