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ऋग्वेद मण्डल - 1 के सूक्त 95 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 95/ मन्त्र 10
    ऋषिः - कुत्सः आङ्गिरसः देवता - सत्यगुणविशिष्टोऽग्निः शुद्धोऽग्निर्वा छन्दः - निचृत्त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    धन्व॒न्त्स्रोत॑: कृणुते गा॒तुमू॒र्मिं शु॒क्रैरू॒र्मिभि॑र॒भि न॑क्षति॒ क्षाम्। विश्वा॒ सना॑नि ज॒ठरे॑षु धत्ते॒ऽन्तर्नवा॑सु चरति प्र॒सूषु॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    धन्व॑न् । स्रोतः॑ । कृ॒णु॒ते॒ । ग॒तुम् । ऊ॒र्मिम् । शु॒क्रैः । ऊ॒र्मिऽभिः॑ । अ॒भि । न॒क्ष॒ति॒ । क्षाम् । विश्वा॑ । सना॑नि । ज॒ठरे॑षु । ध॒त्ते॒ । अ॒न्तः । नवा॑सु । च॒र॒ति॒ । प्र॒ऽसूषु॑ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    धन्वन्त्स्रोत: कृणुते गातुमूर्मिं शुक्रैरूर्मिभिरभि नक्षति क्षाम्। विश्वा सनानि जठरेषु धत्तेऽन्तर्नवासु चरति प्रसूषु ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    धन्वन्। स्रोतः। कृणुते। गातुम्। ऊर्मिम्। शुक्रैः। ऊर्मिऽभिः। अभि। नक्षति। क्षाम्। विश्वा। सनानि। जठरेषु। धत्ते। अन्तः। नवासु। चरति। प्रऽसूषु ॥ १.९५.१०

    ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 95; मन्त्र » 10
    अष्टक » 1; अध्याय » 7; वर्ग » 2; मन्त्र » 5
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ कालोऽग्निर्वा कीदृश इत्युपदिश्यते ।

    अन्वयः

    हे मनुष्या यः कालो विद्युदग्निर्वा धन्वन् स्रोतो गातुमूर्मिं च कृणुते शुक्रैरूर्मिभिः क्षां चाभिनक्षति जठरेषु विश्वा सनानि धत्ते प्रसूषु नवासु वा प्रजास्वन्तश्चरति तं यथावद्विजानीत ॥ १० ॥

    पदार्थः

    (धन्वन्) अन्तरिक्षे धन्वान्तरिक्षं धन्वन्त्यस्मादापः। निरु० ५। ५। ) (स्रोतः) स्रवन्ति वस्तूनि जलानि वा येन तत् (कृणुते) करोति (गातुम्) प्राप्तव्यम् (ऊर्मिम्) उषसं जलवीचिं वा (शुक्रैः) शुद्धैः क्रमैः किरणैर्वा (ऊर्मिभिः) प्रापकैः प्रकाशैस्तरङ्गैर्वा। अर्त्तेरू च। उ० ४। ४४। अत्र ऋधातोर्मिः प्रत्यय ऊकारादेशश्च। (अभि) सर्वतः (नक्षति) व्याप्नोति गच्छति वा (क्षाम्) भूमिम् (विश्वा) सर्वाणि (सनानि) संविभागयुक्तानि वस्तूनि (जठरेषु) अन्तर्वर्त्तिष्वन्नादिपचनाधिकरणेषु वा (धत्ते) (अन्तः) आभ्यन्तरे (नवासु) अर्वाचीनासु प्रजासु वा (चरति) (प्रसूषु) प्रसूयन्ते यास्तासु ॥ १० ॥

    भावार्थः

    आप्तैर्विद्वद्भिर्व्यापनशीलौ कालविद्युदग्नी विज्ञाय तन्निमित्तान्यनेकानि कार्याणि यथावत्साधनीयानि ॥ १० ॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    अब समय वा अग्नि किस प्रकार का है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

    पदार्थ

    हे मनुष्यो ! जो समय वा बिजुलीरूप आग (धन्वन्) अन्तरिक्ष में (स्रोतः) जिससे और-और वस्तु वा जल प्राप्त होते हैं उस (गातुम्) प्राप्त होने योग्य (ऊर्मिम्) प्रातःसमय की वेला वा जल की तरङ्ग को (कृणुते) प्रकट करता है वा (शुक्रैः) शुद्ध क्रम वा किरणों और (ऊर्मिभिः) पदार्थ प्राप्त कराने हारे तरङ्गों से (क्षाम्) भूमि को भी (अभि, नक्षति) सब ओर से व्याप्त और प्राप्त होता है वा जो (जठरेषु) भीतरले व्यवहारों और पेट के भीतर अन्न आदि पचाने के स्थानों में (विश्वा) समस्त (सनानि) न्यारे-न्यारे पदार्थों को (धत्ते) स्थापित करता वा जो (प्रसूषु) पदार्थ उत्पन्न होते हैं उनमें वा (नवासु) नवीन प्रजाजनों में (अन्तः) भीतर (चरति) विचरता है, उसको यथावत् जानो ॥ १० ॥

    भावार्थ

    आप्त विद्वान् मनुष्यों को चाहिये कि व्यापनशील काल और बिजुलीरूप अग्नि को जानकर उनके निमित्त से अनेक कामों को यथावत् सिद्ध करें ॥ १० ॥

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    विषय

    प्रभु - तेजो महिमा

    पदार्थ

    १. गतमन्त्र में वर्णित प्रभु का विरोचमान धाम [चमकता हुआ तेज] (धन्वन्) = मरुस्थल में (स्रोतः कृणुते) = जलप्रवाह उत्पन्न कर देता है और (गातुम्) = मार्ग को (ऊर्मिम्) = उदक संघमय बना देता है । कभी - कभी तो मार्ग एक जलधारा के रूप में परिवर्तित हो जाता है , जिसमें हल्की - हल्की लहरें उठती प्रतीत होती है । (शुक्रैः ऊर्मिभिः) = उन चमकती हुई लहरोंवाली जलधाराओं से जल (क्षाम् अभिनक्षति) = भूलोक की ओर प्राप्त होता है । प्रभु इस पृथिवीलोक को शुद्ध वृष्टि की जलधाराओं से व्याप्त कर देते हैं । 

    २. इस प्रकार वृष्टि से अन्न उत्पन्न होता है और (विश्वा सनानि) = उन सब सेवनीय अन्नों को (जठरेषु धत्ते) = प्रभु ही हमारे जठरों [पाचन संस्थान] में धारण करते हैं । ये प्रभु ही (नवासु प्रसूषु अन्तः) = इन नवीन फैलनेवाली बेलों व वनस्पतियों में चरति विचरण करते हैं । प्रभु के उस (विरोचमान) = तेज से ही इनकी उत्पत्ति होती है और इन सबमें एक ज्ञानीभक्त को उस प्रभु की ही महिमा दृष्टिगोचर होती है । 
     

    भावार्थ

    भावार्थ - प्रभु वृष्टि द्वारा मरुस्थल को जलप्रवाहमय बना देते हैं । वृष्टि से मार्ग नहरों में परिवर्तित हो जाते हैं । पृथिवी जलसिक्त होकर अन्न को जन्म देती है । इन अन्नों में भी प्रभु की ही महिमा दिखती है । 
     

    विशेष / सूचना

    सूचना - यहाँ यह भी संकेत स्पष्ट है कि प्रभु इन वनस्पतियों में भी विचरण करते हैं , अर्थात् इनके प्रयोग से ही प्रभु हमें प्राप्त होंगे , मांसाहारी को प्रभु नहीं मिलते । 
     

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    विषय

    देवसमिति का निर्माण ।

    भावार्थ

    सूर्य जिस प्रकार ( धन्वन् स्रोतः कृणुते ) अन्तरिक्ष में जल के प्रवाह को मेघ रूप से उत्पन्न करता है । अथवा वह (ऊर्मिम्) ऊपर उठने वाले जल-प्रवाह को या दीप्ति को (गातुम्) दूर तक जाने वाला या भूमि को प्राप्त होने वाला करता है और (ऊर्मिभिः शुकैः) ऊपर उठे जलों से ही ( क्षाम् नक्षति ) पृथिवी को व्याप लेता है अर्थात् उन्हें भी भूमि पर बरसा देता है। और ( विश्वा सनानि ) समस्त देने योग्य जलों या अन्नों को ( जठरेषु ) परिपाक योग्य ओषधि बनस्पतियों के बीच में धारण पोषण करता और ( नवासु प्रसूषु ) नयी उत्पन्न होने वाली लताओं में ( अन्तः चरति ) रस परिपाक करने वाले तेज रूप से व्यापता है। उसी प्रकार राजा भी ( धन्वन् ) मरु भूमियों में ( स्रोतः ) जल प्रवाह को नहरों के रूप में ( कृणुते ) बनवावे । वह ( गातुम् ) मार्ग और भूमि को ( ऊर्मिम् ) जल तरङ्ग के समान उत्तम बनवावे । ( ऊर्मिभिः शुक्रैः ) जलतरंगों या ऊर्ध्व देश में स्थित जलों से ( क्षाम् नक्षति ) भूमि को सिचवावे । ( जठरेषु ) प्राणियों के पेटों में ( विश्वा सनानि ) सब प्रकार के अन्न प्रदान करे, अथवा ( जठरेषु ) भीतरी कोषों में ( विश्वा सनानि ) सब दान देने योग्य ऐश्वर्यो को धारण करे । ( नवासु ) नयी ( प्रसूषु ) उत्तम भूमियों में, भूवासिनी प्रजाओं में ( अन्तः चरति ) उनके भीतर विचरे ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    कुत्स आंङ्गिरस ऋषिः॥ औषसगुणविशिष्टः सत्यगुणविशिष्टः, शुद्धोऽग्निर्वा देवता ॥ छन्द:-१, ३ विराट् त्रिष्टुप् । २, ७, ८, ११ त्रिष्टुप् । ४, ५, ६, १० निचृत् त्रिष्टुप् । ६ भुरिक् पंक्तिः ॥ एकादशर्चं सूकम् ॥

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    आप्त विद्वान माणसांनी व्यापनशील काल व विद्युतरूपी अग्नीला जाणून त्यांच्या निमित्ताने अनेक कामांना योग्य प्रकारे सिद्ध करावे. ॥ १० ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    Agni as electric power and vital heat of life creates paths over the deserts and in the skies, makes waterways to flow with rippling waves, and with bright rays of light illuminates the earth. It creates all the foods and vitalities for the internal organs of the living body systems and vibrates in all the new and upcoming forms of nature and human generations.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    How is Kala (Time) or Agni is taught further in the tenth Mantra.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    O men. Time or lightning causes the waters to flow in a torrent through the firmament and with those pure waves inundates or floods the earth. He (fire) puts in its stomach all articles of food and moves about within the young sprouting grass and herbs.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    (धन्वन्) अन्तरिक्षे = In the firmament. (गातुम्) प्राप्तव्यम् = Worth attaining. (ऊर्मिम्) उषसं जलवींचि वा = Dawn or wave. (सनानि) संविभागयुक्तानि वस्तूनि = Articles of food which are divided in various ways. धन्व इत्यन्तरिक्षनाम (निघ० १.३ ) षरण-संभक्तौ इतिधातो: वस्तूनि

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    Great scholars, true in mind, word and deed should comprehend the nature of Kala (Time) and vidyut (lightaing or electricity) and should accomplish all works connected with them.

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