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ऋग्वेद मण्डल - 1 के सूक्त 95 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 95/ मन्त्र 4
    ऋषिः - कुत्सः आङ्गिरसः देवता - सत्यगुणविशिष्टोऽग्निः शुद्धोऽग्निर्वा छन्दः - निचृत्त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    क इ॒मं वो॑ नि॒ण्यमा चि॑केत व॒त्सो मा॒तॄर्ज॑नयत स्व॒धाभि॑:। ब॒ह्वी॒नां गर्भो॑ अ॒पसा॑मु॒पस्था॑न्म॒हान्क॒विर्निश्च॑रति स्व॒धावा॑न् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    कः । इ॒मम् । वः॒ । नि॒ण्यम् । आ । चि॒के॒त॒ । व॒त्सः । मा॒तॄः । ज॒न॒य॒त॒ । स्व॒ऽधाभिः॑ । ब॒ह्वी॒नाम् । गर्भः॑ । अ॒पसा॑म् । उ॒पऽस्था॑त् । म॒हान् । क॒विः । निः । च॒र॒ति॒ । स्व॒धाऽवा॑न् ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    क इमं वो निण्यमा चिकेत वत्सो मातॄर्जनयत स्वधाभि:। बह्वीनां गर्भो अपसामुपस्थान्महान्कविर्निश्चरति स्वधावान् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    कः। इमम्। वः। निण्यम्। आ। चिकेत। वत्सः। मातॄः। जनयत। स्वऽधाभिः। बह्वीनाम्। गर्भः। अपसाम्। उपऽस्थात्। महान्। कविः। निः। चरति। स्वधाऽवान् ॥ १.९५.४

    ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 95; मन्त्र » 4
    अष्टक » 1; अध्याय » 7; वर्ग » 1; मन्त्र » 4
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनः स कालसमूहः कीदृश इत्युपदिश्यते ।

    अन्वयः

    यो बह्वीनामपसामुपस्थात् गर्भः स्वधावान् महान् वत्सः कविः कालो निश्चरति स्वधाभिर्मातॄर्जनयतेमं निण्यं क आचिकेत व एतेषामवयवानां स्वरूपं च ॥ ४ ॥

    पदार्थः

    (कः) मनुष्यः (इमम्) प्रत्यक्षम् (वः) एतेषां कालावयवानाम् (निण्यम्) निश्चितं स्वरूपम् (आ) (चिकेत) विजानीयात् (वत्सः) स्वव्याप्त्या सर्वाच्छादकः (मातॄः) मातृवत्पालिका रात्रीः (जनयत) जनयति। अत्र लङ्यडभावो बुधयुधेति परस्मैपदे प्राप्ते व्यत्ययेनात्मनेपदम्। (स्वधाभिः) द्यावापृथिव्यादिभिः सह (बह्वीनाम्) अनेकासां द्यावापृथिव्यादीनां दिशां वा (गर्भः) आवरकः (अपसाम्) जलानाम् (उपस्थात्) समीपस्थव्यवहारात् (महान्) व्याप्त्यादिमहागुणविशिष्टः (कविः) क्रान्तदर्शनः (निः) नितराम् (चरति) प्राप्तोऽस्ति (स्वधावान्) स्वधाः स्वकीया अवयवाः प्रशस्ता विद्यन्तेऽस्मिन् सः ॥ ४ ॥

    भावार्थः

    मनुष्यैर्यस्य परमसूक्ष्मो बोधोऽस्ति यः सर्वान् कालविभागान् प्रकटयति कर्माणि व्याप्नोति सर्वत्रैकरसः कालोऽस्ति तं कश्चिन्निपुणो विद्वान् ज्ञातुं शक्नोति नहि सर्व इति वेद्यम् ॥ ४ ॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर वह दिन-रात्रि के समय का समूह कैसा है, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।

    पदार्थ

    जो (बह्वीनाम्) अनेकों अन्तरिक्ष और भूमि तथा दिशाओं वा जलों के (उपस्थात्) समीपस्थ व्यवहार से (गर्भः) अच्छा आच्छादन करनेवाला (स्वधावान्) जिसके कि प्रशंसित अपने अङ्ग विद्यमान हैं (महान्) व्याप्ति आदि गुणों से युक्त (वत्सः) किन्तु अपनी व्याप्ति से सर्वोपरि सबको ढांपने वा (कविः) क्रम-क्रम से दृष्टिगत होनेवाला समय (निः) (चरति) निरन्तर अर्थात् एकतार चल रहा है और (स्वधाभिः) सूर्य्य वा भूमि के साथ (मातॄः) माता के तुल्य पालनेहारी रात्रियों को (जनयत) प्रकट करता है (इमम्) इस (निण्यम्) निश्चय से एक से रहनेवाले समय को (कः) कौन मनुष्य (आ, चिकेत) अच्छे प्रकार जान सके (वः) इन समय के अवयवों अर्थात् क्षण, घड़ी, प्रहर, दिन, रात, मास, वर्ष आदि के स्वरूप को भी कौन जान सके ॥ ४ ॥

    भावार्थ

    मनुष्यों को जानना चाहिये कि जिसका सूक्ष्म से सूक्ष्म बोध है, जो समस्त अपने अवयवों को प्रकट करता, सब कामों में व्याप्त होता, जिसमें सब जगत् एक रस रहता है उस समय को कोई विद्वान् जान-सकता है, सब कोई नहीं ॥ ४ ॥

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    विषय

    महान् कवि स्वधावान्

    पदार्थ

    १. अग्नियों के वर्णन के प्रसङ्ग में प्रभुरूप अग्नि का भी वर्णन करते हुए कहते हैं कि (वः) = तुममें से (कः) = कोई एक - आध , विरला व्यक्ति ही (इमम्) = इस (निण्यम्) = हृदय में अन्तर्हित प्रभुरूप अग्नि को (आचिकेत) = जानता है । सामान्यतः इन्द्रियाँ बाह्य विषयों में जानेवाली होने से उस अन्तरात्मा की ओर झुकाववाली नहीं होती । कोई धीर ही आवृत्तचक्षु होकर उस अन्तः स्थित आत्मा को देखता है । 

    २. यही (वत्सः) = प्रभु का प्रिय होता है और (मातॄः) = ज्ञान व कर्म का निर्माण करनेवाली इन इन्द्रियों को (जनयत) = विकसित शक्तिवाला करता है और (स्वधाभिः) = अपनी धारण - शक्तियों से युक्त होता है । 

    ३. प्रभु एक है , जीव अनेक । वह (बृहीनाम्) = अनेक प्रजाओं के (गर्भः) = गर्भरूपेण मध्य में रहनेवाला एक प्रभु (अपसाम्) = कर्मों की (उपस्थान्) = गोद से (निश्चरति) = बाहर प्रकट होता है । सबके अन्दर तो वे प्रभु रह ही रहे हैं । उनका दर्शन स्वकर्मों के द्वारा उनके अर्चन से होता है - “स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धि विन्दति मानवः” । 

    ४. इस प्रभु के प्रकट होने पर वह साधक जीव (महान्) = [मह पूजायाम्] पूजा की वृत्तिवाला होता है , (कविः) = क्रान्तदर्शी बनता है और (स्वधावान्) = आत्मधारणा की शक्तिवाला होता है । हृदय में महान् , मस्तिष्क में कवि और शरीर में स्वधावान् बनता है । 
     

    भावार्थ

    भावार्थ - प्रभु का उपासक ‘महान् , कवि व स्वधावान्’ होता है । 
     

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    विषय

    सूर्य के समान राजा की उत्पत्ति, मातृ गर्भ से प्रजा की उत्पत्ति ।

    भावार्थ

    सूर्य और तत्सदृश राजा की बालक के समान उत्पत्ति का रहस्य कहते हैं । ( इमं ) इस ( निण्यम् ) छुपे रहस्य को ( कः ) कौन ( आचिकेत ) जानता है कि ( वत्सः ) बालक ( स्वधाभिः ) स्वधाओं से प्राणशक्तियों से ( मातृः जनयत ) माताओं को पैदा कराता अर्थात् अपने बलों से ही माताओं का प्रसव करने में प्रेरित करता है, या प्रकट करता है । ( वत्सः ) समस्त प्राणियों को बसाने वाला सूर्य रूप बालक ( स्वधाभिः ) अपने धारण पोषण सामर्थ्यो, कान्तियों से ( मातृः ) माता रूप दशों दिशाओं को प्रकट करता है । मेघ रूप वत्स ( स्वधाभिः ) जलों से ( मातृः ) समस्त ओषधियों की उत्पादक भूमियों से ( जनयत ) अन्न उत्पन्न करवाता है। वृष्टि जलों से भूमियों में ओषधि अन्न वृक्षादि उपजते हैं । इसी प्रकार ( वत्सः ) सब के बसाने वाला राजा ( स्वधाभिः ) अन्नों और वेतनों तथा स्वराष्ट्र को धारण, शासन पोषण की शक्तियों से ही ( मातृः ) विद्वान् ज्ञानी पुरुषों तथा अपने को राजा बनानेवाली प्रजाओं को ( जनयत ) प्रकट करता है या उनको अपने राजा बनाने के लिये प्रेरित करता है । (२) मातृ गर्भ में जिस प्रकार ( गर्भः ) गर्भ रूप बालक ( वह्वीनाम् अपसाम् उपस्थात् ) बहुत से जलों की गोद में से ही प्रकट होता है और सूर्य जिस प्रकार ( बह्वीनां अपसां उपस्थात् गर्भः ) बहुत से जलों अर्थात् समुद्र में से निलकता प्रतीत होता है और आत्मा जैसे (बह्वीनां अपसां गर्भः ) बहुत से नाना प्राणों के भीतर गर्भ के समान घिरा रह कर उनके बीच में से प्रकट होता है उसी प्रकार तेजस्वी राजा ( बह्वीनाम् ) बहुत सी, नाना प्रकार की (अपसाम्) आप्त प्रजाओं के बीच (गर्भः) गर्भ के समान घिरा हुआ, या उनको अपने वश में ग्रहण करने हारा होकर उनके ( उपस्थात् ) बीच में से ही उत्पन्न या प्रकट होता है । वह ( स्वधावान् ) स्वयं अपनी शक्ति से युक्त होकर ( महान् ) गुणों में महान् और ( कविः ) क्रान्तदर्शी होकर ( निश्चरति ) प्रकट होता है। इसी प्रकार अग्नि अपने तेजों से मातृ रूप काष्ठों को उज्ज्वल करता है । वह विद्युत् रूप से जलों के बीच में प्रकट होता है । वह दूर तक दीखने वाले आदित्य रूप से आकाश में विचरता है ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    कुत्स आंङ्गिरस ऋषिः॥ औषसगुणविशिष्टः सत्यगुणविशिष्टः, शुद्धोऽग्निर्वा देवता ॥ छन्द:-१, ३ विराट् त्रिष्टुप् । २, ७, ८, ११ त्रिष्टुप् । ४, ५, ६, १० निचृत् त्रिष्टुप् । ६ भुरिक् पंक्तिः ॥ एकादशर्चं सूकम् ॥

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    माणसांनी हे जाणले पाहिजे, की ज्याचा सूक्ष्माहून सूक्ष्म बोध असतो जो आपल्या संपूर्ण अवयवांना प्रकट करतो, सर्व कामांत व्याप्त असतो, ज्याच्यात सर्व जग एकरस असते, त्या काळाला एखादा विद्वान जाणू शकतो, सर्वजण नाही. ॥ ४ ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    Who among you could know this mysterious nursling of the day and night, the sun born of Agni and Vayu, cosmic energy, who creates its own mothers, the day and the night? It is the creature of many forces of nature and itself the womb of many, being the measure of physical time and creator of the directions of space. Great, visionary, and innately powerful, it moves on and across the regions of water and air in space.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    How is Time is taught in the fourth Mantra.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    Who can understand the definite nature or secret of this Time who possessing many attributes, endowed with his noble parts or powers, covering all with his pervasion, looking over all (so to speak) along with earth, hearth, heaven and other worlds or directions generates mother-like protective nights ?

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    (निण्यम्) निश्चित स्वरूपम् = Definite nature or secret. (वत्सः) स्वव्याप्त्या सर्वाच्छादकः = Covering all with his pervasion. (स्वधाभिः ) द्यावापृथिव्यादिभिः सह = Along with earth, heaven and other worlds. (मातृ:) मातृवत् पालिकाः रात्रीः = Mother-like protective nights.

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    Men should know that it is only an expert scholar who can comprehend the nature of Kala (Time) whose knowledge is very subtle, who manifests all different divisions of the time and pervades all actions being always the same.

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