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ऋग्वेद मण्डल - 1 के सूक्त 95 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 95/ मन्त्र 2
    ऋषिः - कुत्सः आङ्गिरसः देवता - सत्यगुणविशिष्टोऽग्निः शुद्धोऽग्निर्वा छन्दः - त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    दशे॒मं त्वष्टु॑र्जनयन्त॒ गर्भ॒मत॑न्द्रासो युव॒तयो॒ विभृ॑त्रम्। ति॒ग्मानी॑कं॒ स्वय॑शसं॒ जने॑षु वि॒रोच॑मानं॒ परि॑ षीं नयन्ति ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    दश॑ । इ॒मम् । त्वष्टुः॑ । ज॒न॒य॒न्त॒ । गर्भ॑म् । अत॑न्द्रासः । यु॒व॒तयः॑ । विऽभृ॑त्रम् । ति॒ग्मऽअ॑नी॑कम् । स्वऽय॑शसम् । जने॑षु । वि॒ऽरोच॑मानम् । परि॑ । सी॒म् । न॒य॒न्ति॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    दशेमं त्वष्टुर्जनयन्त गर्भमतन्द्रासो युवतयो विभृत्रम्। तिग्मानीकं स्वयशसं जनेषु विरोचमानं परि षीं नयन्ति ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    दश। इमम्। त्वष्टुः। जनयन्त। गर्भम्। अतन्द्रासः। युवतयः। विऽभृत्रम्। तिग्मऽअनीकम्। स्वऽयशसम्। जनेषु। विऽरोचमानम्। परि। सीम्। नयन्ति ॥ १.९५.२

    ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 95; मन्त्र » 2
    अष्टक » 1; अध्याय » 7; वर्ग » 1; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथाहोरात्रव्यवहारो दिशां मिषेणोपदिश्यते ।

    अन्वयः

    हे मनुष्या या अतन्द्रासो युवतय इव दश दिशस्त्वष्टुरिमं गर्भं विभृत्रं तिग्मानीकं विरोचमानं स्वयशसं सीं जनयन्त जनयन्ति परिणयन्ति ता यूयं विजानीत ॥ २ ॥

    पदार्थः

    (दश) दिशः (इमम्) प्रत्यक्षमहोरात्रप्रसिद्धम् (त्वष्टुः) विद्युतो वायोर्वा (जनयन्त) जनयन्ति। अत्राडभावः। (गर्भम्) सर्वव्यवहारादिकारणम् (अतन्द्रासः) नियतरूपत्वादनालस्यादियुक्ताः (युवतयः) मिश्रामिश्रत्वकर्मणा सदाऽजराः (विभृत्रम्) विविधक्रियाधारकम् (तिग्मानीकम्) तिग्मानि निशितानि तीक्ष्णान्यनीकानि सैन्यानि यस्मिँस्तम् (स्वयशसम्) स्वकीयगुणकर्मस्वभावकीर्त्तियुक्तम् (जनेषु) गणितविद्यावित्सु मनुष्येषु (विरोचमानम्) विविधप्रकारेण प्रकाशमानम् (परि) सर्वतोभावे (सीम्) प्राप्तव्यमहोरात्रव्यवहारम् (नयन्ति) प्रापयन्ति। अत्रान्तर्गतो ण्यर्थः ॥ २ ॥

    भावार्थः

    अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। मनुष्यैरनियतदेशकाला विभुस्वरूपा पूर्वादिक्रमजन्याः सर्वव्यवहारसाधिका दश दिशः सन्ति तासु नियता व्यवहाराः साधनीया नात्र खलु केनचिद्विरुद्धो व्यवहारोऽनुष्ठेयः ॥ २ ॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    अब दिन-रात का व्यवहार दिशाओं के मिष से अगले मन्त्र में कहा है ।

    पदार्थ

    हे मनुष्यो ! तुम (अतन्द्रासः) जो एक नियम के साथ रहने से निरालसता आदि गुणों से युक्त (युवतयः) जवान स्त्रियों के समान एक-दूसरे के साथ मिलने वा न मिलने से सब कभी अजर-अमर रहनेवाली (दश) दश दिशा (त्वष्टुः) बिजुली वा पवन के (इमम्) इस प्रत्यक्ष अहोरात्र से प्रसिद्ध (गर्भम्) समस्त व्यवहार का कारणरूप (विभृत्रम्) जो कि अनेकों प्रकार की क्रिया को धारण किये हुए (तिग्मानीकम्) जिसमें अत्यन्त तीक्ष्ण सेनाजन विद्यमान जो (जनेषु) गणितविद्या के जाननेवाले मनुष्यों में (विरोचमानम्) अनेक रीति से प्रकाशमान (स्वयशसम्) अनेक गुण, कर्म्म, स्वभाव और प्रशंसायुक्त (सीम्) प्राप्त होने के योग्य उस दिन-रात के व्यवहार को (जनयन्त) उत्पन्न करती और (परि) सब ओर से (नयन्ति) स्वीकार करती हैं, उनको तुम लोग जानो ॥ २ ॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि जिनके देश-काल का नियम अनुमान में नहीं आता, ऐसी अनन्तरूप पूर्व आदि क्रम से प्रसिद्ध सब व्यवहारों की सिद्धि करानेवाली दश दिशा हैं, उनमें नियमयुक्त व्यवहारों को सिद्ध करें, इनमें किसी को विरुद्ध व्यवहार न करना चाहिये ॥ २ ॥

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    विषय

    अग्नि का प्रजनन

    पदार्थ

    १. गतमन्त्र के पिछले भाग में वर्णित (इमम्) = इस अग्नि को (त्वष्टुः) = उस सूर्यादि सब देवों के निर्माण करनेवाले प्रभु की बनाई हुई (दश) = ये दस अंगुलियाँ (जनयन्त) = प्रकट करती हैं । एक हाथ में एक अरणी को पकड़ते हैं , दूसरे में दूसरी को , फिर इनकी रगड़ से अग्नि पैदा करते हैं । आजकल अरणियों का स्थान डिब्बी व तीली ले - लेती है । इनकी रगड़ से ही आग उत्पन्न होती है , परन्तु वह अग्नि (गर्भम्) = उन पदार्थों में गर्भरूप से पहले ही रह रही होती है । (विभृत्रम्) = यह विभक्त करके सब स्थानों पर स्थापित की गई है , (तिग्मानीकम्) = अत्यन्त (तिग्म) = [तेज] दीप्तिवाली है । (स्वयशसम्) = [स्वआत्मीय] अपने को अपनानेवाले पुरुष को यशस्वी बनाती है । जिस भी पुरुष को जाठराग्नि ठीक होगी वह स्वस्थ व यशस्वी बनेगा ही । यह अग्नि (जनेषु) = मनुष्यों में (विरोचमानम्) = विशिष्ट दीप्ति और शोभावाली होती है । वस्तुतः उदर में जाठराग्नि के रूप में रहती हुई यह शारीरिक स्वास्थ्य को देती है , हृदय में उत्साह व शक्ति को जन्म देनेवाली होती है तथा मस्तिष्क में ज्ञानाग्नि के रूप में रहती हुई यह उसे ज्ञानोज्वल करती है । 

    २. इस अग्नि को (अतन्द्रासः) = किसी भी प्रकार से आलस्य न करती हुईं , अर्थात् सतत कार्य में लगी हुई (युवतयः) = अच्छाइयों से मिश्रण व बुराइयों से अमिश्रण करती हुई - अयज्ञिय पदार्थों को दूर करती हुई तथा यज्ञिय पदार्थों को प्राप्त करती हुई दस अंगुलियाँ (सीम्) = निश्चय से (परिनयन्ति) = चारों ओर प्राप्त कराती हैं । इष्ट स्थान में इन अंगुलियों के द्वारा ही अग्नि का प्रज्वलन होता है । 
     

    भावार्थ

    भावार्थ - प्रभु द्वारा बनाई गई ये अंगुलियों इष्ट स्थानों में अग्नि को प्रकट करनेवाली हों । यह अग्नि हमारे यश व तेज का कारण बने । 
     

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    विषय

    स्त्रियों के पति वरण के दृष्टान्त से प्रधान नायक का वरण ।

    भावार्थ

    जिस प्रकार ( दश युवतयः ) दस जवान स्त्रियें ( जनेषु विरोचमानं ) मनुष्यों में विशेष तेज से तेजस्वी (तिग्मानीकं) तीक्ष्ण तेज से उज्वल मुख वाले, या तीक्ष्ण सैन्य वाले ( स्वयशसं ) अपने बाहुबल से यशस्वी पुरुष को अपने २ पति रूप से ( परि नयन्ति ) परिणय करती हैं और वे दसों जैसे ( अतन्द्रासः ) आलस्य रहित होकर ( त्वष्टुः ) अपने तेजस्वी पति से प्राप्त ( विभृत्रम् ) विविध उपायों से भरण पोषण किये ( गर्भम् ) गर्भ को ( अतन्द्रासः ) अनालस्य होकर ( जनयन्त ) उत्पन्न करती हैं उसी प्रकार (दश) ये दश दिशाएं, उन मे बसी प्रजाएं ( युवतयः ) परस्पर मिलने और न मिलने अर्थात् पृथक् २ रहने से हैं वे दसों ( जनेषु ) लोगों में ( विरोधमानं ) विविध गुणों से प्रकाशमान, ( तिग्मानीकं ) तीष्ण सेना बल से युक्त, ( स्वयशसं ) अपने भुजाओं से कीर्त्ति की कामना वाले पुरुष को, सूर्य को दिशाओं के समान ( सीं परि नयन्ति ) सब तरफ से घेर लेतीं, उसके शरण प्राप्त होती हैं और वे ( इमं ) उस ( विभृत्रम् ) विविध उपायों से भरण पोषण करने वाले बलवान् पुरुष को ( त्वष्टुः गर्भम् ) तेजस्वी सैन्यबल को तेजस्वी सूर्य के समान प्रतापी ( गर्भम् ) वश करने में समर्थ करते हैं । ( अतन्द्रासः ) आलस्य रहित होकर (जनयन्त) उत्पन्न करते हैं ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    कुत्स आंङ्गिरस ऋषिः॥ औषसगुणविशिष्टः सत्यगुणविशिष्टः, शुद्धोऽग्निर्वा देवता ॥ छन्द:-१, ३ विराट् त्रिष्टुप् । २, ७, ८, ११ त्रिष्टुप् । ४, ५, ६, १० निचृत् त्रिष्टुप् । ६ भुरिक् पंक्तिः ॥ एकादशर्चं सूकम् ॥

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. ज्यांच्या देशकालाच्या नियमाचे अनुमान काढता येत नाही, अशा विभुस्वरूप पूर्व इत्यादी क्रमाने सर्व व्यवहारांची सिद्धी करविणाऱ्या दहा दिशा आहेत. त्यांच्यात नियमयुक्त व्यवहारांना सिद्ध करावे. त्यात कोणीही विरुद्ध व्यवहार करू नये. ॥ २ ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    Ten directions of space, young and unaging, and ever-vigilant, create, produce and manifest this sun, child of Tvashta, Vayu, cosmic energy. It is of versatile action and purpose and sustains the various forms of existence. It is blazing and beautiful, self-refulgent with inherent glory, glowing and showing among the people, and the same directions move it around for the accomplishment of the tasks of creation.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    The duties of day and night are taught further in the form of directions

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    O men you should know these ten directions which like un-wearied industrious young women bring forth from electricity or wind this germ the origin of all dealings, widely-spread, the upholder of various activities, endowed with its own sharp forces or splendour, shining among men (particularly mathematicians) and glorious. They carry it around in the form of day and night.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    (त्वष्टु:) विद्युतो वायोः वा = Of the electricity or wind.इन्द्रो वै त्वष्टा (ऐत० ६.१० ) (गर्भम्) सर्वव्यवहारादिकारणम् = The origin of all dealings. (सीम्) प्राप्तव्यम् अहोरात्रव्यवहारम् = The dealings of day and night.

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    Men should know that these ten directions like cast, West, north and south etc. are the accomplishers of all dealings. Therefore they should perform all their works regularly and punctually and should not waste their time in doing unrighteous acts.

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