ऋग्वेद मण्डल - 10 के सूक्त 40 के मन्त्र
1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14

मन्त्र चुनें

  • ऋग्वेद का मुख्य पृष्ठ
  • ऋग्वेद - मण्डल 10/ सूक्त 40/ मन्त्र 1
    ऋषि: - घोषा काक्षीवती देवता - अश्विनौ छन्दः - विराड्जगती स्वरः - निषादः
    पदार्थ -

    (नरा) हे गृहस्थों में नेता सुशिक्षित स्त्री-पुरुषो ! (वाम्) तुम दोनों (द्युमन्तं यान्तं रथम्) दीप्तिमान् और सुभूषित जाते हुए रथ को (कुह) किस देश में (प्रातर्यावाणं विभ्वं वहमानम्) गृहस्थ के प्रथम अवसर पर प्राप्त होनेवाले प्रापणशील विभूतिमान् रथ को (विशे-विशे वस्तोः-वस्तोः) मनुष्यमात्र के निमित्त प्रतिदिन (धिया शमि) बुद्धि से क्रियावाले (कः-ह) कौन-कोई ही प्रजाजन (सुविताय प्रति भूषति) सुखविशेष के लिए प्रशंसित करता है अर्थात् सब कोई प्रशंसा करता है ॥१॥

    भावार्थ -

    सुशिक्षित स्त्री-पुरुषों को विशेष सुख के लिए अपने गृहस्थ रथ को, जो प्रथम अवस्था में प्राप्त होता है, उसे प्रजामात्र के लिए उत्तमरूप से चलाकर दूसरों के लिए आदर्श प्रस्तुत करना चाहिए ॥१॥

    पदार्थ -

    (नरा) हे गृहस्थानां नेतारावश्विनौ सुशिक्षितौ स्थविरौ गृहस्थाश्रमिणौ स्त्रीपुरुषौ ! (वाम्) युवयोः (द्युमन्तं यान्तं रथम्) दीप्तिमन्तं भूषितं गच्छन्तं रथम् (कुह) कुत्र देशे (प्रातर्यावाणं विभ्वं वहमानम्) गृहस्थस्य प्रथमावसरे प्रापणशीलं विभूतिमन्तं रथम् (विशे-विशे वस्तोः-वस्तोः) मनुष्यमात्रस्य निमित्तं प्रतिदिनम् (धिया शमि) बुद्ध्या कर्मवन्तम् (कः-ह) कः खलु (सुविताय प्रति भूषति) सुखविशेषाय प्रशंसति कश्चिद् विरल एव ॥१॥

    कृपया कम से कम 20 शब्द लिखें!
    Top