ऋग्वेद - मण्डल 10/ सूक्त 94/ मन्त्र 9
ऋषिः - अर्बुदः काद्रवेयः सर्पः
देवता - ग्रावाणः
छन्दः - स्वराडार्चीजगती
स्वरः - निषादः
ते सो॒मादो॒ हरी॒ इन्द्र॑स्य निंसतें॒ऽशुं दु॒हन्तो॒ अध्या॑सते॒ गवि॑ । तेभि॑र्दु॒ग्धं प॑पि॒वान्त्सो॒म्यं मध्विन्द्रो॑ वर्धते॒ प्रथ॑ते वृषा॒यते॑ ॥
स्वर सहित पद पाठते । सो॒म॒ऽअदः॑ । हरी॒ इति॑ । इन्द्र॑स्य । निं॒स॒ते॒ । अं॒शुम् । दु॒हन्तः॑ । अधि॑ । आ॒स॒ते॒ । गवि॑ । तेभिः॑ । दु॒ग्धम् । प॒पि॒ऽवान् । सो॒म्यम् । मधु॑ । इन्द्रः॑ । व॒र्ध॒ते॒ । प्रथ॑ते । वृ॒ष॒ऽयते॑ ॥
स्वर रहित मन्त्र
ते सोमादो हरी इन्द्रस्य निंसतेंऽशुं दुहन्तो अध्यासते गवि । तेभिर्दुग्धं पपिवान्त्सोम्यं मध्विन्द्रो वर्धते प्रथते वृषायते ॥
स्वर रहित पद पाठते । सोमऽअदः । हरी इति । इन्द्रस्य । निंसते । अंशुम् । दुहन्तः । अधि । आसते । गवि । तेभिः । दुग्धम् । पपिऽवान् । सोम्यम् । मधु । इन्द्रः । वर्धते । प्रथते । वृषऽयते ॥ १०.९४.९
ऋग्वेद - मण्डल » 10; सूक्त » 94; मन्त्र » 9
अष्टक » 8; अध्याय » 4; वर्ग » 30; मन्त्र » 4
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अष्टक » 8; अध्याय » 4; वर्ग » 30; मन्त्र » 4
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भाष्य भाग
हिन्दी (3)
पदार्थ
(ते सोमादः) वे विद्वान् शान्त परमात्मा के आनन्दरस तथा सोमरस भोगने पीनेवाले (अंशुं दुहन्तः) उस आनन्दप्रवाह को या रस को निकालते हुए योगभूमि पर या गोचर्म पर साधिकार बैठते हैं (तेभिः-दुग्धम्) उनके द्वारा निकाला हुआ (सोम्यं मधु) परमात्मसम्बन्धी अथवा सोमसम्बन्धी रस को (इन्द्रः पपिवान्) आत्मा पी लेता है, पीकर वह (वर्धते) बढ़ता है (प्रथते) विस्तृत होता है (वृषायते) बलवान् होता है (इन्द्रस्य हरी निंसते) उस आत्मा के दुःखापहरण और सुखाहरण करनेवाले ज्ञान कर्म को सब प्राण प्राप्त होते हैं, अपने में धारण करते हैं ॥९॥
भावार्थ
परमात्मा के आनन्दरस को भोगनेवाले विद्वान् योगभूमि में स्थिर होकर उस आनन्दरस को निर्झरित करते हैं, इनके द्वारा अन्य जन भी लाभ लेते हैं, आत्मा उस आनन्दरस का पान करके हर्षित, विकसित और बलिष्ठ हो जाता है, पुनः उसके ज्ञान और कर्म दुःखनाशक सुखकारक हो जाते हैं, जिन्हें उसके प्राण-इन्द्रियाँ प्राप्त करती हैं। एवम् सोमरस का पान करनेवाले शुद्ध भूमि पर विराजमान होकर सोमरस निकालते हैं, जिसे वे स्वयं भी पान करते हैं, अन्य जन भी करते हैं, पीकर हृष्ट पुष्ट और बलिष्ठ बन जाते हैं और उसके ज्ञान और कर्म दुःख दूर करनेवाले और सुख प्राप्त करानेवाले बन जाते हैं, उन्हें प्राण इन्द्रियाँ प्राप्त करती हैं ॥९॥
विषय
वर्धते-प्रथते-वृषायते
पदार्थ
[१] (ते) = वे गत मन्त्र के अनुसार सोम को अमृत जानकर सेवित करनेवाले (सोमादः) = सदा सोम्य भोजनों को खानेवाले और अतएव इन भोजनों से उत्पन्न सोम शक्ति [= वीर्य शक्ति] को अपने अन्दर ग्रहण करनेवाले ये व्यक्ति (इन्द्रस्य हरी) = एक जितेन्द्रिय पुरुष के इन्द्रियाश्वों को (निंसते) = चुम्बित करनेवाले होते हैं । अर्थात् ये इन्द्रियरूप अश्वों को अपने वश में कर पाते हैं । [२] इस जितेन्द्रियता के कारण (अंशुं दुहन्तः) = सोम का दोहन [ = अपने में पूरण] करते हुए ये व्यक्ति (गवि अध्यासते) = ज्ञान की वाणी में अधिष्ठित होते हैं। सोम के रक्षण से ज्ञानाग्नि को दीप्त करते हैं और वेद को समझनेवाले उसके अधिपति [master] बनते हैं। [३] तेभिः = इन जितेन्द्रिय पुरुषों से (दुग्धम्) = अपने में पूरित किये गये (सोम्यं मधु) = सोमरूप सारभूत वस्तु को (पपिवान्) = पीनेवाला, अपने अन्दर ही व्याप्त करनेवाला (इन्द्रः) = जितेन्द्रिय पुरुष, सब शत्रुओं का विद्रावण करनेवाला पुरुष (वर्धते) = बढ़ता है, इसका ज्ञान उत्तरोत्तर विकसित होता है। (प्रथते) = यह विस्तारवाला होता है, इसका मन उदार होता है। (वृषायते) = यह शक्तिशाली की तरह आचरण करता है [वृषा इव आचरति ] अथवा निर्बलता को परे फेंककर शक्ति सम्पन्न हो जाता है [अवृषः वृषो भवति] ।
भावार्थ
भावार्थ- सोमरक्षक पुरुष उत्तम इन्द्रियाश्वोंवाला होता है। ज्ञानी बनता है, उदार मनवाला होता है और सशक्त शरीर को धारण करता है।
विषय
विद्वानों का वाणी द्वारा आत्मस्वरूप की प्राप्ति। उनकी वर्षक मेघ से तुल्यता।
भावार्थ
(ते सोम-अदः) वे सोम, प्रेरक आत्मा की शक्ति को प्राप्त करने वाले (इन्द्रस्य हरी निंसते) उस ऐश्वर्यवान् आत्मा के ज्ञान और कर्म दोनों रूपों को प्राप्त करते हैं, वे (गवि) भूमि पर या वाणी द्वारा (अंशुंम्) उस व्यापक प्रभु के प्रकाश को (दुहन्तः) गौ में से गो-दुग्ध के समान उसे प्राप्त करते हुए, (गवि अधि आसते) उस वाणी में ही आश्रय लेते हैं। इसी प्रकार अंशुं अर्थात् भोक्तव्य अन्न रस करते हुए कृषकों के तुल्य (गवि) गौ अर्थात् पृथिवी के विकार रूप देह विराजते हैं। उन प्राणों द्वारा (दुग्धं) दुहे गये, प्राप्त किये गये (सोम्यं मधु) सोम्य मधु, ईश्वरीय ज्ञान रस को (पपिवान्) पान करता हुआ (इन्द्रः) आत्मदर्शी पुरुष, (वर्धते) वृद्धि को प्राप्त करता है, (प्रथते) बल और सामर्थ्य में बढ़ता और (वृषायते) सुखों के वर्षा करने वाले मेघ के तुल्य सर्वसुखकारी हो जाती है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ऋषिरर्बुदः काद्रवेयः सपः॥ ग्रावाणो देवता॥ छन्द:- १, ३, ४, १८, १३ विराड् जगती। २, ६, १२ जगती त्रिष्टुप्। ८,९ आर्चीस्वराड् जगती। ५, ७ निचृत् त्रिष्टुप्। १४ त्रिष्टुप्। चतुर्दशर्चं सूक्तम॥
संस्कृत (1)
पदार्थः
(ते सोमादः) ते विद्वांसः शान्तपरमात्मानन्दस्य यद्वा सोमरसस्य भोक्तारः पातारो वा (अंशुम् दुहन्तः) तमानन्दप्रवाहं यद्वा रसप्रवाहं निस्सारयन्तो (गवि-अधि आसते) योगभूमौ यद्वा गो चर्मणि साधिकारमातिष्ठन्ति (तेभिः-दुग्धम्) तैर्निस्सारितमानन्दरसं (सोम्यं मधु) सोम-सम्बन्धिनं मधुरं (इन्द्रः पपिवान्) आत्मा पीतवान् (वर्धते) प्रवर्धते (प्रथते) प्रथितो भवति (वृषायते) वृषैव बलवान् भवति (इन्द्रस्य हरी निंसते) तस्यात्मनो दुःखापहरणसुखापहरणे ज्ञानकर्मणी-प्राणाः प्राप्नुवन्ति स्वस्मिन् धारयन्ति ॥९॥
इंग्लिश (1)
Meaning
They, tasting of soma joy, attain to both knowledge and action toward both secular and sacred aims of life under divine dispensation and, distilling the joy of life, abide confident in the state of yoga on the earth and then on higher planes as well. Indra, the soul, drinking of the honey sweet milk of divine ecstasy, rises, expands and expresses itself in showers of creative joy and positive activity.
मराठी (1)
भावार्थ
परमात्म्याचा आनंदरस प्राप्त करणारे विद्वान योगभूमीत स्थिर होऊन त्याचा आनंदरस प्रवाहित करतात. त्यांच्याद्वारे इतरही लाभ घेतात. आत्मा त्या आनंदरसाचे पान करून हर्षित, विकसित व बलिष्ठ होतो. नंतर त्याचे ज्ञान व कर्म, प्राण व इंद्रियांद्वारे सुखकारक किंवा दु:खकारक होऊ शकतात. सोमरसाचे पान करणारे शुद्ध भूमीवर विराजमान होऊन सोमरस काढतात. सर्व जण ते प्राशन करतात. त्यामुळे आत्मा पुष्ट व बलवान होतो. आणि त्याचे ज्ञान कर्म दु:खनाशक व सुखदायक बनतात. ते सर्व प्राण व इंद्रियांद्वारे प्राप्त होते. ॥९॥
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