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ऋग्वेद मण्डल - 4 के सूक्त 35 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 4/ सूक्त 35/ मन्त्र 7
    ऋषिः - वामदेवो गौतमः देवता - ऋभवः छन्दः - निचृत्त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    प्रा॒तः सु॒तम॑पिबो हर्यश्व॒ माध्य॑न्दिनं॒ सव॑नं॒ केव॑लं ते। समृ॒भुभिः॑ पिबस्व रत्न॒धेभिः॒ सखीँ॒र्याँ इ॑न्द्र चकृ॒षे सु॑कृ॒त्या ॥७॥

    स्वर सहित पद पाठ

    प्रा॒तरिति॑ । सु॒तम् । अ॒पि॒बः॒ । ह॒रि॒ऽअ॒श्व॒ । माध्य॑न्दिनम् । सव॑नम् । केव॑लम् । ते॒ । सम् । ऋ॒भुऽभिः॑ । पि॒ब॒स्व॒ । र॒त्न॒ऽधेभिः॑ । सखी॑न् । यान् । इ॒न्द्र॒ । च॒कृ॒षे । सु॒ऽकृ॒त्या ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    प्रातः सुतमपिबो हर्यश्व माध्यन्दिनं सवनं केवलं ते। समृभुभिः पिबस्व रत्नधेभिः सखीँर्याँ इन्द्र चकृषे सुकृत्या ॥७॥

    स्वर रहित पद पाठ

    प्रातरिति। सुतम्। अपिबः। हरिऽअश्व। माध्यन्दिनम्। सवनम्। केवलम्। ते। सम्। ऋभुऽभिः। पिबस्व। रत्नऽधेभिः। सखीन्। यान्। इन्द्र। चकृषे। सुऽकृत्या ॥७॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 4; सूक्त » 35; मन्त्र » 7
    अष्टक » 3; अध्याय » 7; वर्ग » 6; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनस्तमेव विषयमाह ॥

    अन्वयः

    हे हर्य्यश्वेन्द्र ! त्वं सुकृत्या यान् सखीञ्चकृषे तै रत्नधेभिर्ऋभुभिः सह प्रातः सुतं माध्यन्दिनं केवलं सवनमपिबः सम्पिबस्वैवं ते ध्रुवं ते कल्याणं भवेत् ॥७॥

    पदार्थः

    (प्रातः) (सुतम्) निष्पन्नं दुग्धमुदकं वा (अपिबः) पिब (हर्य्यश्व) हर्याः कमनीया गमनीया अश्वा यस्य तत्सम्बुद्धौ (माध्यन्दिनम्) मध्ये दिने भवं भोजनादिकम् (सवनम्) सकलसंस्काररसोपेतम् (केवलम्) (ते) तव (सम्) (ऋभुभिः) मेधाविभिः सह (पिबस्व) (रत्नधेभिः) ये रत्नानि दधति तैः (सखीन्) सुहृदः (यान्) (इन्द्र) ऐश्वर्य्यप्रद राजन् (चकृषे) करोषि (सुकृत्या) शोभनेन धर्म्येण कर्मणा ॥७॥

    भावार्थः

    ये मनुष्या विद्वन्मित्राः सर्वेषां सुखैषिणः प्रातर्मध्यसायं कर्त्तव्यानि कर्माण्यभिहरणानि च कृत्वा सुकर्मणो भवेयुस्ते सर्वमित्राः सन्तो भाग्यशालिनः स्युः ॥७॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

    पदार्थ

    हे (हर्य्यश्व) उत्तम प्रकार चलने योग्य घोड़ों से युक्त (इन्द्र) ऐश्वर्य्य के देनेवाले राजन् ! आप (सुकृत्या) उत्तम धर्मयुक्त कर्म से (यान्) जिन (सखीन्) मित्रों को (चकृषे) करते हो और उन (रत्नधेभिः) धनों को धारण करनेवाले (ऋभुभिः) बुद्धिमानों के साथ (प्रातः) प्रातःकाल में (सुतम्) उत्पन्न दूध वा जल (माध्यन्दिनम्) तथा मध्य दिन में उत्पन्न भोजन आदि और (केवलम्) केवल (सवनम्) सम्पूर्ण संस्कारों के रसों से युक्त पीने योग्य पदार्थ का (अपिबः) पान करो (सम्, पिबस्व) अच्छे प्रकार आप पान करिये, इस प्रकार (ते) आप का निश्चय कल्याण होवे ॥७॥

    भावार्थ

    जो मनुष्य विद्वानों के मित्र, सब के सुख चाहनेवाले, प्रातःकाल, मध्यकाल और सायंकाल में करने योग्य कर्मों को करके उत्तम कर्म करनेवाले होवें, ये सबके मित्र हुए भाग्यशाली होवें ॥७॥

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    विषय

    तीनों सवनों में सोमपान

    पदार्थ

    [१] हे (हर्यश्व) = गतिशील इन्द्रियाश्वोंवाले जीव! तू (प्रातः) = जीवन के प्रातः सवन में [प्रथम २४ वर्षों में] (सुतं अपिब:) = इस उत्पन्न किये गये सोम का पान करता है । वीर्य का रक्षण ही सोम का पान है। (माध्यन्दिनं सवनम्) = जीवन का माध्यन्दिन सवन तो केवलं ते सिर्फ तेरे लिए ही है। २४ से ६८ तक के जीवन के मध्याह्न में [गृहस्थ काल में] केवल इन्द्र ही सोमपान करता है, अर्थात् इस समय एक जितेन्द्रिय पुरुष के लिए ही सोमरक्षण सम्भव होता है। [२] हे (इन्द्र) = जितेन्द्रिय पुरुष! तू (सुकृत्या) = उत्तम कर्मों के हेतु से (यान्) = जिनको (सखीन् चकृषे) = अपना मित्र बनाता है, उन (रत्नधेभिः) = रमणीय तत्त्वों का धारण करनेवाले (ऋभुभिः) = ज्ञानदीप्त पुरुषों के साथ उठता-बैठता हुआ इन्हीं के संग में रहता हुआ तू (संपिबस्व) = सोम का सम्यक् पान कर। हीनवृत्ति पुरुषों का संग ही हमें भटकानेवाला व सोमपान के अयोग्य बना देता है।

    भावार्थ

    भावार्थ- हम जीवन के तीनों सवनों में सोम का पान करनेवाले बनें ।

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    विषय

    हर्यश्व और ऋभु कौन हैं।

    भावार्थ

    हे (हर्यश्व) तीव्र वेगवान् अश्वों के स्वामिन् ! हे जलहरण-शील किरणों से प्रकाश फैलाने वाले सूर्यवत् तेजस्विन् ! तू (प्रातः) प्रातःकाल जीवन वा राज्यप्राप्ति के प्रारम्भ काल में (सुतम् अपिबः) देह में उत्पन्न बल वीर्य का पालन और ऐश्वर्य का उपभोग कर । (ते) तेरा (सवनं) उत्तम ऐश्वर्य (माध्यन्दिनं) मध्याह्न समय के प्रखर सूर्य के समान (केवलं) सबसे अद्वितीय हो । उस समय (रत्नधेभिः ऋभुभिः) उत्तम प्रकाशयुक्त किरणों से जिस प्रकार सूर्य जल का पान करता है उसी प्रकार तू भी (रत्नधेभिः) हे आचार्य ! रत्नरूप वीर्य को धारण करने वाले तेजस्वी शिष्यों और हे राजन् (यान्) जिनको तू (सुकृत्या) उत्तम कर्म से अपना (सखीन् चकृषे) सखा, मित्र बना लेता है (रत्न-धेभिः) ऐश्वर्यों वा रतों को धारण करने वाले उन (ऋभुभिः) तेजस्वी पुरुषों सहित (सवनं सं पिबस्व) ज्ञान का पान और ऐश्वर्य का उपभोग कर ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    वामदेव ऋषिः॥ ऋभवो देवता॥ छन्द:– १, २, ४, ६, ७, ९ निचृत् त्रिष्टुप् । ८ त्रिष्टुप्। ३ भुरिक् पंक्तिः। ५ स्वराट् पंक्तिः॥ नवर्चं सूक्तम् ॥

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    जी माणसे विद्वानांची मैत्री, सर्वांचे सुख इच्छिणारी, प्रातःकाल, मध्यकाल व सायंकाळी कर्तव्य करून उत्तम कर्म करणारी असतात, ती माणसे सर्वांचे मित्र असून भाग्यवान असतात. ॥ ७ ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    Indra, world ruler of honour and majesty, rider of the chariot of sun rays, drink the soma distilled in the morning. Drink the soma distilled at midday only for you. Drink with the Rbhus, men of science and wisdom, creators of the jewels of wealth, whom you have drafted as friends by your noble action.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    The same subject is continued.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    O king ! giver of much wealth your steads are beautiful and speedy, added with the wise men. You make your friends because of their good deeds. They are in fact upholders of jewels of noble virtues. They take milk in the morning and well-cooked pure and juicy food at noon. In this way, you get abiding happiness and health.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    N/A

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    The men are very fortunate who have highly learned persons as their friends, and Dessie welfare of all. They perform good deeds by discharging their duties in the morning, noon and evening and who take proper diet at proper time, and are friendly to all.

    Foot Notes

    (सवनम् ) सकलसंस्काररसोपेतम् । = Well-cooked and juicy food. (हर्य्यश्व) हर्याः कमनीया गमनीया अश्वा यस्य तत्सम्बुद्धौ । = He who possesses beautiful and speedy horses.

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