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अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 127 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 127/ मन्त्र 3
    ऋषिः - देवता - प्रजापतिरिन्द्रो वा छन्दः - निचृदनुष्टुप् सूक्तम् - कुन्ताप सूक्त
    399

    ए॒ष इ॒षाय॑ मामहे श॒तं नि॒ष्कान्दश॒ स्रजः॑। त्रीणि॑ श॒तान्यर्व॑तां स॒हस्रा॒ दश॒ गोना॑म् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    ए॒ष:। इ॒षाय॑ । मामहे । श॒तम् । नि॒ष्कान् । दश॒ । स्रज॑: ॥ त्रीणि॑ । श॒तानि॑ । अर्व॑तान् । स॒हस्रा॒ । दश॒ । गोना॑म् ॥१२७.३॥


    स्वर रहित मन्त्र

    एष इषाय मामहे शतं निष्कान्दश स्रजः। त्रीणि शतान्यर्वतां सहस्रा दश गोनाम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    एष:। इषाय । मामहे । शतम् । निष्कान् । दश । स्रज: ॥ त्रीणि । शतानि । अर्वतान् । सहस्रा । दश । गोनाम् ॥१२७.३॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 127; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    राजा के धर्म का उपदेश।

    पदार्थ

    (एषः) उस [राजा] ने (इषाय) उद्योगी पुरुष को (शतम्) सौ (निष्कान्) दीनारे [सुवर्ण मुद्रा], (दश) दश (स्रजः) मालाएँ, (अर्वताम् त्रीणि शतानि) तीन सौ घोड़े और (गोनाम् दश सहस्रा) दस सहस्र गौएँ (मामहे) दान दी हैं ॥३॥

    भावार्थ

    राजा बीसहों ऊँट-ऊँटनी आदि को रथ आदि में जोतकर अनेक उद्यम करे-करावे और उद्योगी लोगों को बहुत से उचित पारितोषिक देवे ॥२, ३॥

    टिप्पणी

    ३−(एषः) स राजा (इषाय) इष गतौ-क। उद्योगिने पुरुषाय (मामहे) मंहतेर्दानकर्मा-निघ० ३।४।२। ददौ (शतम्) (निष्कान्) निश्चयेन कायति। निस्+कै शब्दे-क। यद्वा, नौ सदेर्डिच्च। उ० ३।४। षद्लृ गतिविशरणयोः-कन्, स च डित्। दीनारान्। सुवर्णमुद्राः (दश) (स्रजः) सृज विसर्गे-क्विन्। मालाः (त्रीणि) (शतानि) (अर्वताम्) अश्वानाम् (सहस्रा) सहस्राणि (दश) (गोनाम्) गवाम्। धेनूनाम् ॥

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    विषय

    शतं निष्कान-दश स्त्रजः

    पदार्थ

    १. (एषः) = यह स्तोता (इषाय) = प्रभु-प्रेरणा की प्राप्ति के लिए (मामहे) = खूब ही प्रभु-पूजन करता है। प्रभु-पूजन करता हुआ यह स्तोता अन्त:स्थित प्रभु की प्रेरणा को सुनता है और प्रभु से दिये हुए (शतं निष्कान्) = सैकड़ों कण्ठ की भूषणभूत ज्ञानमालाओं को आदृत करता है। प्रभु से दिये गये ये ज्ञान इस स्तोता के (निष्क) = [neckless] कण्ठहार-बनते हैं। प्रभु-प्रदत्त (दश स्त्रजः) = [सृजन्ति] ज्ञान व कर्मों का उत्पादन [सृष्टि] करनेवाली इन्द्रियों को आदर देता है। इन इन्द्रियों का ग़लत प्रयोग नहीं करता। २. यह स्तोता (शतानि) = शतवर्षपर्यन्त चलनेवाले (अर्वताम् त्रीणि) = वासनाओं के संहार के तीन को-कामसंहार, क्रोधसंहार व लोभसंहार को आवृत्त करता है। प्रभु-स्तवन के द्वारा यह आजीवन 'काम, क्रोध, लोभ' का संहार करनेवाला होता है। वासना-संहार के द्वारा (गोनाम्) = ज्ञान की वाणियों के (सहस्त्रा) = [सहस्] आनन्द को प्राप्त करानेवाले प्रभु दश-धर्म के दश लक्षणों का ज्ञान प्राप्त कराते हैं और यह स्तोता उनको आदत करता है।

    भावार्थ

    प्रभु-स्तवन करते हुए हम प्रभु की प्रेरणा को प्राप्त करेंगे। प्रभु हमें कण्ठों के आभूषणभूत शतश: ज्ञानों को, ज्ञानों व कर्मों का सर्जन करनेवाली दस इन्द्रियों को, शतवर्षपर्यन्त होनेवाले 'काम, क्रोध ब लोभ' के विविध संहार को तथा ज्ञान द्वारा होनेवाले आनन्दमय धर्म के दस लक्षणों को प्राप्त कराते हैं।

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    भाषार्थ

    (एषः) यह वह महात्मा है जिसकी कि (इषाय) इच्छा-पूर्त्ति के लिए (मामहे) हम प्रजाजन पूजारूप में भेंटें देते हैं—(शतं निष्कान्) सैकड़ों सुवर्णमुद्राएँ, (दश स्रजः) दस प्रकार की मालाएँ, (त्रीणि शतानि अर्वताम्) तीन सौ घोड़े, और (दश सहस्रा गोनाम्) १० हजार गौंए।

    टिप्पणी

    [२ तथा ३—उष्ट्राः=उष (दाहे)+त्र (त्रैङ् पालने); देखो—२०.१३२.१३-१५। पैप्लाद शाखा २०.२४.९ में “उष्टाराः” पद पठित है, जिसका अर्थ है—“उष् अर्थात् दाह-सन्ताप से तैरानेवाले”; उष् (दाहे)+ताराः (तॄ संतरणे)। वधूमन्तः—वधू=वहति सुखानि प्रापयति (उणादि कोष १.८३) द्विर्दश=२०; अर्थात् १० इन्द्रियाँ, और १० इन्द्रियों की शक्तियाँ। वर्ष्म= Body, form (आप्टे)। जिहीडते=हिडि गतौ। इषाय=यदि प्रजाजनों के भले के लिए महात्मा लोग, उपर्युक्त प्रकार की सम्पत्तियाँ चाहे, तो उनकी इच्छापूर्त्ति, प्रजा को अवश्य करनी चाहिए। मन्त्र में शत, सहस्र, दश, त्रीणि आदि शब्द अनिश्चित संख्यावाची हैं। इस सम्बन्ध में देखो—२०.१३१.५। दश प्रकार के हार यथा—नानाविध पुष्पों सुवर्ण, रजत, मोतियों तथा अन्य रत्नों के हार।]

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    विषय

    स्तुति योग्य पुरुष का वर्णन।

    भावार्थ

    (एषः) वह प्रसिद्ध पुरुष (शतं निष्कान्) सौ स्वर्णमुद्राएं (दश स्रजः) दस मालाएं और (अर्वतां) घोड़ों के (त्रीणि शतानि) तीन सौ (गोनाम्) गाँवों के (दश सहस्रा) दस हजार अर्थात् ३०० घोड़े और दस सहस्र गौवें (इषाय) इच्छा करने वाले, जन को (मामहे) प्रदान करता है। वही व्यक्ति ‘नराशंस’ अर्थात् सर्व साधारण प्रजाजनों से स्तुति करने योग्य होता है।

    टिप्पणी

    (प्र०) ‘ईषाय’ इति कचित्। ‘ऋषये’ इति राथसम्मतः।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    तिम्रो नाराशंस्यः। अतः परं त्रिशद् ऋच इन्द्रगाथाः।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Indra

    Meaning

    We honour this ruling light of wisdom, vision and grandeur for his support and celebration, and offer him a hundred gold coins, ten garlands, three hundred horses and ten thousand cows.

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    Translation

    This king has given hundred gold coins, ten garlands, three hundred horses and ten thousand cows to this industrious man.

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    Translation

    This king has given hundred gold coins, ten garlands, three hundred horses and ten thousand cows to this industrious man.

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    Translation

    The intelligent broadcasters propagate the speeches like the bulls stimulating the cows, some of these speech-waves, produced by them stay there at the station (i.e., are lost there and then) while others go to the earth and rest there. (The verse describes the well-known truth in radio transmission).

    Footnote

    गाः speech-waves, light, rays as well as earth.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ३−(एषः) स राजा (इषाय) इष गतौ-क। उद्योगिने पुरुषाय (मामहे) मंहतेर्दानकर्मा-निघ० ३।४।२। ददौ (शतम्) (निष्कान्) निश्चयेन कायति। निस्+कै शब्दे-क। यद्वा, नौ सदेर्डिच्च। उ० ३।४। षद्लृ गतिविशरणयोः-कन्, स च डित्। दीनारान्। सुवर्णमुद्राः (दश) (स्रजः) सृज विसर्गे-क्विन्। मालाः (त्रीणि) (शतानि) (अर्वताम्) अश्वानाम् (सहस्रा) सहस्राणि (दश) (गोनाम्) गवाम्। धेनूनाम् ॥

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    बंगाली (2)

    मन्त्र विषय

    রাজধর্মোপদেশঃ

    भाषार्थ

    (এষঃ) সেই [রাজা] (ইষায়) উদ্যোগী পুরুষকে (শতম্) শত (নিষ্কান্) স্বর্ণমুদ্রা [সুবর্ণ মুদ্রা], (দশ) দশ (স্রজঃ) মালা, (অর্বতাম্ ত্রীণি শতানি) তিন শত ঘোড়া এবং (গোনাম্ দশ সহস্রা) দশ সহস্র গাভী (মামহে) দান করেছে ॥৩॥

    भावार्थ

    রাজা কুড়িটি উষ্ট্র-উষ্ট্রীকে রথে সংযোজিত করে অনেক উদ্যম করুক এবং উদ্যোগী লোকদেরকে বহু উপযুক্ত পুরষ্কার প্রদান করুক ॥৩॥

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    भाषार्थ

    (এষঃ) এই সেই মহাত্মা যার (ইষায়) ইচ্ছা-পূর্ত্তির জন্য (মামহে) আমরা প্রজাগণ পূজারূপে প্রতিগ্রহ প্রদান করি —(শতং নিষ্কান্) শত সুবর্ণমুদ্রা, (দশ স্রজঃ) দশ প্রকারের মালা, (ত্রীণি শতানি অর্বতাম্) তিনশত ঘোড়া, এবং (দশ সহস্রা গোনাম্) ১০ সহস্র গাভী।

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