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अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 128 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 128/ मन्त्र 15
    ऋषिः - देवता - प्रजापतिरिन्द्रो वा छन्दः - विराडनुष्टुप् सूक्तम् - कुन्ताप सूक्त
    50

    पृ॒ष्ठं धाव॑न्तं ह॒र्योरौच्चैः॑ श्रव॒सम॑ब्रुवन्। स्व॒स्त्यश्व॒ जैत्रा॒येन्द्र॒मा व॑ह सु॒स्रज॑म् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    पृ॒ष्ठम् । धाव॑न्तम् । ह॒र्यो: । औच्चै॑:ऽश्रव॒सम् । अ॑ब्रुवन् ॥ स्व॒स्ति । अश्व॒ । जैत्रा॒य । इन्द्र॒म् । आ । व॑ह । सु॒स्रज॑म् ॥१२८.१५॥


    स्वर रहित मन्त्र

    पृष्ठं धावन्तं हर्योरौच्चैः श्रवसमब्रुवन्। स्वस्त्यश्व जैत्रायेन्द्रमा वह सुस्रजम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    पृष्ठम् । धावन्तम् । हर्यो: । औच्चै:ऽश्रवसम् । अब्रुवन् ॥ स्वस्ति । अश्व । जैत्राय । इन्द्रम् । आ । वह । सुस्रजम् ॥१२८.१५॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 128; मन्त्र » 15
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    मनुष्य के कर्तव्य का उपदेश।

    पदार्थ

    (हर्योः) ले चलनेवाले दोनों बल और पराक्रम के (पृष्ठम्) पीछे (धावन्तम्) दौड़ते हुए (औच्चैःश्रवसम्) उच्चैःश्रवा [बड़ी कीर्तिवाले वा ऊँचे कानोंवाले घोड़े] से (अब्रुवन्) वे [चतुर लोग] बोले, (अश्व) हे घोड़े ! (स्वस्ति) कुशल से (जैत्राय) जीतने के लिये (सुस्रजम्) सुन्दर माला के समान सुन्दर सेनावाले (इन्द्रम्) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्यवाले पुरुष] को (आ वह) ले आ ॥१॥

    भावार्थ

    चतुर विद्वान् लोग श्रेष्ठ घोड़े आदि लाकर राजा को देवें, जिससे वह अपनी बड़ी सेना के साथ रणक्षेत्र में दुष्ट शत्रुओं को जीते ॥१॥

    टिप्पणी

    १−(पृष्ठम्) पृष्ठतः। अनुसरणेन (धावन्तम्) शीघ्रं गच्छन्तम् (हर्योः) हरणशीलयोर्बलपराक्रमयोः (औच्चैःश्रवसम्) उच्चैः+श्रु श्रवणे-असुन्, स्वार्थे अण्। औच्चैःश्रवसः अश्वनाम-निघ० १।१४। उच्चैर्महत्त्वं श्रवो यशो यस्य, यद्वा उन्नते श्रवसी कर्णौ यस्य तम्। बहुकीर्तिमन्तमुन्नतकर्णं वा घोटकम् (अब्रुवन्) अकथयन् ते विद्वांसः (स्वस्ति) कुशलेन (अश्व) हे घोटक (जैत्राय) जेतृ-अण्। जयाय (इन्द्रम्) परमैश्वर्यवन्तं पुरुषम् (आ वह) आनय (सुस्रजम्) सृज विसर्गे-क्तिन्। सुमालयेव सुसेनया युक्तम् ॥

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    विषय

    'अश्व-पृष्ठ-धावन'

    पदार्थ

    २. (हर्योः) = इन्द्रियाश्वों के-ज्ञानेन्द्रियों व कर्मेन्द्रियों के (पृष्ठम्) = पृष्ठ [Surface] को (धावन्तम्) = शुद्ध करते हुए, अर्थात् ज्ञानेन्द्रियों व कर्मेन्द्रियों को शुद्ध बनाते हुए (उचैः श्रवसम्) = उत्कृष्ट कीर्तिवाले इस जितेन्द्रिय पुरुष को सब देव [माता, पिता व आचार्य] (आ अब्रुवन्) = सब प्रकार से यही कहते हैं कि हे (स्वस्त्यश्व) = [सु अस्ति अश्व] कल्याणकर इन्द्रियाश्वोंवाले जीव! तू (जैत्राय) = विजय-प्राप्ति के लिए (सुस्त्रजम्) = उत्तमताओं का निर्माण करनेवाले-तेरे जीवन को उत्तम बनानेवाले (इन्द्रम) = सब शत्रुओं के विद्रावक प्रभु को (आवह) = अपने समीप प्रात करा। प्रभु का सान्निध्य ही तेरे जीवन को शत्रु-विजय द्वारा पवित्र बनाएगा।

    भावार्थ

    इन्द्रियों को पवित्र बनाने के लिए यत्नशील मनुष्य यशस्वी होता है। माता, पिता व आचार्य आदि सब देव इसे यही उपदेश करते हैं कि तू जीवन में शत्रुओं को जीतने के लिए प्रभुका उपासन कर।

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    भाषार्थ

    (हर्योः) ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रियरूपी अश्वों के (पृष्ठम्) पीछे-पीछे (धावन्तम्) दौड़ते हुए, (उच्चैः श्रवसम्) ऊँचा सुननेवाले अर्थात् आध्यात्मिक दृष्टि से बहरे कानोंवाले को वेदवाणियाँ (अब्रुवन्) कहती हैं कि हे मनुष्य! (अश्वजैत्राय) इन्द्रियाश्वों पर विजय पाने के लिए तू (इन्द्रम् आवह) परमेश्वर को हृदय में धारण कर, जैसे कि विजयी व्यक्ति गले में (सुस्रजम्) उत्तम माला को धारण करता है, (स्वस्ति) ताकि तेरा कल्याण हो।

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    विषय

    वीर राजा का कर्त्तव्य।

    भावार्थ

    (औचैःश्रवसम्) ऊंचे कानों वाले, (घावन्तं) वेग से दौड़ते हुए, (प्रष्टिं) वेगवान् अश्व को (अब्रुवन्) लोग कहते हैं कि हे (अश्व) वेगवान् अश्व ! तू (जैत्राय) विजय करने के लिये (सुस्रजम्) उत्तम माला धारण करने वाले, या उत्तम सेना व्यूह की रचना करने वाले (इन्द्रम्) सेनापति वीर पुरुषों को (स्वस्ति आवह) कुशलपूर्वक लेजा, उसको सवारी दे।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अथातः पञ्च इन्द्रगाथाः।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Indra Prajapati

    Meaning

    To the nation and the ruler of high fame running after wealth and power, excellence and fame, divine voices spoke: O nation, O ruler, for victory over peace and well being, honour and glory, invoke and win the grace of Indra, Lord Almighty, who holds the garland of glory for you. ( Here the ‘ashva’ may also be interpreted as mind running after senses.)

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    Translation

    To the highly praised horse (auchaihstravasam) rapidly running between two other horses the skilled men say-O horse, you bear the mighty garlanded man freely and comfortably for celebrating victory.

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    Translation

    To the highly praised horse (auchaihstravasam) rapidly running between two other horses the skilled men say-O horse, you bear the mighty garlanded man freely and comfortably for celebrating victory.

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    Translation

    These passions of the senses are running on all sides.

    Footnote

    They are going contrary to their instigator i.e., soul.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(पृष्ठम्) पृष्ठतः। अनुसरणेन (धावन्तम्) शीघ्रं गच्छन्तम् (हर्योः) हरणशीलयोर्बलपराक्रमयोः (औच्चैःश्रवसम्) उच्चैः+श्रु श्रवणे-असुन्, स्वार्थे अण्। औच्चैःश्रवसः अश्वनाम-निघ० १।१४। उच्चैर्महत्त्वं श्रवो यशो यस्य, यद्वा उन्नते श्रवसी कर्णौ यस्य तम्। बहुकीर्तिमन्तमुन्नतकर्णं वा घोटकम् (अब्रुवन्) अकथयन् ते विद्वांसः (स्वस्ति) कुशलेन (अश्व) हे घोटक (जैत्राय) जेतृ-अण्। जयाय (इन्द्रम्) परमैश्वर्यवन्तं पुरुषम् (आ वह) आनय (सुस्रजम्) सृज विसर्गे-क्तिन्। सुमालयेव सुसेनया युक्तम् ॥

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    बंगाली (2)

    मन्त्र विषय

    মনুষ্যকর্তব্যোপদেশঃ

    भाषार्थ

    (হর্যোঃ) হরণকারী বল এবং পরাক্রম উভয়ের (পৃষ্ঠম্) পেছনে (ধাবন্তম্) ধাবন করে (ঔচ্চৈঃশ্রবসম্) উচ্চৈঃশ্রবাকে [উত্তম কীর্তিযুক্ত বা উন্নত শ্রবণশীল কর্ণযুক্ত অশ্বকে] (অব্রুবন্) তাঁরা [বিদ্বানরা] বলে, (অশ্ব) হে অশ্ব! (স্বস্তি) কুশলে/নিপুণভাবে (জৈত্রায়) জয়ের জন্য (সুস্রজম্) সুন্দর মালার মতো সুন্দর সেনাযুক্ত (ইন্দ্রম্) ইন্দ্রকে [মহান ঐশ্বর্যবান পুরুষকে] (আ বহ) নিয়ে এসো ।।১৫॥

    भावार्थ

    চতুর বিদ্বানগণ সর্বোত্তম ঘোড়া ইত্যাদি এনে রাজাকে দান করুক, যাতে রাজা তাঁর বিশাল সৈন্যবাহিনী নিয়ে যুদ্ধক্ষেত্রে দুষ্ট শত্রুদের জয় করতে পারে ॥১৫॥

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    भाषार्थ

    (হর্যোঃ) জ্ঞানেন্দ্রিয় এবং কর্মেন্দ্রিয়রূপী অশ্বের (পৃষ্ঠম্) পেছন-পেছন (ধাবন্তম্) ধাবন করে/দৌড়ে, (উচ্চৈঃ শ্রবসম্) উচ্চ শ্রবণকারী অর্থাৎ আধ্যাত্মিক দৃষ্টিতে বধির কানযুক্তকে বেদবাণী (অব্রুবন্) বলে, হে মনুষ্য! (অশ্বজৈত্রায়) ইন্দ্রিয়াশ্বের ওপর বিজয় প্রাপ্তির জন্য তুমি (ইন্দ্রম্ আবহ) পরমেশ্বরকে হৃদয়ে ধারণ করো, যেমন বিজয়ী ব্যক্তি গলায় (সুস্রজম্) উত্তম মালা ধারণ করে, (স্বস্তি) যাতে তোমার কল্যাণ হয়।

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