अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 128/ मन्त्र 5
ऋषिः -
देवता - प्रजापतिरिन्द्रो वा
छन्दः - आर्ष्यनुष्टुप्
सूक्तम् - कुन्ताप सूक्त
79
ये च॑ दे॒वा अय॑ज॒न्ताथो॒ ये च॑ पराद॒दिः। सूर्यो॒ दिव॑मिव ग॒त्वाय॑ म॒घवा॑ नो॒ वि र॑प्शते ॥
स्वर सहित पद पाठये । च॑ । दे॒वा: । अय॑ज॒न्त । अथो॒ इति॑ । ये । च॑ । पराद॒दि: ॥ सूर्य॒: । दिव॑म्ऽइव । ग॒त्वाय॑ । म॒घवा॑ । न॒: । वि । र॒प्श॒ते॒ ॥१२८.५॥
स्वर रहित मन्त्र
ये च देवा अयजन्ताथो ये च पराददिः। सूर्यो दिवमिव गत्वाय मघवा नो वि रप्शते ॥
स्वर रहित पद पाठये । च । देवा: । अयजन्त । अथो इति । ये । च । पराददि: ॥ सूर्य: । दिवम्ऽइव । गत्वाय । मघवा । न: । वि । रप्शते ॥१२८.५॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
मनुष्य के कर्तव्य का उपदेश।
पदार्थ
(ये) जिन (देवाः) विद्वानों ने (अयजन्त) मेल किया है, (अथो च च) और (ये) जो (पराददिः) शत्रुओं के पकड़नेवाले हैं। (सूर्यः) सूर्य (दिवम् इव) जैसे आकाश को (गत्वाय) प्राप्त होकर, [वैसे ही] (मघवा) महाधनी [सभापति] (नः) उन हमको [प्राप्त होकर] (वि) विविध प्रकार (रप्शते) शोभित होता है ॥॥
भावार्थ
सभ्य लोग और सभापति मिलकर संसार का उपकार करके शोभा बढ़ावें, जैसे सूर्य आकाश में चमककर उपकार करता हुआ शोभित होता है ॥॥
टिप्पणी
−(ये) (अथो च च) समुच्चये (देवाः) विद्वांसः (अयजन्त) संगतिं कृतवन्तः (ये) (पराददिः) अथ० २०।६।२। बहुचनस्यैकवचनम्। पराददयः। पराणां शत्रूणामादातारो ग्रहीतारः (सूर्यः) (दिवम्) आकाशम् (इव) यथा (गत्वाय) ल्यप् छान्दसः। गत्वा। प्राप्य (मघवा) धनवान्। सभापतिः (नः) अस्मान् प्राप्य (वि) विविधम् (रप्शते) राजते-ऋग्वेदभाष्ये ४।४।१, दयानन्दसायणौ ॥
विषय
'यज्ञशीलता+दान' से स्वर्ग
पदार्थ
१.(ये च) = और जो (देवा:) = देववृत्ति के बनकर (अयजन्त) = खूब ही यज्ञ करते हैं। (च अथ उ) = और अब निश्चय से (ये पराददिः) = जो खूब ही दान करते हैं। ये व्यक्ति (सूर्यः इव) = सूर्य की भाँति (दिवं गत्वाय) = प्रकाशमय लोक में जाकर (मषवान:) = ऐश्वर्यशाली होते हुए अथवा [मघ-मख] यज्ञशील होते हुए (विरप्शते) = खूब ही प्रभु के नामों का उच्चारण करते हैं।
भावार्थ
हम देव बनकर यज्ञशील व दानवृत्तिवाले बनें। हमें प्रकाशमय स्वर्गलोक की प्राति होगी। वहाँ भी हम यज्ञशील व प्रभु-स्तवन करनेवाले होंगे।
भाषार्थ
(ये च) और जो (देवाः) देवकोटि के व्यापारी (अयजन्त) यज्ञभाग करते हैं, (ये च) और जो (पराददिः) दूसरों को दान देते हैं, वे (मघवा नः) धनिक पुरुष (वि रप्शते) कीर्तिमान् हो जाते हैं, (इव) जैसे कि (दिवं गत्वाय) द्युलोकगत (सूर्यः) सूर्य कीर्तिमान् है।
टिप्पणी
[विरप्शी=महान् (निघं০ ३.३)।]
विषय
दिशाओं के नामभेद से पुरुषों के प्रकार भेद।
भावार्थ
(ये च) और जो (देवान्) विद्वान् पुरुषों का आदर सत्कार करते हैं (अथो) और (ये च) जो (परा ददुः) दान करते हैं, (दिवम् गत्वाय सूर्य इव) आकाश को प्राप्त हुए सूर्य के समान (दिवम्) मोक्ष या परलोक को प्राप्त या दिव्यतेज या ज्ञान प्रकाश या उन्नत पद को (गत्वाय) प्राप्त होकर (मघवानः) धनवान्, ऐश्वर्यवान् पुरुष (वि रप्शन्ते) विविध प्रकारों से शोभा को प्राप्त होते हैं।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अथ पञ्च क्लृप्तयः॥
इंग्लिश (4)
Subject
Indra Prajapati
Meaning
Those who are generous and noble at heart, perform yajna and give in charity rise as the sun rises in heaven and become men of wealth, honour and brilliance of excellence.
Translation
The strong and wealthy king like the sun rise up to heaven coming to us of those learned men who perform yajnas and who do not give any gift to enemies.
Translation
The strong and wealthy king like the sun rise- up to heaven coming to us of those learned men who perform yajnas and who do not give any gift to enemies.
Translation
All the following persons are considered equal in the capacity of their work and actions. The son or disciple of a Brahman, becoming well-versed in Vedic lore and devotion to God, the person, equipped with the vision of discrimination, like the ointed eye, the person looking beautiful and healthy like the ointed body, the person, full of virtue and piety, like the one ornamented with precious stones, the person, lustrous with fine qualities, like theone, rich with gold and other precious metals.
Footnote
Griffith and other western scholars’ reading of history in these verses is merely conjectural and inappropriate.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
−(ये) (अथो च च) समुच्चये (देवाः) विद्वांसः (अयजन्त) संगतिं कृतवन्तः (ये) (पराददिः) अथ० २०।६।२। बहुचनस्यैकवचनम्। पराददयः। पराणां शत्रूणामादातारो ग्रहीतारः (सूर्यः) (दिवम्) आकाशम् (इव) यथा (गत्वाय) ल्यप् छान्दसः। गत्वा। प्राप्य (मघवा) धनवान्। सभापतिः (नः) अस्मान् प्राप्य (वि) विविधम् (रप्शते) राजते-ऋग्वेदभाष्ये ४।४।१, दयानन्दसायणौ ॥
बंगाली (2)
मन्त्र विषय
মনুষ্যকর্তব্যোপদেশঃ
भाषार्थ
(যে) যে (দেবাঃ) বিদ্বানগণ (অয়জন্ত) মেল/ঐক্য করেছে, (অথো চ চ) এবং (যে) যারা (পরাদদিঃ) শত্রূদের বন্ধনকারী। (সূর্যঃ) সূর্য (দিবম্ ইব) যেমন আকাশকে (গত্বায়) প্রাপ্ত হয়, [তেমনিই] (মঘবা) মহাধনী [সভাপতি] (নঃ) আমাদের [প্রাপ্ত হয়ে] (বি) বিবিধ প্রকার (রপ্শতে) শোভিত হয়॥৫॥
भावार्थ
সভ্য মানুষ এবং সভাপতি মিলে সংসারের উপকার করে শোভা বৃদ্ধি করুক, যেমন সূর্য আকাশে দেদীপ্যমান হয়ে উপকার করে শোভিত হয়॥৫॥
भाषार्थ
(যে চ) এবং যে (দেবাঃ) দেবকোটির বণিক (অয়জন্ত) যজ্ঞভাগ করে, (যে চ) এবং যে (পরাদদিঃ) অপরকে দান দেয়, সেই (মঘবা নঃ) ধনী পুরুষ (বি রপ্শতে) কীর্তিমান্ হয়/হয়ে যায় , (ইব) যেমন (দিবং গত্বায়) দ্যুলোকগত (সূর্যঃ) সূর্য কীর্তিমান্।
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