अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 128/ मन्त्र 7
ऋषिः -
देवता - प्रजापतिरिन्द्रो वा
छन्दः - निचृदनुष्टुप्
सूक्तम् - कुन्ताप सूक्त
62
य आ॒क्ताक्षः॑ सुभ्य॒क्तः सुम॑णिः॒ सुहि॑र॒ण्यवः॑। सुब्र॑ह्मा॒ ब्रह्म॑णः पु॒त्रस्तो॒ता कल्पे॑षु सं॒मिता॑ ॥
स्वर सहित पद पाठय: । आ॒क्ताक्ष॑: ।सुभ्य॒क्त: । सुम॑णि॒: । सुहि॑र॒ण्यव॑: ॥ सुब्र॑ह्मा॒ । ब्रह्म॑ण: । पु॒त्र: । तो॒ता । कल्पे॑षु । सं॒मिता॑ ॥१२८.७॥
स्वर रहित मन्त्र
य आक्ताक्षः सुभ्यक्तः सुमणिः सुहिरण्यवः। सुब्रह्मा ब्रह्मणः पुत्रस्तोता कल्पेषु संमिता ॥
स्वर रहित पद पाठय: । आक्ताक्ष: ।सुभ्यक्त: । सुमणि: । सुहिरण्यव: ॥ सुब्रह्मा । ब्रह्मण: । पुत्र: । तोता । कल्पेषु । संमिता ॥१२८.७॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
मनुष्य के कर्तव्य का उपदेश।
पदार्थ
(यः) जो (ब्रह्मणः) ब्रह्मा [वेदज्ञानी] का (पुत्रः) पुत्र (सुब्रह्मा) सुब्रह्मा [बड़ा वेदज्ञानी, सुमार्गी], (आक्ताक्षः) शुद्ध व्यवहारवाला और (सुभ्यक्तः) बड़ा विख्यात हो, वह (सुमणिः) बहुत मणियों [रत्नों]वाला और (सुहिरण्यवः) बड़ा तेजस्वी होवे, (तोता) यह-यह कर्म (कल्पेषु) शास्त्रविधानों में (संमिता) प्रमाणित है ॥७॥
भावार्थ
विद्वान् का सन्तान विद्वान् होने से ही संसार में प्रतिष्ठा पावे, यह वेदमत है ॥७॥
टिप्पणी
७−(यः) सन्तानः (आक्ताक्षः) म० ६। आ+अञ्जू-क्त। शुद्धव्यवहारयुक्तः (सुभ्यक्तः) म० ६। सु+अभि+अञ्जू-क्त। अकारलोपः। बहुविख्यातः (सुमणिः) बहुरत्नयुक्तः (सुहिरण्यवः) महातेजस्वी (सुब्रह्मा) महावेदज्ञः (ब्रह्मणः) वेदज्ञस्य। अन्यद् गतम् ॥
विषय
सुमणिः सुहिरण्यवः
पदार्थ
१. (यः आक्ताक्ष:) = अञ्जन से अँजी आँखवाला है, (सुअध्यक्त:) = जिसने स्नान आदि के बाद सम्यक् तेल मला है, (सुमणि:) = उत्तम मणियों को धारण किये हुए है, (सुहिरण्यवः) = उत्तम स्वर्ण आदि धनों से युक्त है। (सुब्रह्मा) = उत्तम वेदज्ञाता है। वह भी (ब्रह्मणः पुत्रः) = उस ब्रह्म का ही पुत्र है। २. (ता उता ता) = वे सब और निश्चय से वे सब (कल्पेषु संमिता) = यज्ञानुष्ठानों में समान रूप से सम्मिलित होने के योग्य माने गये हैं।
भावार्थ
सुस्नात, सुन्दर शरीरवाला, धनी तथा ज्ञानी भी यज्ञानुष्ठान उसी प्रकार करे जैसे कि अस्नात, न सुन्दर शरीरवाला, निर्धन व अल्पज्ञ करता है। यज्ञानुष्ठान सभी को करना ही चाहिए। ज्ञानी होकर इन अनुष्ठानों की उपेक्षा न करे।
भाषार्थ
(यः) जो (आक्ताक्षः) आँखों और अन्य इन्द्रियों से पवित्र है, (सुभ्यक्तः) जो अभिव्यक्त अर्थात् स्पष्ट और स्वच्छ हृदयवाला है, (ब्रह्मणः) तथा जो ब्रह्मा का (पुत्रः) पुत्र (सुब्रह्मा) उत्तम-ब्रह्मा बना है (ता उ ता) ऐसे व्यक्ति (सुमणिः सुहिरण्यवः) उत्तम मणियों और श्रेष्ठ-सुवर्णों के दान के पात्र हैं, (कल्पेषु) कल्प-कल्पान्तरों में ये सब (संमिता) एक समान माने गये हैं। [सुभ्यक्तः=सु+अभ्यक्तः।]
विषय
योग्य और योग्य पुरुषों का वर्णन।
भावार्थ
(यः ब्रह्मणः पुत्रः) जो ब्रह्मवेत्ता, वेदज्ञ का पुत्र वा शिष्य, (सु-ब्रह्मा) स्वयं उत्तम वेद का ज्ञाता विद्वान् होजाता है वह (आक्ताक्षः) अंजी आंख वाले के समान उत्तम रीति से शास्त्र की चक्षु से युक्त होजाता है। वह (सु-अभ्यक्तः) गात्र में तैल आदि लगाने वाले के समान,सुन्दर और स्वस्थ रहता है। वह (सुमणिः) उत्तम मणि को धारण करने वाले के समान सुशोभित और (सुहिरण्यवान्) उत्तम सुवर्ण आदि धन के स्वामी के समान ज्ञान का धनी होता है। (ता उ ता) वे सब जन (कल्पेषु) कर्म के सामर्थ्यों में (सं-मिता) समान हैं।
टिप्पणी
‘सुभ्यक्तः’ ‘सुगणिः सुहिरण्यवान’। इति शं० पा०।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अथ षट् जनकल्पाः। अनुष्टुभः॥
इंग्लिश (4)
Subject
Indra Prajapati
Meaning
Whoever is a man of gracious eye and generous of heart, who is learned and worthy of being the high priest of yajna, being son of a Brahmana, deserves to wear gold and jewel distinctions and is honoured in society and in learned programmes.
Translation
The son of the man who has masterly knowledge and practice of the vedas becomes Brahma, the good priest or Brahman if he is with well-a-nointed eyes and limbs, wearing gems and is refulgent with knowledge. These things are ordered in the rules.
Translation
The son of the man who has masterly knowledge and practice of the vedas becomes Brahma, the good pries or Brahman if he is with well-a-nointed eyes and limbs, wearing gems and is refulgent with knowledge. These things are ordered in the rules.
Translation
The water tanks or pools, whose water is fit for drinking and have good ghats; the rich person, who gives profusely; the pretty girl, who is easy of approach. All of these are considered equal in their use.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
७−(यः) सन्तानः (आक्ताक्षः) म० ६। आ+अञ्जू-क्त। शुद्धव्यवहारयुक्तः (सुभ्यक्तः) म० ६। सु+अभि+अञ्जू-क्त। अकारलोपः। बहुविख्यातः (सुमणिः) बहुरत्नयुक्तः (सुहिरण्यवः) महातेजस्वी (सुब्रह्मा) महावेदज्ञः (ब्रह्मणः) वेदज्ञस्य। अन्यद् गतम् ॥
बंगाली (2)
मन्त्र विषय
মনুষ্যকর্তব্যোপদেশঃ
भाषार्थ
(যঃ) যে (ব্রহ্মণঃ) ব্রহ্মার [বেদজ্ঞানীর] (পুত্রঃ) পুত্র (সুব্রহ্মা) সুব্রহ্মা [মহান বেদজ্ঞানী, সুমার্গী], (আক্তাক্ষঃ) শুদ্ধ আচরণকারী এবং (সুভ্যক্তঃ) মহান বিখ্যাত হয়, সে (সুমণিঃ) বহু মণির [রত্নের] অধিকারী হয় এবং (সুহিরণ্যবঃ) মহা তেজস্বী হয়, (তোতা) এই-এই কর্ম (কল্পেষু) শাস্ত্রবিধান দ্বারা (সংমিতা) প্রমাণিত॥৭॥
भावार्थ
বিদ্বানের সন্তান বিদ্বান হয়েই সংসারে/জগতে প্রতিষ্ঠা/প্রতিপত্তি পাবে, এটাই বেদমত॥৭॥
भाषार्थ
(যঃ) যে (আক্তাক্ষঃ) চোখ এবং অন্য ইন্দ্রিয় দ্বারা পবিত্র, (সুভ্যক্তঃ) যে অভিব্যক্ত অর্থাৎ স্পষ্ট এবং স্বচ্ছ হৃদয়সম্পন্ন, (ব্রহ্মণঃ) তথা যে ব্রহ্মার (পুত্রঃ) পুত্র (সুব্রহ্মা) উত্তম-ব্রহ্মা হয়েছে (তা উ তা) এরূপ ব্যক্তি (সুমণিঃ সুহিরণ্যবঃ) উত্তম মণি এবং শ্রেষ্ঠ-সুবর্ণ দানের পাত্র, (কল্পেষু) কল্প-কল্পান্তরে এঁরা সবাই (সংমিতা) এক সমান মান্য হয়েছে। [সুভ্যক্তঃ=সু+অভ্যক্তঃ।]
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