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अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 71 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 71/ मन्त्र 12
    ऋषिः - मधुच्छन्दाः देवता - इन्द्रः छन्दः - गायत्री सूक्तम् - सूक्त-७१
    40

    अ॒स्मान्त्सु तत्र॑ चोद॒येन्द्र॑ रा॒ये रभ॑स्वतः। तुवि॑द्युम्न॒ यश॑स्वतः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒स्मान् । सु । तत्र॑ । चो॒द॒य॒ । इन्द्र॑ । रा॒ये । रभ॑स्वत: ॥ तुवि॑ऽद्यु॒म्न । यश॑स्वत: ॥७१.१२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अस्मान्त्सु तत्र चोदयेन्द्र राये रभस्वतः। तुविद्युम्न यशस्वतः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अस्मान् । सु । तत्र । चोदय । इन्द्र । राये । रभस्वत: ॥ तुविऽद्युम्न । यशस्वत: ॥७१.१२॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 71; मन्त्र » 12
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    मनुष्य के कर्तव्य का उपदेश।

    पदार्थ

    (तुविद्युम्न) हे अत्यन्त धनवाले (इन्द्र) इन्द्र ! [परम ऐश्वर्यवाले परमात्मन्] (राये) धन के लिये (रभस्वतः) उपाय सोचकर आरम्भ करनेवाले, (यशस्वतः) यश रखनेवाले (अस्मान्) हमको (तत्र) वहाँ [श्रेष्ठ कर्म में] (सु) अच्छे प्रकार (चोदय) पहुँचा ॥१२॥

    भावार्थ

    मनुष्य परमात्मा में विश्वास करके पहिले से विचारकर कार्य सिद्ध करें और कीर्तिमान् होवें ॥१२॥

    टिप्पणी

    १२−(अस्मान्) धार्मिकान् (सु) सुष्ठु (तत्र) प्रसिद्धे श्रेष्ठकर्मणि (चोदय) प्रेरय (इन्द्र) परमैश्वर्यवन् परमात्मन् (राये) धनाय (रभस्वतः) रभ राभस्ये=कार्योपक्रमे-असुन्, मतुप्। उपायज्ञानपूर्वकारम्भयुक्तान् (तुविद्युम्न) बहुधनिन् (यशस्वतः) कीर्तिमतः ॥

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    विषय

    रभस्वतः-यशस्वतः

    पदार्थ

    १. हे (इन्द्र) = शत्रुओं का विद्रावण करनेवाले प्रभो! (अस्मान्) = हमें (तत्र) = वहाँ (राये) = ऐश्वर्य के लिए (सुचोदय) = सम्यक् प्रेरित कीजिए। उन हमें प्रेरित कीजिए जोकि (रभस्वत:) = उद्योगवाले हैं। हम श्रम द्वारा ही धन को प्राप्त करें और धन को प्राप्त करके भी श्रमशील बने रहें। आराम करनेवाले न बन जाएँ। २. हे (तुविद्युम्न) = महान् धनवाले प्रभो। हम (यशस्वतः) = यशस्वी जीवनवालों को ऐश्वर्य के लिए प्रेरित कीजिए। धन का अर्जन करके, महाधन बनकर, हम उस धन का यज्ञ आदि उत्तम कायों में विनियोग करें, जिससे यशस्वी हों। इस धन से भोगविलास में फंसकर हम अपयश व विनाश के मार्ग पर न चल दें।

    भावार्थ

    श्रम द्वारा धन का अर्जन करते हुए हम उसे यज्ञ आदि उत्तम कार्यों में विनियुक्त करते हुए यशस्वी बनें।

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    भाषार्थ

    (इन्द्र) हे परमेश्वर! (राये) आध्यात्मिक-धन (पूर्व मन्त्र ११) की प्राप्ति के लिए (अस्मान्) हम (रभस्वतः) अति प्रयत्नशील उपासकों को, (तत्र) अध्यात्म-मार्ग में, (सु चोदय) सम्यक् प्रेरित कीजिए। (तुविद्युम्न) हे आध्यात्मिक सम्पत्तियों के महाधनी! (यशस्वतः) उस धन की प्राप्ति द्वारा हमें यशस्वी कीजिए।

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    विषय

    परमेश्वर।

    भावार्थ

    हे (तुविद्युम्न) बहुत अधिक ऐश्वर्यवन् ! (इन्द्र) परमेश्वर ! राजन् ! तू (यशस्वतः) यशस्वी, (रभस्वतः) उद्योगशील, (अस्मान्) हमें (राये) ऐश्वर्य प्राप्त करने के लिये (तत्र) उस उत्तम, योग्य स्थान और अवसर में (सु चोदय) उत्तम रीति से प्रेरित किया कर।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः—मधुच्छन्दाः। देवता—इन्द्रः॥ छन्दः—गायत्री॥ षोडशर्चं सूक्तम॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    In dr a Devata

    Meaning

    Indra, lord of light and infinite power, guide and inspire us on way to the wealth of life and divinity, zealous seekers of love, honour and excellence as we are.

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    Translation

    O All-power Divinity, you emulously stimulate us, the industrious and glorious in that of appropriate position for the attainment of prosperity.

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    Translation

    O All-power Divinity, you emulously stimulate us, the industrious and glorious-in that of appropriate position for the attainment of prosperity.

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    Translation

    O Most Glorious and Bounteous God, thoroughly stimulates us, the active and worthy aspirants to the proper destination, for acquiring wealth and riches.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १२−(अस्मान्) धार्मिकान् (सु) सुष्ठु (तत्र) प्रसिद्धे श्रेष्ठकर्मणि (चोदय) प्रेरय (इन्द्र) परमैश्वर्यवन् परमात्मन् (राये) धनाय (रभस्वतः) रभ राभस्ये=कार्योपक्रमे-असुन्, मतुप्। उपायज्ञानपूर्वकारम्भयुक्तान् (तुविद्युम्न) बहुधनिन् (यशस्वतः) कीर्तिमतः ॥

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    बंगाली (2)

    मन्त्र विषय

    মনুষ্যকর্ত্যব্যোপদেশঃ

    भाषार्थ

    (তুবিদ্যুম্ন) হে অত্যন্ত ধনবান্ (ইন্দ্র) ইন্দ্র ! [পরম ঐশ্বর্যবান্ পরমাত্মন্] (রায়ে) ধনের জন্য (রভস্বতঃ) উপায় বিচার করে কার্যারম্ভকারী, (যশস্বতঃ) যশস্বী (অস্মান্) আমাদের (তত্র) সেখানে [শ্রেষ্ঠ কর্মে] (সু) উত্তমরূপে (চোদয়) প্রেরণ করুন ॥১২॥

    भावार्थ

    মনুষ্য পরমাত্মার প্রতি বিশ্বাস স্থাপন করে কার্যারম্ভের পূর্বে বিচারপূর্বক কার্য সম্পাদন করে কীর্তিমান্ হোক॥১২॥

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    भाषार्थ

    (ইন্দ্র) হে পরমেশ্বর! (রায়ে) আধ্যাত্মিক-ধন (পূর্ব মন্ত্র ১১) এর প্রাপ্তির জন্য (অস্মান্) আমরা (রভস্বতঃ) অতি প্রচেষ্টাশীল উপাসকদের, (তত্র) আধ্যাত্ম-মার্গে, (সু চোদয়) সম্যক্ প্রেরিত করুন। (তুবিদ্যুম্ন) হে আধ্যাত্মিক সম্পত্তি-সমূহের মহাধনী! (যশস্বতঃ) সেই ধন প্রাপ্তি দ্বারা আমাদের যশস্বী করুন।

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